Archive for the ‘सोच-विचार’ Category

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भारत:व्यक्ति बनाम तंत्र

जनवरी 24, 2007

हमारे समाज में यह आम धारणा है कि व्यक्ति विशेष तो अपने दम पर बहुत कुछ अर्जित कर सकता है, सफलता की नयी-नयी ऊँचाइयां छूकर नित नये मानदण्ड स्थापित कर सकता है, परन्तु उसके इस विकास में हमारे देश के मूलभूत ढाँचे का योगदान न के बराबर ही है, या कहिये कि है ही नहीं! तो सवाल उठता है कि इस अवधारणा में सच्चाई आखिर कितनी है? आइये चर्चा करें.

एक समाज को समझने और उस पर अपनी राय बनाने के मापदण्ड उन मापदण्डों से सर्वथा भिन्न हैं जो कि एक व्यक्ति विशेष को समझने और उस पर अपनी राय बनाने के लिये चाहिये. या यूं समझिये कि समाज को जानने का प्रयास करना मतलब एक वृहत् या स्थूल अध्य्यन और उस समाज के व्यक्तियों को एक-एक कर समझना मतलब एक सूक्ष्म अध्ययन. इसी बात को गणित की भाषा में कहा जाय तो यह कि एक समाज का स्थूल स्वरूप उसके व्यक्तियों के सूक्ष्म वैयक्तिक गुणों का औसत मान है, जो कि बहुमत के आस-पास ही है. और जैसा कि सांखिकीय तथ्य है, एक व्यक्ति विशेष के वैयक्तिक गुण-धर्म पूरे समूह के औसत गुण-धर्मों के औसत मान से बहुत अधिक विचलित हों, ऐसा विरले ही होता है, आखिरकार सूक्ष्म वैयक्तिक गुण ही तो पूरे समाज को एक वृहत् स्वरूप प्रदान करते हैं.

कोई भी निर्जीव भौतिक तंत्र हो, पूरे तंत्र की किसी भी विशेषता को समृद्ध करने के लिये एक प्रकार की वाह्य ऊर्जा चाहिये. इसी प्रकार, यदि सामजिक तंत्र की बात की जाय तो उसकी समृद्धि और विकास के लिये भी वाह्य संस्कृतियों की रोशनी समाज में आती रहनी चाहिये. पर इसके अलावा बहुत सी नयी-नयी बातें जानने और सीखते रहने की मानवीय उत्कंठा भी नये लक्ष्य निर्धारित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक है. कई बार एक व्यक्ति विशेष की ऐसी ही उत्कंठा उसे वर्तमान सामाजिक सीमाओं से परे सोचने को प्रेरित करती है और देखते-देखते यही उत्कंठा एक प्रेरणा की तरह पूरे तंत्र में फैल जाती है और समाज को एक नयी दिशा देती है. दिलचस्प बात यह है कि लगभग प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी एक ऐसे दौर से गुज़रता है जब उसमें सीमाओं को लांघकर कुछ हटकर करने की तीव्र लालसा होती है, पर अधिकांश व्यक्तियों में यह एक क्षणिक उद्वेग ही होता है और वे भी फिर से भीड़ में ही कहीं खो जाते हैं, या कई बार तो भीड़ ही उन्हें अपनी ओर खींच लेती है! और इस प्रकार अक्सर “समाज” ही वैयक्तिक उत्कंठाओं के दमन का कारण बनता है. यह समाज का वह अंग होता है जो कभी स्वयं नये मार्ग पर जाने में असफल रहा होता है.

क्या कोई ऐसा उपाय है कि समाज के इस अंग के कुप्रभाव से बचा जा सके? एक व्यक्ति का पूरे समाज पर क्या प्रभाव होता है? इतिहास साक्षी है कि अतीत में जितने भी सामजिक, दार्शनिक अथवा वैज्ञानिक परिवर्तन हुए, उनमें एक व्यक्ति विशेष अथवा छोटे समूह को ही लीक से हटकर चलना पड़ा और धीरे-धीरे समाज भी उनके साथ हुआ. इस सम्बन्ध में अमूल एक अच्छा उदाहरण है. कुछ ग्रामवासियों की एक पहल को वर्गीस कुरियन का नेतृत्व मिला और समूचे देश में श्वेत क्रांति आ गयी. इसी प्रकार हाल में नोबल पुरस्कार के कारण चर्चा में आयी बंग्लादेश की ग्रामीण बैंक का सपना साकार करने वाले मुहम्मद युनुस ने विपरीत परिस्थितियों का सामना करके एक मिसाल खड़ी की है. पर एक दृष्टि से देखा जाय तो क्या परिवर्तन का यह तरीका बहुत अक्षम नहीं है! याद कीजिये १८५७ की क्रांति जो इतिहास के पन्नों में एक विद्रोह बनकर रह गयी! कुछ व्यक्तियों द्वारा शुरु किये गये इस पुण्य कार्य को ब्रितानी सरकार सिर्फ़ इसलिये कुचल पायी क्योंकि सामाजिक चेतना का अभाव था. यदि सामजिक चेतना एक साथ जागृत हो जाय तो क्या नहीं हो सकता! वे व्यक्ति जिनकी सोच इस दिशा में सकारात्मक है, यदि एक साथ आगे आयें तो हमें क्यों उन व्यक्तियों के अवतरित होने की प्रतीक्षा करनी पड़े जो समाज को अपने बलबूते पर आगे बढायें? कदम-कदम से ही कारवां बनता है, और यही तो लोकतंत्र का सार है.

