Archive for the ‘विज्ञान’ Category

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कहानी दो अंकों की

जनवरी 21, 2007

कला और विज्ञान को आमतौर पर अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है. अंग्रेज़ों द्वारा तैयार की गयी वर्तमान भारतीय शिक्षा प्रणाली में भी दोनों विषय माध्यमिक स्तर पर ही अलग कर दिये जाते है. क्या कला और विज्ञान साथ-साथ नहीं चल सकते? अगर कोई कहे कि कम्प्यूटर क्रांति कला की एक बड़ी देन है तो उस व्यक्ति पर निश्चित रूप से संदेह की दृष्टि से देखा जायेगा!

कला और विज्ञान का एकात्म स्वरूप के ईसा से कोई ५०० वर्ष पूर्व भारतीय विद्वान पिंगल को विदित था. यदि कहें कि कम्प्यूटर क्रांति का स्रोत पिंगल की इसी सोच में छिपा है, तो गलत न होगा! कैसे? आइये जानने का प्रयास करें.

कम्प्यूटर जो भी कुछ करता है, उसमें एक गणना छिपी होती है. अब एक निर्जीव वस्तु गणना कैसे करे, और उस वस्तु को गिनती समझायी जाय तो भला कैसे! यह सब संभव है द्विअंकीय प्रणाली के माध्यम से. ये दो अंक १ और ० हार्ड डिस्क के किसी क्षेत्र के चुम्बकीयकृत होने या न होने को निरूपित कर सकते हैं या सी.डी. के किसी स्थान पर प्रकाश के ध्रुवीयकरण की दो अलग अवस्थाओं को भी. अब प्रश्न यह है कि इसमें कला कहाँ से आ गयी? तो जवाब है कि यह विचार कि किसी वस्तु की दो अवस्थाओं के आधार पर कोई भी कठिन से कठिन गणना संभव है, कला से ही आया. अब सोचिये न, ये दो अवस्थायें कविता में प्रयोग किये जाने वाले छन्दों के किसी स्थान पर लघु अथवा गुरु होने का निरूपण भी तो कर सकतीं हैं! द्विअंकीय सिद्धान्त यहीं से आया! पिंगल के छन्द शास्त्र में पद्यों में छिपे इस सिद्धान्त का वर्णन बहुत सहजता और वैज्ञानिक ढंग से किया गया है.

पिंगल ने कई छन्दों का वर्गीकरण आठ गणों के आधार पर किया. इस वर्गीकरण को समझने के लिये पहले देखें एक सूत्र: “यमाताराजभानसलगा“. यदि मात्रा गुरु है तो लिखें १ और यदि लघु है तो ०. अब इस सूत्र में तीन-तीन अक्षरों को क्रमानुसार लेकर बनायें आठ गण,

  • यगण = यमाता = (०,१,१)
  • मगण = मातारा = (१,१,१)
  • तगण = ताराज = (१,१,०)
  • रगण = राजभा = (१,०,१)
  • जगण = जभान = (०,१,०)
  • भगण = भानस = (१,०,०)
  • नगण = नसल = (०,०,०)
  • सगण = सलगा = (०,०,१)

अब ये आठ गण यूँ समझिये कि हुये ईंट, जिनसे मिलकर कविता का सुंदर महल खड़ा है. इन ईंटों का प्रयोग करके बहुत से सुंदर छन्द परिभाषित और वर्गीकृत किये जा सकते हैं. यही नहीं, ये आठ गण ० से लेकर ७ तक की संख्याओं का द्विअंकीय प्रणाली में निरूपण कर रहे हैं, सो अलग. और तो और इनमें गणित की सुप्रसिद्ध द्विपद प्रमेय [Binomial Theorem] भी छिपी बैठी है! यदि ल और ग दो चर हैं [या दो अवस्थायें हैं], तो (ल+) के विस्तार में लग का गुणांक = उन गणों की संख्या जिनमें दो लघु तथा एक गुरु है = ३ [ज‍गण, भगण, सगण]. तो इस प्रकार (ल+) = ल+ ३ल+ ३लग+ .

