Archive for the ‘व्यक्तित्व’ Category

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आर. के. लक्ष्मण

अक्टूबर 20, 2006

उम्र कुछ पचास की होगी, सिर पर बालों का नामो-निशान नहीं, एक धोती और सादी सी कमीज के एक साथ चश्मा, जो मानो अभी नाक से फ़िसलने ही वाला है! यह आखिर है कौन? अरे! ये तो मैं हूं, आप भी हैं – यह है एक आम आदमी! सुप्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण का आम आदमी. बरसों से अपने कितने ही दिनों की शुरुआत करते आ रहे हैं हम समाचार पत्रों के पहले पन्ने के किसी कोने में बैठे इस आम आदमी के साथ. हममें से कितनों के जीवन में हर दिन एक नयी प्रेरणा, एक नयी ऊर्जा का संचार करता आ रहा है हमारा अपना ही प्रतिबिंब यह आम आदमी, मानो कि धुंधलके में एक आशा की किरण हो. समय चुनावों का हो या घोटालों का, या फिर कोई भ्रष्टाचार, हमारा यह आम आदमी सब पर अपनी पैनी रखता आ रहा है. उसकी खामोशी में कभी परिपक्वता नज़र आती है, तो कभी मजबूरी. वह हमारे देश की आम जनता का सच्चा प्रतिनिधि है.

आमतौर पर माना जाता है कि कार्टून मासूम बच्चों के दिलों को ही छूते हैं. कार्टूनों की दुनियां में मनुष्य व अन्य जानवर बड़े ही laxman3.jpg सामंजस्य के साथ रहते हैं. विज्ञान के शुष्क सिद्धान्तों का कार्टूनों में कोई स्थान नहीं होता, बल्कि एक विचित्र कल्पना ही उभरकर सामने आती है. कार्टूनों का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन ही होता है अत: उनके संसार कोई पीड़ा नहीं होती, पर लक्ष्मण के कार्टून इन सबसे हटकर हैं. उनके कार्टून पात्र उसी हवा में सांस लेते हैं जिनमें एक आम भारतीय. राह चलते, बाज़ारों में, घर पर या कार्यालय में जो भी कष्ट एक आम भारतीय को हो सकते हैं वे सभी कष्ट लक्ष्मण के पात्र हमारे साथ बांटते हैं.

आर.के. लक्ष्मण का जन्म १९२४ में सांस्कृतिक नगर मैसूर में हुआ. वे आठ भाई-बहनों में सबसे छोटे हैं. मैसूर के प्रतिष्ठित महाराजा कालेज से स्नातक के पश्चात उन्होंने १९४७ में कार्टूनों की दुनियां में कदम रखा. टाइम्स आफ़ इण्डिया समाचार पत्र में उन्होंने “यू सैड इट” नामक कार्टून श्रृंखला शुरू की जिसके माध्यम से उनका आम आदमी हर एक आम आदमी से रोज़ सुबह मिला करता था. कार्टूनों के अलावा उन्होंने कुछ लघु-कथायें, निबन्ध, यात्रा वृतांत व उपन्यास भी लिखे और बाद में “द टनल आफ़ टाइम” नाम से अपनी आत्म-कथा भी प्रकाशित की.

उनके बड़े भाई आर.के. नारायण की कहानियों पर आधारित दूरदर्शन धारावाहिक “मालगुडी डेज़” के छोटे से कस्बे की मिट्टी मानो लक्ष्मण के कार्टूनों को पाकर सोंधी होकर महक उठी हो. जब स्वामी क्रिकेट खेलता नज़र आता है, तब अहसास होता है कि वे पात्र कितने सच्चे थे, कितने जीवंत थे. मुझे वे सभी चेहरे अच्छे से याद है; उन्हें कोई भूल भी कैसे सकता है आखिर.

लक्ष्मण अपने काम में छोटी से छोटी बारीकियों पर विशेष ध्यान देते हैं. किसी स्थिति विशेष अथवा पात्रों के उल्लास, निराशा या धैर्य का चित्रण करना हो तो उनके द्वारा उकेरी हुई कुछ घुमावदार रेखायें ही काफ़ी होती हैं. उनके कार्टूनों की सरलता ही उनकी सुंदरता है और उनका हास्य पक्ष भी. उनका सबसे लोकप्रिय पात्र अपने आस-पास की घटनाओं का एक मूक दर्शक है, जिसके हाव-भाव ही उसकी मनो: स्थिति स्पष्ट कर देते हैं.

आर. के. लक्ष्मण को केवल एक कार्टूनिस्ट ही नहीं कहा जा सकता. उन्होंने एक सीधे-सच्चे व्यंग्य के माध्यम से हमें सामाजिक और राजनैतिक रूप से अधिक जागरूक भी बनाया है. यदि उनके कार्टून न होते तो हममें से कई लोग, भ्रष्टाचार और आये दिन होने वाले घोटालों से तंग आकर निराशावादी हो जाते. जो निश्चेष्ट हुए उनको लक्ष्मण के कार्टूनों ने एक मूक दर्शक से सक्रिय किया – कुछ आड़ी-तिरछी रेखाओं, वक्रों और पेंसिल थामे सधे हुये हाथों तथा एक तीक्ष्ण दिमाग़ की चतुराई भर से ही!