यह समझना आवश्यक है कि यदि समाज का ही एक अंग खुली और सकारात्मक सोच वाले व्यक्तियों को आगे आने से रोकेगा तो सबको सामूहिक जिम्मेदारी का बोझ उठाने को तैयार रहना चाहिये. समाज का प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह कितना भी विवेकी, समृद्ध अथवा सफल क्यों न हो – सभी को अपने दृष्टिकोण में यथोचित परिवर्थन करना होगा. हम अभी तक लोकतंत्र की शक्ति और उसके संभावित परिणामों को नहीं समझ पाये हैं, इन्हें जल्दी ही समझना बेहतर होगा.

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कहानी दो अंकों की

जनवरी 21, 2007

कला और विज्ञान को आमतौर पर अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है. अंग्रेज़ों द्वारा तैयार की गयी वर्तमान भारतीय शिक्षा प्रणाली में भी दोनों विषय माध्यमिक स्तर पर ही अलग कर दिये जाते है. क्या कला और विज्ञान साथ-साथ नहीं चल सकते? अगर कोई कहे कि कम्प्यूटर क्रांति कला की एक बड़ी देन है तो उस व्यक्ति पर निश्चित रूप से संदेह की दृष्टि से देखा जायेगा!

कला और विज्ञान का एकात्म स्वरूप के ईसा से कोई ५०० वर्ष पूर्व भारतीय विद्वान पिंगल को विदित था. यदि कहें कि कम्प्यूटर क्रांति का स्रोत पिंगल की इसी सोच में छिपा है, तो गलत न होगा! कैसे? आइये जानने का प्रयास करें.

कम्प्यूटर जो भी कुछ करता है, उसमें एक गणना छिपी होती है. अब एक निर्जीव वस्तु गणना कैसे करे, और उस वस्तु को गिनती समझायी जाय तो भला कैसे! यह सब संभव है द्विअंकीय प्रणाली के माध्यम से. ये दो अंक १ और ० हार्ड डिस्क के किसी क्षेत्र के चुम्बकीयकृत होने या न होने को निरूपित कर सकते हैं या सी.डी. के किसी स्थान पर प्रकाश के ध्रुवीयकरण की दो अलग अवस्थाओं को भी. अब प्रश्न यह है कि इसमें कला कहाँ से आ गयी? तो जवाब है कि यह विचार कि किसी वस्तु की दो अवस्थाओं के आधार पर कोई भी कठिन से कठिन गणना संभव है, कला से ही आया. अब सोचिये न, ये दो अवस्थायें कविता में प्रयोग किये जाने वाले छन्दों के किसी स्थान पर लघु अथवा गुरु होने का निरूपण भी तो कर सकतीं हैं! द्विअंकीय सिद्धान्त यहीं से आया! पिंगल के छन्द शास्त्र में पद्यों में छिपे इस सिद्धान्त का वर्णन बहुत सहजता और वैज्ञानिक ढंग से किया गया है.

पिंगल ने कई छन्दों का वर्गीकरण आठ गणों के आधार पर किया. इस वर्गीकरण को समझने के लिये पहले देखें एक सूत्र: “यमाताराजभानसलगा“. यदि मात्रा गुरु है तो लिखें १ और यदि लघु है तो ०. अब इस सूत्र में तीन-तीन अक्षरों को क्रमानुसार लेकर बनायें आठ गण,

  • यगण = यमाता = (०,१,१)
  • मगण = मातारा = (१,१,१)
  • तगण = ताराज = (१,१,०)
  • रगण = राजभा = (१,०,१)
  • जगण = जभान = (०,१,०)
  • भगण = भानस = (१,०,०)
  • नगण = नसल = (०,०,०)
  • सगण = सलगा = (०,०,१)

अब ये आठ गण यूँ समझिये कि हुये ईंट, जिनसे मिलकर कविता का सुंदर महल खड़ा है. इन ईंटों का प्रयोग करके बहुत से सुंदर छन्द परिभाषित और वर्गीकृत किये जा सकते हैं. यही नहीं, ये आठ गण ० से लेकर ७ तक की संख्याओं का द्विअंकीय प्रणाली में निरूपण कर रहे हैं, सो अलग. और तो और इनमें गणित की सुप्रसिद्ध द्विपद प्रमेय [Binomial Theorem] भी छिपी बैठी है! यदि ल और ग दो चर हैं [या दो अवस्थायें हैं], तो (ल+) के विस्तार में लग का गुणांक = उन गणों की संख्या जिनमें दो लघु तथा एक गुरु है = ३ [ज‍गण, भगण, सगण]. तो इस प्रकार (ल+) = ल+ ३ल+ ३लग+ .