छन्दों से गणित और कम्प्यूटर विज्ञान का यह रास्ता पिंगल ने दिखाया. क्या यह एक संयोग ही है कि छन्दों के अध्ययन में भी हम विश्व में अग्रणी रहे और आज २५०० वर्षों के बाद कम्प्यूटर विज्ञान में भी अपनी सर्वोत्कॄष्टता सिद्ध कर चुके हैं! शायद यह सब हमारे उन पुरखों का आशीर्वाद है जिनकी कल की सोच की रोशनी हमारे आज को प्रकाशित कर रही है.

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आसमान से आगे

जनवरी 17, 2007

एक और सफ़ल प्रक्षेपण! भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने १० जनवरी २००७ को ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण वाहक (पी.एस.एल.वी.) को चार उपग्रहों के साथ आकाश में रवाना कर वर्ष की धमाकेदार शुरुआत कर ही दी. एक वाहक में चार उपग्रह अपने आप में बड़ी उपलब्धि है. इन चार में से दो उपग्रह हमारे थे और दो दूसरे देशों के.

जब भी इसरो ऐसी सफलता प्राप्त करता है, मुझे दो घटनायें याद आ जाती हैं. तो पहले उन्हीं का उल्लेख करते हैं. पहली घटना है, प्रख्यात रसायनज्ञ प्रो. रघुनाथ अनंत मशेलकर का एक व्याख्यान जिसमें उन्होंने भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों का ज़िक्र किया था. वे दक्षिण अफ़्रीका में एक ऐसे उपग्रह केन्द्र की यात्रा पर थे जहाँ विश्व के अनेक देशों द्वारा अंतरिक्ष में स्थापित उपग्रहों से प्राप्त जानकारी एकत्रित की जाती है और यथोचित रूप से वितरित की जाती है. प्रो. मशेलकर ने केन्द्र के अधिकारियों से अनुरोध किया कि वे उपग्रहों से प्राप्त सर्वश्रेष्ठ तस्वीरें उनको दिखायें. अधिकारी उनको एक कोने में ले गये और वहाँ आई.आर.एस.-१ सी द्वारा ली गयी तस्वीरें दिखायीं. जी हाँ, आई.आर.एस. मतलब इण्डियन रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट! प्रो. मशेलकर के लिये यह हर्ष और गर्व की सुखद अनुभूति थी.

दूसरी घटना है मई १९९८ की जब भारत ने नाभिकीय परीक्षण किये थे. उसके बाद अमेरिकी खुफिया विभाग सी.आई.ए. को सरदर्द हुआ कि उनके “की होल श्रृंखला” के जासूसी उपग्रह, खास तौर पर के.एच.-११, भला इस बात का पता पहले से कैसे नहीं लगा पाये. इस बारे में एक भारतीय अधिकारी ने कहा था कि यह अमेरिका की असफ़लता नहीं बल्कि भारत की सफ़लता है. हमको पता था कि उनके उपग्रह कब और क्या देखने में सक्षम हैं. इसका अर्थ अमेरिकी खुफ़िया विभाग के ही एक अधिकारी के इस कथन से समझा जा सकता है – “जिस देश के पास खुद इस तरह के आधा दर्जन उपग्रह हों, और जिसके एक दर्जन से अधिक उपग्रह अंतरिक्ष में घूम रहे हों, उसको आप इस प्रकार से बेवकूफ़ नहीं बना सकते. वे अच्छी तरह से जानते थे कि हम क्या देख रहे हैं और क्या नहीं”!