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हम करें राष्ट्र आराधन

अक्टूबर 1, 2006

एक गीत की धुन से पूरा सभागार गूँज रहा है. इस जोशीले देशभक्ति गीत ने सबके पैरों को थिरकने पर मजबूर कर दिया है. शब्दों के साथ-साथ संगीत भी मंत्रमुग्ध कर देने वाला है. गीत के बोल हैं – हम करें राष्ट्र आराधन.

यह गीत ९० के दशक के दूरदर्शन धारावाहिक ‘चाणक्य’ का प्रमुख गीत था. चाणक्य भारत के अग्रणी राजनैतिक विचारकों में से एक थे. फिर भी उनके बारे में अधिक लिखित सामग्री उपलब्ध नहीं है. इस धारावाहिक ने उनके जैसे महान व्यक्ति का जीवन-चित्र प्रस्तुत कर एक सराहनीय कार्य किया. भारत के बाहर लोग चाणक्य के बारे में बहुत कम ही जानते हैं जबकि मैकियावेली जैसे दूसरे देशों के राजनैतिक विचारक सुविख्यात हैं.
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चाणक्य या कहें कि विष्णुगुप्त अथवा कौटिल्य, ने तक्षशिला विश्वविद्यालय में वेदों का गहन अध्ययन किया. क्या यह गौरव का विषय नहीं कि दुनियाँ के सबसे पुराने विश्वविद्यालय, तक्षशिला और नालन्दा भारतीय उपमहाद्वीप में थे. और हाँ, ध्यान देने योग्य बात यह है कि हम ५०० से ४०० वर्ष ईसा पूर्व की बात कर रहे हैं. तक्षशिला एक सुस्थापित शिक्षण संस्थान था और माना जाता है कि पाणिनी ने संस्कृत व्याकरण की रचना यहीं की थी. चाणक्य भी बाद में यहाँ नीतिशास्त्र के व्याख्याता हुए (कुशाग्र छात्र, है न!). ऐसा कहा जाता है कि वे व्यवहारिक उदाहरणों से पढ़ाते थे. यूनानी लोगों के तक्षशिला पर चढ़ाई करने कारण से वहाँ एक राजनैतिक उथल-पुथल मच गयी और चाणक्य को मगध में आकर बसना पड़ा. उन्हें नि:संदेह एक राजा के निर्माता के रूप में अधिक जाना जाता है. चंद्रगुप्त मौर्य विशेष रूप से उनकी सलाह मानते थे. शत्रुओं की कमज़ोरी को पहचाकर उसे अपने काम में लाने की विशिष्ट प्रतिभा के चलते चाणक्य हमेशा अपने शत्रुओं पर हावी रहे. उन्होंने तीन पुस्तकों की रचना की- ‘अर्थशास्त्र‘, ‘नीतिशास्त्र’ तथा ‘चाणक्य नीति’. ‘नीतिशास्त्र’ में भारतीय जीवन के तौर-तरीकों का विवरण है तो ‘चाणक्य नीति’ में उन विचारों का लेखा-जोखा है जिनमें चाणक्य विश्वास करते थे और जिनका वे पालन करते थे.

राष्ट्रीय नीतियों, रणनीतियों तथा विदेशी संबंधो पर लिखी गई ‘अर्थशास्त्र’ उनकी सर्वाधिक विख्यात पुस्तक है. प्रबंधन की दृष्टि से एक राजा तथा प्रशासन की भूमिका तथा कर्तव्यों को यह पुस्तक स्पष्ट करती है. यह पुस्तक एक राज्य के सफल संचालन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती है. उदाहरण के लिये यह न सिर्फ़ आपदाओं तथा अनाचारों से निपटने की राह बताती है बल्कि अनुशासन तथा नीति-निर्धारण के तरीकों का भी उल्लेख करती है. इसी विषय पर लिखी एक और पुस्तक है ‘द प्रिंस‘ जो कि मैकियावेली द्वारा रचित है, हालांकि विषय समान होते हुए भी यह पुस्तक चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ से सर्वथा भिन्न है. मैकियावेली पन्द्रहवीं शताब्दी के इतालवी राजनैतिक दार्शनिक थे. अपनी सत्ता को का़यम रखने के लिये एक महत्वाकांक्षी उत्तराधिकारी को क्या नीतियाँ अपनानी चाहिये, उनकी किताब इसी विषय पर केंद्रित है. उनके विचार अतिवादी माने जाते हैं क्योंकि उनके मतानुसार तानाशाही राज्य में स्थिरता बनाये रखने का सर्वोत्कृष्ट मार्ग है. शक्ति तथा सत्ता प्राप्ति को उन्होंने नैतिकता से भी महत्वपूर्ण माना है. लगभग २००० वर्षों के अंतराल वाली इन दो कृतियों की तुलना करना बेहद रोचक है.

दुनियाँ मुख्यत: मैकियावेली को ही जानती है. भारतीय होने के नाते हम कम से कम इतना तो ही कर ही सकते है कि सर झुका कर उस महान शख्सियत को नमन करें जिसका नाम था-चाणक्य.