छन्दों से गणित और कम्प्यूटर विज्ञान का यह रास्ता पिंगल ने दिखाया. क्या यह एक संयोग ही है कि छन्दों के अध्ययन में भी हम विश्व में अग्रणी रहे और आज २५०० वर्षों के बाद कम्प्यूटर विज्ञान में भी अपनी सर्वोत्कॄष्टता सिद्ध कर चुके हैं! शायद यह सब हमारे उन पुरखों का आशीर्वाद है जिनकी कल की सोच की रोशनी हमारे आज को प्रकाशित कर रही है.

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हमारी पहचान – भाग ३

अक्टूबर 17, 2006

यह आलेख मूलत: एक टिप्पणी का जवाब है जो हमारे पिछले आलेख पर आयी थी (हमारे अंग्रेज़ी चिट्ठे में)

टिप्पणी: “विदेशियों के भारतीय लोगों से घृणा करने का कारण है कि अभी तक हमारी परम्परागत छवि बनी हुई है. बहुत से विदेशी भीड़-भाड़ वाले और प्रदूषित शहरों को लेकर शिकायतें करते हैं. बड़े शहरों जैसे मुम्बई, दिल्ली और बंगलौर में भी सबसे पहले आपकी नज़र भिखारियों पर पड़ती है. हम प्रगति तो कर रहे हैं, पर इन सभी कारणों से हमारी छवि जस-की-तस बनी हुई है.”

हमारे आलेख का मुख्य बिन्दु यह नहीं था, पर बात निकली है तो उस पर विचार भी होना चाहिये. इस टिप्पणी में जो कुछ कहा गया, काफ़ी सीमा तक सच भी है और चिंता का विषय भी. सबसे पहले  हमारी परम्परागत छवि आखिर है क्या? गन्दे शहर, गन्दे लोग? उससे भी पहले – हमारी परम्परा क्या है? यदि आप सोच रहे हैं कि प्रदूषित और भीड़-भाड़ वाले इलाके हमारी परम्परा हैं तो यह गलत है. तो आईये बात करें हमारे दो अलग-अलग पहलुओं की – हमारी परम्परा और हमारी परम्परागत छवि.

यदि बाहर के लोग सोचतें हैं कि गन्दगी ही हमारी परम्परा है, तो उनका भी क्या दोष! हां स्वयं अपने बारे में न जानना हमारे दोष अवश्य होगा. मैं एक उदाहरण देता हूं, जो ज़रा कुछ हटकर है. अमरीकी लोगों को देखिये, अंग्रेज़ी का उन्होंने जितना बेड़ा-गर्क किया है उतना किसी और ने नहीं! पर हमारे देश में इस टूटी-फूटी, या कहिये तोड़ी-फोड़ी गयी अमरीकन अंग्रेज़ी को बोलना आधुनिकता की निशानी माना जाता है. यदि नयी दिल्ली स्टेशन पर मैथिली या भोजपुरी में घोषणायें की जायें तो हम कहेंगे “भैया, किस गंवार को अनाउन्सर बना के बिठा दिया है”. ध्यान रहे, मैथिली और भोजपुरी हिन्दी की बोलियां हैं, हिन्दी का विकृत स्वरूप नहीं. क्या लास-एंजिल्स हवाई अड्डे पर विकृत अंग्रेज़ी में होने वाली घोषणाओं पर भी हमारी यही प्रतिक्रिया होगी? कतई नहीं!

परम्परायें आसमान से उतरकर नहीं आतीं, उन्हें हम बनाते हैं. हम जो आज करते है, कल वह परम्परा बन जाता है. कल्पना कीजिये, मुम्बई से फ़्रेंकफ़र्ट जाने वाले जहाज में कोई भारतीय नवयुवक धोती पहनकर आता है. यह निश्चित है कि उसको विदेशी लोग तो नहीं, पर हम जरूर जोकर कहेंगे. और कोई विदेशी जो बरमूड़ा पहनकर घुसा वह, उसका क्या? जब हम भारत में ही बड़ी-बड़ी दुकानों – वेस्ट साईड, रीबाक, प्लानेट एम इत्यादि में खरीदारी करने जाते हैं तब हिन्दी या क्षेत्रीय भाषा नहीं बोलते, आखिर  क्यों? ऐसा नहीं है कि हमें हिन्दी या क्षेत्रीय भाषा नहीं आती, घर पर तो दूध वाले और धोबी से हम अंग्रेज़ी में बात नहीं करते ना! हम सोचते हैं कि बड़ी जगहों पर अपनी भाषा बोलने से बाकी लोग हमें पिछड़ा समझेंगें. हमें अपनी छवि की कितनी चिन्ता है, और वह भी अपने ही लोगों के सामने! कैसी विडम्बना है, हम अपने लोग आपस में बात करने के लिये विदेशी भाषा की सहायता लें, और वह भी तब जब सामने वाले को भी अपनी देसी भाषा अच्छी तरह से आती है! हमारा आचरण देखकर ही हमारे बच्चे सीखते हैं, और परम्परायें बस ऐसे ही बनती हैं.