आइये जानें कि अपनी स्थापना के पश्चात् पिछले ४० वर्षों में इसरो की क्या उपलब्धियाँ रहीं. एक प्रक्षेपण में दो मुख्य भाग होते हैं – वाहक और उपग्रह. इन दोनों में प्रयोग होने वाली तकनीकियाँ सर्वथा भिन्न और क्लिष्ट होती हैं. और खर्चा तो होता ही है (हालांकि इसरो नासा के वार्षिक बजट के पचासवें हिस्से से भी कम धन में काम चला लेता है!). इसरो ने शुरु में उपग्रह निर्माण की तकनीकी विकसित की और अपने उपग्रहों को विदेशी प्रक्षेपकों सहायता से अंतरिक्ष में स्थापित किया. साथ-साथ प्रक्षेपक राकेटों के निर्माण की ओर भी ध्यान दिया गया. शुरु के प्रक्षेपक राकेट, जैसे एस.एल.वी.-३ कम भार वाले उपग्रहों (लगभग ४० किलोग्राम) को ही पृथ्वी से करीब ४०० किलोमीटर तक ले जाने में सक्षम थे. हमने प्रगति जारी रखी और यह सफ़र ए.एस.एल.वी. और पी.एस.एल.वी. से होते हुये अब जी.एस.एल.वी. तक आ पहुँचा है जो करीब २००० किलोग्राम के उपग्रह को भूस्थैतिक कक्षा (पृथ्वी से ३६००० किलोमीटर) में स्थापित करने में सक्षम है! यहाँ यह इंगित करना उचित होगा कि इसमें से अधिकांश तकनीकी स्वयं इसरो ने विकसित की है. यह कुछ निराशावादी भारतीयों और निष्क्रिय मीडिया की ही सोच की देन है कि हममें से बहुतों के विचार से हम विदेशों से तकनीकी खरीदते हैं या नकल करते हैं. खैर, मीडिया वाले भी दिवाली का राकेट बनाने और जी.एस.एल.वी. बनाने में अंतर की समझ कहाँ से रखें! रूस के नकलची – यह है खिताब हमारे कर्मठ वैज्ञानिकों और अभियन्ताओं का! ये वही वैज्ञानिक हैं जिन्होंने क्रायोजेनिक इंजन की तकनीकी स्वयं ही विकसित कर ली है! जाने दीजिये, इस बारे में चर्चा फिर कभी.

आज इसरो आकाश से बातें कर पा रहा है क्योंकि उसकी नींव विक्रम साराभाई, सतीश धवन, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और अन्य वैज्ञानिकों के मजबूत कंधों पर रखी गयी है. अभी आने वाले समय में चन्द्रयान-१ और २, जी.एस.एल.वी. एम.के.-२,३,४ की परियोजनायें प्रमुख हैं. इसरो निश्चित ही विश्व-स्तर का कार्य कर रहा है. हमारे पास टी.ई.एस., कार्टोसेट – १ और २ ऐसे उपग्रह हैं जिनकी विभेदन क्षमता १ मीटर से भी बेहतर है, और गुणवत्ता की दृष्टि से इनसे ली गयीं तस्वीरें “गूगल अर्थ” की सर्वश्रेष्ठ तस्वीरों के आस-पास हैं.

अब चर्चा करते हैं १० जनवरी को किये गये प्रक्षेपण की. प्रक्षेपण वाहक था पी.एस.एल.वी. सी.-७. यह पी.एस.एल.वी. द्वारा किया गया दसवाँ प्रक्षेपण था. इनमें पहले के अलावा बाकी नौ पूर्णत: सफ़ल रहे. इस बार पी.एस.एल.वी का काम था चार उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में लेकर जाना. इनमें से दो उपग्रह कार्टोसेट-२ और स्पेस रिकवरी कैप्सूल भारत के थे और एक था इंडोनेशिया का उपग्रह और दूसरा अर्जेन्टीना का ६ किलोग्राम का छोटा सा उपग्रह. ये चारों ६४० किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित ध्रुवीय कक्षा में सफ़लता पूर्वक छोड़ दिये गये. यह बारीक काम कितनी खूबसूरती से किया गया, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुख्य उपग्रह कार्टोसेट-२ को बिलकुल सही कक्षा में स्थापित करने में अपेक्षा से बहुत कम ईंधन खर्च हुआ और इससे उसकी उम्र दो वर्ष और बढ़ गयी!

इस प्रक्षेपण का मुख्य उपग्रह कार्टोसेट-२ एक दूर संवेदी उपग्रह है जिसका (पैन्क्रोमैटिक) कैमरा एक मीटर से भी बेहतर विभेदन क्षमता वाली तस्वीरें लेने में सक्षम है. इन तस्वीरों का उपयोग भारत और दूसरे देशों द्वारा शहर योजनाओं और कृषि में फ़सलों के निरीक्षण के लिये किया जायेगा. ऐसे उपग्रहों की तस्वीरें सैनिकों के लिये भी मददगार साबित हो रही हैं. उदाहरण के लिये कारगिल युद्ध में आई.आर.एस. से ली गयी तस्वीरें घुसपैठियों का ठिकाना ढूँढने में बहुत कारगर साबित हुयीं थीं. ऐसे अनुभव से प्रेरणा लेकर सन् २००१ में टी.ई.एस. उपग्रह बनाया गया जो पूरी तरह से भारतीय रक्षा सेनाओं को समर्पित है!