अब बात करते हैं हमारी बाहरी छवि, जैसे शहरों में गन्दगी के ढेर इत्यादि. आप ज़रा पहले भीड़-भाड़ वाले यूरोपीय शहर देखिये – पेरिस, फ़्रेंकफ़र्ट, बर्लिन, ब्रसेल्स आदि. इस दुनियां में ऐसा कौन सा शहर है जिसकी उपनगरीय रेल सेवा एक दिन में ६० लाख यात्रियों को ढोती हो? और वह भी जमीन के नीचे नहीं ऊपर! मुम्बई का कोई मुकाबला नहीं. पेरिस की मेट्रो सेवा ४० लाख यात्रियों को प्रतिदिन ढोती है (जमीन के नीचे!), और उसके स्टेशन कितने साफ़ हैं? आप वहां के स्टेशनों पर लगे टाइल्स न देखिये, असली गन्दगी की बात कीजिये. हमारी परिस्थितियों के हिसाब से हम बहुत अच्छा कर रहे हैं, यह मानना होगा. मैं प्रदूषण की पैरवी नहीं कर रहा, बल्कि यह कह रहा हूं कि प्रदूषण एक कीमत है जिसे आज दुनियां का हर बड़ा शहर चुका रहा है. मुख्य प्रश्न यह है कि हम इस बारे में क्या कर रहे हैं. हमारी प्रवृत्ति यह हो चली है कि हम किसी भी समस्या के ऊपर बैठ जाते हैं और चिल्लाने लगते हैं, समाधान का प्रयास भी नहीं करते. यदि आज सरकार निजी वाहनों पर प्रदूषण कर लगा दे तो कितने ही सरकार विरोधी नारे तैयार हो जायेंगे, सरकार को चूना लगाने के नये तरीके भी इज़ाद हो जायेंगे. कभी सोचिये कि इन विकसित देशों के लोग अपने-अपने देश की सरकारों को कितना सारा कर ईमानदारी से देते हैं. विकास मुफ़्त में नहीं आता, हमें कुछ तो कीमत अदा करनी होती है, प्रदूषण के रूप में हो, या कर के रूप में – पसंद अपनी अपनी!

पूरे १५० साल के शोषण के बाद हमें स्वतंत्रता मिली. पिछले ६० सालों में विभाजन की विभीषिका के बाद घुली धार्मिक कड़वाहट, गरीबी, जनसंख्या और नौकरशाही जैसी समस्याओं से जूझने के बाद भी तेज़ी से विकास की राह पर अग्रसर है, क्या यह मायने नहीं रखता? अभी इस वर्ष के शान्ति के नोबेल पुरस्कार विजेता श्री मुहम्मद यूनुस का नाम याद आ रहा है जिन्होंने अपने घर सोफ़े पर बैठे हुए टी.वी. पर गरीबी देखने और सरकार की बुराई करने की अपेक्षा समस्या से लड़ने का रास्ता चुना. उम्मीद है कि भारत के लोगों को भी इससे सीख मिलेगी. और जैसा कि हमारे राष्ट्रपति जी कहते हैं, हमारे में समस्याओं से लड़ने की क्षमता है, और हम जीतकर भी दिखायेंगे.

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हमारी पहचान – भाग २

अक्टूबर 15, 2006

गतांक से आगे…

अब आप पूछेंगे, कि अगर इतना सब हो रहा है तो फिर आप ”वंदे मातरम्” पर ये पुराना ढोल काहे बजाते रहते हो, कि हमारे पूर्वजों ने ये किया, वो किया? नये ज़माने की बात करो. इस सवाल का जवाब भी एक और सवाल में है. एक बात बताईये, कोई इन्सान भारतीय कब कहलाया जा सकता है? बताईये, जवाब इतना मुश्किल भी नहीं है. एक आदमी, नाम ”फ़कीरचंद” कोलकता में साइकिल रिक्शा चलाता है आप कैसे बतायेंगे कि वो भारतीय है कि नहीं? उसका जन्म भारत में हुआ के नहीं यह देख कर, या उसका पासपोर्ट (जो उसके पास है ही नहीं!) देख कर. नहीं, भारतीयता, खून में, दिल-ओ-दिमाग़ में होती है. आज हमारा हीरो फ़कीरचंद, रोटी खाता, बंगाली भाषा में बात करता है, जरूरत पडे तो हिन्दी बोल लेता है. बहुत मेहनत कर के अपना और अपने बच्चों का पेट पालता है. हर दुर्गा पूजा के लिये अपना पेट काट कर सालभर पैसा जमा करता है, माँ की मूर्ति खुद अपने हाथ से बनाता है. ”मछेर झोल और भात” उसे अच्छा लगता है. अब सोचिये यही फ़कीरचंद अब एक बहुत बड़ी सोफ्टवेअर कंपनी में काम करता है. कोलकता में ही रहता है. साल में छह महीने देश के बाहर गुज़ारता है. बीवी और बच्चों को हर शनिवार घुमाने ले जाता है, खाना पिज़्ज़ा हट या मैकडोनाल्ड में खाता है. ”क्या करें, आज काल बच्चे इन सब चीजों के बिना रह ही नहीं सकते” दुर्गापूजा, कालीपूजा इन सब बातों के लिये उसके पास वक्त नहीं है. घर में सब अंग्रेज़ी में बात करते है. बच्चों को बंगाली आती है, बस ”किच्छु किच्छु” (उतनी ही आती है!), पेप्सी या कोक के बिना उन्हें खाना हज़म नहीं होता. और कहानी ऐसे ही आगे बढ़ती रही. अब बताईये कौन सा फ़कीरचंद आपको ज़्यादा भारतीय लगता है?

अब इसमे किसी भी फ़कीरचंद या उसके बच्चों का कोई दोष नहीं. पानी वहीं बहता है जहां ढलान हो. भारत की प्रगति के साथ साथ भारतीयता भी बढ़नी जरुरी है. विदेशों से आनेवाली हर चीज़ बुरी नहीं. परंतु, हमें क्या लेना है क्या नहीं, यह निर्णय हमारा होना चाहिये. मुझे भी पिज़्ज़ा पसंद है पर मेरी माँ की बनायी हुई मूँग की दाल की खिचड़ी और मेथी का साग (देसी घी के साथ!), कोई तुलना नहीं.

आज कल कुछ लोग ”ब्राण्ड इण्डिया” की बात करते है. मुझे बहुत दुख होता है यह सुनकर. यह देश हमारी माँ है, हमें इसे बेचने के लिये नहीं सजाना है. हमे उसे उसी भक्तिभाव से सजाना है जैसे माँ दुर्गा को सजाते है. इसलिये नहीं कि दूसरे देश उसे देख कर उसका सम्मान करें. इसलिये हम उसके बच्चे है. भारत महान था, है, और रहेगा. उसके लिये इश्तेहार लगाने कि ज़रूरत नहीं. कल आज और कल के इस खेल में अगर हमें जीतना है तो हमें जानना होगा की हम कल क्या थे और आज क्या हैं. सबसे ज़्यादा ज़रूरी यह है की आज हम जो भी हैं, वो हम कैसे बने? अगर हमारा कल समृद्ध था तो आज हम समृद्ध क्यों नहीं? ऐसी हमने कौन सी ग़लतियां कीं जिसका यह परिणाम है. हमें हमारी पहचान नहीं भूलनी है, नहीं तो हम जीत कर भी हार जायेंगे. हो सकता है कि एक दिन मैकडोनाल्ड को भी एक भारतीय कंपनी द्वारा खरीद लिया जाय, लेकिन वो तब तक भारतीय नहीं होगा जब तक उसमे, बर्गर के साथ साथ ”सरसों दा साग ते मक्के दी रोटी” ना मिले. जिस दिन ऐसा होगा, मित्रों, उस दिन मै गंगा में डुबकी लगाऊंगा. और अगर ऐसा न हुआ तो कमबख्त ”चाय” पीना छोड़ दूँगा!

क्रमश:… हमारे हिन्दी और अंग्रेजी चिट्ठों पर आयी टिप्पणियों से प्रेरित विचारों के साथ

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हमारी पहचान – भाग १

अक्टूबर 13, 2006

हमें शिकायत है, सारे जहां से शिकायत है. क्या कहा? क्यों? कभी भारत देश के बाहर किसी विकसित देश में निकले हो? नहीं? तो फिर कई तरह की बदनामी से बच गये भैया! ये विकसित देश वही देश हैं जहाँ, बच्चों को एक उम्र के बाद माँ-बाप से मिलने के लिये अपोइन्ट्मेन्ट लेना पड़ता है, मतलब अगर बच्चे मिलना चाहें तो! हाँ, कोई जबरदस्ती नहीं. जहाँ इतनी आज़ादी है के बच्चे अपने माता-पिता पर मुकदमा चला सकते है अगर उन्हे डाँटा गया तो. हाँ, तो मै क्या कह रहा था? हाँ, शिकायत है. शिकायत यह है की इन देशों के बहुत से लोग हमारे देश को इज्जत नहीं देते. कहने को मुँह खोल के भारत को “अनोखा देश, रंगबिरंगा देश, अनगिनत भाषाओं का देश कहेंगे” लेकिन चार दिन इन लोगों के साथ गुज़ारिये पता चल जायेगा कि ये लोग हमारे बारे में क्या सोचते है. अब इस जगह मैं वाचकों को दो हिस्सों में बाँटना चाहूँगा. एक जो इस विचारधारा के हैं, कि भैया वो लोग कुछ भी सोचें, हमें तो अपने रस्ते चलते रहना है. मैं ऐसे साधु पुरुषों को और स्त्रियों को सादर विनती करूँगा कि अभी इस लेख को पढ़ना बन्द कर दें. दूसरा गुट है ऐसे लोगों का जिन्हें ऐसी ही शिकायत है. तो मेरे शिकायत प्रधान बन्धुओं और भगिनिओं आओ, सोचें कि यह सब क्या है और क्यूँ है? हम बात करेंगे कुछ सवालों की और उनके जवाबों की. शुरु करें?