पी.एस.एल.वी. पर भारत भूमि से अंतरिक्ष तक की सवारी करने वालों में एस.आर.ई. (स्पेस कैप्सूल रिकवरी एक्सपेरिमेंट) भी है. यह एक विलक्षण प्रयोग है. करीब १२ दिन तक अंतरिक्ष यात्रा कराने के बाद २२ जनवरी को एस.आर.ई. को वापस धरती पर बुलाया जायेगा! यह बंगाल की खाड़ी के निकट पैराशूटों की सहायता से उतारा जायेगा जहाँ तट रक्षक इसके स्वागत के लिये पहले से ही उपस्थित होंगे. यह अद्भुत प्रयोग अंतरिक्ष में मानव भेजने की दिशा में भारत का पहला कदम भी माना जा सकता है. एस.आर.ई. को सफ़लतापूर्वक वापस बुलाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है. वापस आते समय हवा के घर्षण के कारण इसकी बाहरी सहत पर तापमान होगा करीब २००० डिग्री सेल्सियस, जबकि अंदर का तापमान करीब ४० डिग्री सेल्सियस. उल्लेखनीय है कि ऐसी परिस्थितियों का सामना भारतीय वैज्ञानिक अग्नि मिसाइल के समय पहले ही सफ़लतापूर्वक कर चुके हैं! एस.आर.ई. के प्रयोग की सफ़लता या असफ़लता इसरो की भावी दिशा निर्धारित करेगी.

सम्बन्धित कड़ियाँ:
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का जालघर, पी.एस.एल.वी. प्रक्षेपण की आधिकारिक सूचना, सी.एन.एन. आई.बी.एन. पर प्रक्षेपण का समाचार (वीडियो)

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बूझे लाल बुझक्कड़ – ४

सितम्बर 6, 2006

हमने तो पहले ही पुछक्कड़ को बोल दिया था कि सवाल का आगा-पीछा ठीक से बता दो. पर नहीं, उसे तो आड़े-तिरछे डण्डों और मुकद्दर की रेखाओं के अलावा कुछ सूझा ही नहीं! अब देखो, करे पुछक्कड़ और भरे बुझक्कड़! मेरा काम कठिन हो गया ना. वैसे आप लोगों ने, और खास तौर पर संजय जी ने जो तुक्का मारा उसके लिये पुछक्कड़ चाचा और बुझक्कड़ चाचा आप सबको सांत्वना पुरस्कार दे रहे हैं. अगली बार जोर लगा के!

श्लोक था:

दीर्धचतुरस्रस्याक्ष्णयारज्जु: पार्श्वमानी तिर्यंगमानी च
यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति ||

यह श्लोक करीब ८०० ई.पू. में रचित बौधायन सुल्वसूत्र के प्रथम अध्याय का अड़तालीसवां श्लोक है और भारतीय गणितज्ञ बौधायन की उस प्रमेय का कथन है जो पाइथागोरस प्रमेय के नाम से अधिक प्रचलित है! वास्तव में यूनानी गणितज्ञ पाइथागोरस ने इस प्रमेय की खोज बौधायन के २५० बर्ष बाद की थी. भारत के बाहर तो बाहर, अंदर भी स्कूलों में इसे पाइथागोरस प्रमेय के नाम से पढ़ाया जाता है! लाल बुझक्कड़ चाचा की समझ के हिसाब से केवल उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की पुस्तकें ही बौधायन को इस प्रमेय का श्रेय देती हैं. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एन.सी.ई.आर.टी.) की पुस्तकें भी पाइथागोरस को ही इस प्रमेय का जनक मानती हैं!