हाँ तो सबसे पहला सवाल, क्यूँ भाई भारत के लोग सर के बल चलते हैं या चाँदी सोना उगाते है जो सारी दुनियाँ उनका सम्मान करे? कुछ लोग कहेंगे, क्या बात करते हो? हमारे देश कि सांस्कृतिक धरोहर देखो, मंदिर देखो, हमारी विविधता में एकता देखो. जानते हो, शून्य की खोज हमारे देश में हुई, तुम जिसे पाइथागोरस थ्योरम के नाम से जानते हो उसे पाइथागोरस के २५० साल पहले बौधायन ने खोजा था. दिल्ली का लौह स्तंभ जानते हो १२०० साल तक खुली हवा, धूप, बारिश झेलते हुए खडा है, आज तक कोई माई का लाल वैसा लोहा तैयार नहीं कर सका है. दुनियाँ भर के वैज्ञानिक थक गये. भास्कर, आर्यभट्ट, पाणिनी, सुश्रुत नाम भी सुने है? दुनियाँ की सबसे पहली प्लास्टिक सर्जरी सुश्रुत ने की थी सदियों पहले. अणु कि खोज महर्षि कणाद ने इन फिरंगो से हजारों साल पहले की थी. वेद, गीता जैसे ग्रन्थ यहाँ लिखे गये. दुनियाँ का सबसे पहला विश्वविद्यालय हमारे यहाँ बना. अरे, जब यह आज के विकसित देश के लोग जानवरों की तरह जंगलों मे घूमते थे और कपडे़ पहनना सीख रहे थे, तब मेरे देश मे लोग सोने के तारों से भी वस्त्र बुना करते थे! शान्ति, शान्ति, शान्ति! मानते हैं आपकी बात. लेकिन यह तो हुई पुरानी बात. अब क्या हो रहा है? आज हम क्या हैं? अब हम फिर से बचे हुए वाचकों को दो हिस्सों में बांटते है. एक जो कहेंगे हाँ भाई सच है, इन लालची नेताओं ने हमें कहीं का नहीं छोडा. इसीलिये तो हम भारत छोड़कर यहाँ आकर बस गये. या फिर, इसी लिये हम कोशिश कर रहे है कि हमारा बेटा अमरीका मे बस जाये और हमें भी एक दिन इस नरक से छुटकारा दिला दे. वैसे हम वहाँ पर जाकर एक ब्लॉग शुरु करेंगे जिसमें अपने देश के बारे में उसकी महानता के बारे मे लिखेंगे. ऐसे लोग इस लेख को आगे पढकर अपना वक्त ज़ाया न करें, अमरीकी दूतावास कि क़तार बहुत लम्बी होती है, अभी जाकर नम्बर लगायेंगे तो शायद वीज़ा मिल जाये. जय रामजी की. हाँ भई, दूसरे हिस्से मे कोई बचा है? हाँ बिल्कुल हैं, धन्यवाद. आप ही देश कि आशा हैं. चलिये अब बात को आगे बढाते है. और आज की बात करते है.