ऐसे बहुत से वैज्ञानिक तथ्य हैं जिनको सर्वप्रथम भारत में खोजा गया, पर उनका श्रेय मिला बाहर वालों को. अब इसमें बाहर वालों की भी क्या गलती, हमारी लापरवाही कहिये ये फिर उदासीनता. आवश्यकता है कि कम से कम हम भारतीय तो ऐसी चीज़ों का महत्व समझें और जानें कि Fibonacci Series वास्तव में हेमचन्द्र श्रेणी है, परमाणु के सिद्धान्त का प्रतिपादन सर्वप्रथम कणाद (६०० ई.पू.) ने किया था और Pascal’s Triangle पिंगला का मेरु-प्रस्तार है, इत्यादि!

अभी पिछले महीने ही एक दिलचस्प घटना हुई. विश्व के हज़ारों गणितज्ञ चार वर्ष में एक बार जमा होते हैं और नयी-नयी खोजों के बारे में चर्चा करते हैं. आम तौर पर यह गोष्ठी विकसित देशों में होती है और इस बार अगस्त के अंतिम सप्ताह में यह स्पेन के मेड्रिड शहर में थी. भारत के शीर्ष गणितशास्त्रियों ने सोचा कि अगली बार, अर्थात् सन् २०१० में इस गोष्ठी का आयोजन भारत में किया जाय, सो इसके लिये भारत ने भी अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी दावेदारी रखी. भारत को कहा गया कि वे अपनी दावेदारी के पक्ष में तर्क दें. भारत ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार किया और शुरुआत की गयी गणित में भारत के योगदान से. जब भारतीय बक्ताओं ने बोलना शुरु किया तो कई विद्वान भौंचक्के रह गये. उनको तो पता ही नहीं था कि जिस प्रमेय को वे पाइथागोरस प्रमेय के नाम से पढ़ते-पढ़ाते आ रहे थे, वह तो भारत की देन है! उनको और भी ऐसे कई आश्चर्य हुए इस गोष्ठी में.

चलते-चलते: अच्छी खबर यह है कि भारत की दावेदारी सफ़ल रही है, और सन् २०१० में यह विशाल गोष्ठी हैदराबाद में आयोजित हो रही है. यह ११० से भी अधिक वर्षों के इतिहास में केवल तीसरा मौका होगा जब विश्व के गणितज्ञ एशिया के किसी देश में मिलेंगे. इससे पहले जापान और चीन को ही यह गौरव प्राप्त हुआ है.

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इतिहास का गवाह : लौह-स्तम्भ

सितम्बर 2, 2006

भारतीय इतिहासकार गुप्तकाल (तीसरी शताब्दी से छठी शताब्दी के मध्य) को भारत का स्वर्णयुग मानते हैं. इस काल के वैभव का प्रत्यक्षदर्शी रहा है दिल्ली का लौह-स्तम्भ. चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासन काल में बना यह स्तम्भ खुले आकाश में १६०० बर्षों से मौसम को चुनौती देता आ रहा है और धातु-विज्ञान में हमारी उत्कॄष्टता का ठोस प्रमाण है. iron_pillar.jpgप्रकृति में लोहा मुख्यत: इसके अयस्कों के रूप में ही उपलब्ध होता है और इन अयस्कों को करीब १५०० डिग्री सेल्सियस तापमान तक पिघलाकर लोहा तैयार करना कम से कम उस समय तो कतई आसान काम नहीं था.

लौह-स्तम्भ में लोहे की मात्रा करीब ९८% है और आश्चर्य की बात है कि अब तक इसमें जंग नहीं लग रही. इसका कारण जानने के लिये वैज्ञानिक अभी भी जुटे हुए हैं.

भारत में लोहे से सम्बन्धित धातु-कर्म की जानकारी करीब २५० ई.पू. से ही थी. बारहवीं शताब्दी के अरबी विद्वान इदरिसी ने लिखा है कि भारतीय सदा ही लोहे के निर्माण में सर्वोत्कृष्ट रहे और उनके द्वारा स्थापित मानकों की बराबरी कर पाना असंभव सा है.

पश्चिमी देश इस ज्ञान में १००० से भी अधिक वर्ष पीछे रहे. इंग्लैण्ड में लोहे की ढलाई का पहला कारखाना सन् ११६१ में ही खुल सका. वैसे चीनी लोग इसमें भारतीयों से भी २००-३०० साल आगे थे, पर लौह-स्तम्भ जैसा चमत्कार वे भी नहीं कर पाये!