एक वक्त हम भी काफ़ी निराश थे अपने देश से, लेकिन अब सूरत बदलती नजर आ रही है. बात है १९९१ की, जब प्रधान मंत्री पी.वी. नरसिम्हाराव के नेतृत्व में वित्त मंत्री डा. मनमोहन सिंह ने भारत की अर्थव्यवस्था का वैश्वीकरण शुरु किया. अब तो लोगों को विश्वास हो गया कि हम फिर से गुलामी की ओर जा रहे हैं. अब हर भारतीय कंपनी को विदेशी कंपनियाँ खरीद लेंगी. और ऐस कई मामलों में हुआ भी, केल्विनेटेर, लिम्का, गोल्ड स्पोट, जैसे कई उदाहरण दिये जा सकते है. लेकिन आज क्या हो रहा है १५ साल बाद? बात ज्यादा पुरानी नहीं है, ५ सितंम्बर २००६, एक सर्वेक्षण के अनुसार, १ जनवरी २००६ से ३० जून २००६ तक के छ्ह महीनों में, भारतीय कंपनियों ने २५५ विदेशी कंपनियों पर कब्जा कर लिया है या बहुत बड़ा हिस्सा खरीद लिया है. और इनमें से लगभग सारी कंपनियां विकसित देशों की ही है. इस सारी ”शोपिंग” की कीमत है लगभग १७ अरब अमरीकी डालर. पिछले साल इसी दौरान भारतीय कंपनियों ने ६ अरब अमरीकी डालर की खरीदारी की. मतलब १७५ प्रतिशत कि बढ़ोत्तरी एक साल के अन्दर. भारत आज तीसरा सबसे ज्यादा तेजी से विदेशी कंपनियाँ खरीदने वाला देश बन गया है. इसका मतलब ये कि जिस तरह से जब हम भारत में बने हुए शीतल पेय खरीदते है तब उस से होने वाला मुनाफ़ा भारत में नहीं भारत के बाहर बैठे उस कंपनी के मलिक के जेब में जाता है. वैसे ही अब भारतीय कंपनियाँ विदेशों से पैसा कमाकर हमारे देश को समृद्ध बनाने में मदद करेंगी. भारत की कई बड़ी समस्यायें भारत के लिये फायदेमंद साबित हो रही है. पहली समस्या – जनसंख्या. आज भारतीय नागरिक की औसत उम्र बहुत से देशों से कम है. मतलब, आने वाले २०-२५ सालों भारत में तुलनात्मक रुप से सबसे ज़्यादा जवान हाथ होंगे जब बाकी देशों में बूढ़ों की संख्या जवानों से ज्यादा होगी. दूसरी समस्या, भारत में व्यापार करना आग में चलने के बराबर है, जिसकी वजह से भारतीय व्यापारी, विदेशी व्यापरियों से ज्यादा आसानी से चुनौतियों का सामना कर पाते है. उदाहरणार्थ, फ़्रांस में आज व्यापार प्रबंधन के क्षेत्र में, किसी अभ्यर्थी के पास भारत में काम करने का अनुभव होना विशेष योग्यता माना जाता है. कई बड़ी-बड़ी विदेशी कंपनियों का प्रबंधन भारतीयों के हाथ है. भारत की अर्थव्यवस्था आज ८% की गति से बढ़ रही है. टाटा, रिलायंस, वीडियोकोन ही नहीं छोटी छोटी कंपनियाँ भी अब बहुराष्ट्रीय बन रही हैं. सिर्फ़ निजी कंपनियाँ ही नहीं, ओ.एन.जी.सी. जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम भी दुनियाँ भर में अपने हाथ-पाँव फैला रहे हैं. सूचना प्रौद्यौगिकी और दवा के क्षेत्र में भारत विश्वस्तर पर प्रसिद्ध है ही.

क्रमश:

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विनोबा की गीता-प्रवचन

सितम्बर 8, 2006

बात महाराष्ट्र की धुलिया जेल की है. साल था १९३२. ब्रिटिश सरकार ने स्वाधीनता आन्दोलन में भाग लेने के कारण कई देशभक्तों को यहाँ बंदी बना रखा था. इन्हीं में से एक थे आचार्य विनोबा भावे. अब बैठे-बैठे जेल में क्या किया जाय? सह-कैदियों को एक विचार आया और उन्होंने आचार्य से एक निवेदन किया. फलस्वरूप हर रविवार को मण्डली जमती और आचार्य विनोबा भावे गीता के एक अध्याय पर अपना गहन चिंतन बहुत ही सरल भाषा में सबके सामने रखते. इस तरह एक-एक करके सभी अठारह अध्याय बाकी बंदियों के जीवन में भी सहज रूप से घुल गये. साने गुरुजी भी उस समय धुलिया जेल में बंद थे और उन्होंने आचार्य विनोबा भावे के प्रवचनों को लिपिबद्ध कर लिया. मूल रूप से मराठी में उपलब्ध इन प्रवचनों का अनुवाद और भी कई देशी-विदेशी भाषाओं में हुआ. हिन्दी अनुवाद ‘गीता-प्रवचन’ के नाम से विख्यात है.

अब गीता के गूढ़ रहस्य को कितने सरल शब्दों में ढाला जा सकता है, यह देखिये चौदहवें अध्याय से लिया गया गीता-प्रवचन का एक अंश:

“यह स्वधर्म कैसे सुनिश्चित किया जाय? – ऐसा कोई प्रश्न करे तो उसका उत्तर है – ‘वह स्वाभाविक होता है’. स्वधर्म सहज होता है. उसे खोजने की कल्पना ही विचित्र मालूम होती है. मनुष्य के जन्म के साथ ही उसका स्वधर्म जन्मा है. बच्चे के लिये जैसे उसकी माँ नहीं खोजनी पड़ती, वैसे ही स्वधर्म भी किसी को खोजना नहीं पड़ता. वह तो पहले से ही प्राप्त है. हमारे जन्म के पहले भी दुनियाँ थी और हमारे बाद भी वह रहेगी. हमारे पीछे भी एक बड़ा प्रवाह था और आगे भी वह है ही – ऐसे प्रवाह में हमारा जन्म हुआ है. जिन माँ-बाप के यहां मैंने जन्म लिया है, उनकी सेवा; जिन पास-पड़ोसियों के बीच मैं जन्मा हूँ , उनकी सेवा; – ये कर्म मुझे निसर्गत: ही मिले हैं. फिर मेरी वृत्तियाँ तो मेरे नित्य अनुभव की ही हैं न? मुझे भूख लगती है, प्यास लगती है; अत: भूखे को भोजन देना, प्यासे को पानी पिलाना, यह धर्म मुझे स्वत: ही प्राप्त हो गया. इस प्रकार यह सेवारूप, भूतदयारूप स्वधर्म हमें खोजना नहीं पड़ता. जहाँ कहीं स्वधर्म की खोज हो रही है, वहाँ निश्चित समझ लेना चाहिये कि कुछ न कुछ अधर्म हो रहा है.”

सच, अगर सोच इतनी सरल हो तो जीवन में कितनी समस्यायें स्वत: हल हो जायें!

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लौटकर आगे बढ़ें

अगस्त 31, 2006

ज्ञान की प्राप्ति का सही मार्ग क्या है? वह कौन सी दिशा है जिसका अनुकरण करने पर ज्ञान के साथ साक्षात्कार संभव है? सदियों से मानव इसी भूल-भुलैया में उलझा हुआ है. ऐसे बहुत से संदेहों का निराकरण सदियों पहले हमारे गुरु, हमारे ऋषि कर गये हैं. स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने कहा था वेदों की ओर जाओ. सचमुच हमारे वेद, उपनिषद इत्यादि ज्ञान का अनुपम भण्डार हैं. उपनिषदों में गुरु-शिष्य वार्तालाप के माध्यम से मानव मन में यदा-कदा उठने वाली शंकाओं को सामान्य, परन्तु बहुत गहरे ढंग से सुलझाया गया है. हर प्रश्न का उत्तर देने के बाद गुरु कहता है, “नेति नेति – यही इति नहीं है, और भी दिशायें हैं, संभावनायें हैं. अत: हे शिष्य, स्वविवेक का प्रयोग करो”. ऐसी खुली सोच अन्यत्र विरले ही देखने को मिलती है.

ऋग्वेद का यह श्लोक देखिये:

नासदासीन् नो सदासीत् तदानीं नासीद् रजो नो व्योमापरो यत्
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद् गहनं गभीरम्

अर्थात् जब होने, न होने का कुछ अर्थ ही नहीं था, तब क्या था? यह सोच बड़ी गहरी है, दार्शनिक है, वैज्ञानिक है. समय की गूढ़ संकल्पना का मूल है यह सोच. आज का विज्ञान तथ्य खोजता है. जो भौतिक है उसे खोजता है, पर हमारे प्राचीन विज्ञान में भी दर्शन छिपा था और दर्शन में विज्ञान. एक दृष्टि से कहें तो किसी भी प्रकार के ज्ञान की खोज का मार्ग एक ही है, जिसे संक्षेप में ईश्वर की खोज भी कहा जा सकता है. अत: ईश्वर को विज्ञान से भिन्न समझना ठीक नहीं है.

नानक साहब ईश्वर के बारे में अपने मूल मन्तर में बहुत कुछ कह गये:

इक ॐकार, सतनाम, कर्ता-पुरख, निरभौ-निर्वैर, अकाल मूरत, अजुनि सैभंग, गुरपरसाद जप
आद सच, जुगाद सच, है भी सच, नानक होसी भी सच

यहाँ ‘जुगाद’ शब्द सृष्टि के आरम्भ से पहले समय की अवधारणा की ओर इंगित करता है.

समय के साथ-साथ दर्शन, विज्ञान और धर्म अलग हुए. परिणामस्वरूप विज्ञान और धर्म दोनों की ही परिभाषायें क्षीण हुयीं. यदि आधुनिक विज्ञान का विकास हमारी मूल सोच के साथ हुआ होता तो शायद बम न बनते. यदि आधुनिक धर्मों का विकास हमारी मूल सोच के साथ हुआ होता तो शायद बमों की आवश्यकता न होती.

(मूल मन्तर का शाब्दिक अनुवाद: एक ही सृष्टिकर्ता है. जिसका नाम, जिसका अस्तित्व अनंत काल से सत्य है. वही एकमात्र रचयिता है. वह भयहीन है, वह सबसे समान रुप से प्रेम करता है. वह सनातन है, समय की सीमाओं से परे है. वह जीवन-मॄत्यु के चक्र से अलग है, वह स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित है. उसके दर्शन गुरु के प्रताप से ही संभव हैं. ऐसे अनादि ईश्वर का ध्यान करना चाहिये. ईश्वर आरम्भ में भी सत्य था और समय के आरम्भ के पहले भी सत्य था. वह अभी भी सत्य है और सतगुरु नानक कहते हैं कि वह सदा सत्य रहेगा.)