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वैदिक विद्या : आयुर्वेद

अगस्त 23, 2006

आयुर्वेद भारतीय पारम्परिक चिकित्सा विज्ञान का एक रूप है जिसका उद्भव भारतवर्ष में क़रीब ५००० वर्ष पूर्व हुआ. यह शब्द ‘आयु:’ अर्थात् ‘जीवन’ और ‘वेद’ अर्थात् ‘ज्ञान’, के संगम से बना है अत: इसे ‘जीवन का विज्ञान’ कहा जाता है. स्वस्थ जीवन के उपायों के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा आत्मिक अनुरूपता से जुड़े चिकित्सकीय साधनों का भी विशेष उल्लेख आयुर्वेद में किया गया है. आयुर्वेद के जन्म से सम्बन्धित कोई लिखित प्रमाण नहीं मिलते किन्तु इसका आंशिक भाग अथर्ववेद  में पाया गया है अत: यह माना जाता है कि यह विद्या वेदों के समकालीन है.

कहते हैं कि यह विज्ञान स्वयं सृष्टि के जनक भगवान ब्रह्मा द्वारा रचा गया था. बाद में यह विद्या उन्होंने दक्ष प्रजापति को सिखायी और दक्ष प्रजापति से यह देवों के वैद्य अश्विनीकुमारों बंधुओं के पास गयी. तदोपरांत अश्विनीकुमारों ने इस विद्या को देवराज इंद्र के समक्ष प्रस्तुत किया. तीन महान चिकित्सक – आचार्य भारद्वाज, आचार्य कश्यप तथा आचार्य दिवोदास धन्वंतरि (चिकित्सा पद्धिति के देव), स्वयं देवराज इंद्र के शिष्य थे. इनमें से आचार्य भारद्वाज के एक कुशाग्र शिष्य हुए आचार्य अग्निवेश. सर्वप्रथम इन्होनें ही आयुर्वेद के मुख्य लिखित रूप की रचना की, जिसे आगे चल कर इनके शिष्य आचार्य चरक ने संशोधित कर पुन: प्रस्तुत किया. इस संशोधित संस्करण को आज ‘चरक संहिता’ के नाम से जाना जाता है. इसके अतिरिक्त आचार्य कश्यप ने बाल चिकित्सा के ऊपर एक ग्रन्थ लिखा जो आज आंशिक रूप में ‘कश्यप संहिता’ के नाम से उपलब्ध है.

आचार्य धन्वंतरि के शिष्य हुये आचार्य सुश्रुत, जिन्होनें गुरू से पृथक होने के पश्चात ‘सुश्रुत संहिता’ की रचना की जिसे शल्य चिकित्सा, नेत्र-नासिका-कंठ चिकित्सा तथा नेत्र-विज्ञान का महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है. ‘चरक संहिता’, ‘सुश्रुत संहिता’ तथा ‘वाग्भट्ट’ द्वारा लिखित ‘अष्टांग हृदय’, इन तीनों प्राचीन पुस्तकों को सम्मिलित रूप से ‘बृहत्-त्रयी’ के नाम से जाना जाता है और यह वर्तमान में आयुर्वेदिक विद्या का सर्वाधिक महत्वपूर्ण संकलन है.

इसी प्रकार विभिन्न रोगों की पहचान, विभिन्न जड़ी-बूटियों, खनिजों, क्वाथ, चूर्ण, आसव, अरिष्ट इत्यादि के संविन्यास से जुड़ी सभी जानकारियाँ क्रमश: ‘माधव निदान’, ‘भव प्रकाश निघन्तु’ और ‘श्रृंगधर संहिता’ में मिलती हैं जिन्हें संयुक्त रूप से ‘लघु्त्-त्रयी’ के नाम से जाना जाता है.

माना जाता है कि वैदिक काल से अब तक आयुर्वेद के क्षेत्र में निरंतर विकास हुआ है. बौद्ध काल में नागार्जुन, सुरानंद, नागबोधि, यशोधन, नित्यनाथ, गोविंद, अनंतदेव एवं वाग्भट्ट आदि महान वैद्य हुए जिन्होनें आयुर्वेद के क्षेत्र में विभिन्न नये एवं सफल प्रयोग किये. इस काल में आयुर्वेद ने प्रगति का चरम देखा. इसी कारण बौद्ध काल को आयुर्वेद का स्वर्णयुग भी माना जाता रहा है.

समय के आधुनिकीकरण के साथ आयुर्वेद का प्रयोग भले ही कम हुआ किंतु भारत ने अपनी इस विद्या को मिटने नहीं दिया. और आज एक बार पुन: आयुर्वेद पश्चिमी चिकित्सा शैली को चुनौती दे रहा है. वस्तुत: उद्देश्य किसी एक विद्या का आधिपत्य स्थापित करना नहीं है, उद्देश्य है विश्व में आरोग्य की स्थापना, साधारण जन मानस के लिये असाध्य रोगों की भी सुलभ और अल्पव्ययी चिकित्सा पद्धिति उपलब्ध कराना.

उम्मीद है कि उपरोक्त तथ्यों से आपको भारत में जन्मी एक महाविद्या के बारे में कुछ आधारभूत जानकारी मिली होगी. हमारा प्रयास रहेगा की इसी क्रम में अधिक से अधिक रोचक व महत्वपूर्ण जानकारी आप तक पहुँचा सकें.

साभार: विकिपीडिया पर आयुर्वेद का पृष्ठ, यूरोपियन अकेडमी ऑफ़ वैदिक साइंसेज़

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ये तारा वो तारा

अगस्त 18, 2006

मेरी एकाग्रमुद्रा को भंग करती हुई एक आवाज़. पत्तियों की खड़खड़ाहट में गुंथी हुई एक आवाज़ ! अद्भुत दृश्य है. मैं मकड़ी के जाले जैसे एक सघन जालतंत्र के झरोखे से आकाश में झाँकती हूँ. एक विशालकाय तश्तरीनुमा एण्टेना चौकसी करते हुये पहरेदार की तरह अपनी गर्दन घुमा रहा है. एक विलक्षण अनुभव है. मुझे दूर क्षितिज तक बस ऐसे ही एण्टेने दिखायी दे रहे हैं – किसी को ढ़ूँढ़ते हुए, कहीं से कुछ बटोरते हुए ये एण्टेने! यह है पुणे का एक सुदूरवर्ती गाँव खोडद, नारायणगाँव के निकट.

ये एण्टेने वास्तव में विश्व की सबसे बड़ी रेडियो दूरबीन हैं! तकनीकि रूप से कहें तो विशालकाय मीटरवेव रेडियो दूरबीन (Giant Metrewave Radio Telescope) या GMRT. करीब २५ किलोमीटर के क्षेत्र में ऐसे कुल ३० एण्टेने अंग्रेज़ी के अक्षर ‘Y’ की आकृति में लगे हुए हैं. हर एण्टेने का वजन लगभग ११० टन है (अर्थात् धान से लदे हुए ११ ट्रक!) और इन्हें घुमाकर आकाश में एक दिशा में स्थापित कर पाना अपने आप में भारतीय अभियांत्रिकी की बहुत बड़ी उपलब्धि है. इस रेडियो दूरबीन का कार्य १९८९ के आस-पास प्रख्यात भारतीय खगोल वैज्ञानिक प्रो. गोविंद स्वरूप के नेतृत्व में आरंभ हुआ था और १९९९ तक सभी एण्टेनों ने खगोलीय प्रेक्षण करना शुरु कर दिया था. रेडियो तरंगें उत्सर्जित करने वाले सभी खगोलीय पिण्डों के अध्ययन के लिये GMRT का प्रयोग विश्व के अनेक वैज्ञानिकों द्वारा किया जाता है. कुल प्रेक्षण समय के लगभग ४० प्रतिशत समय का उपयोग विदेशों, जिनमें बहुत बड़ा भाग विकसित देशों का है, के खगोलशास्त्री करते हैं

 

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GMRT का एक लक्ष्य सुदूरवर्ती दीर्घिकाओं (Galaxies) में उपस्थित हाइड्रोजन का पता लगाना है (धरती पर बैठे बैठे!). हमारे ब्रह्माण्ड का बहुत बड़ा हिस्सा हाइड्रोजन का है जिससे दीर्घिकाओं की भी रचना हुई है. ऐसा माना जाता है कि हर क्षण ब्रह्माण्ड फैल रहा है और दूर स्थित दीर्घिकाएं और भी दूर होती जा रही हैं. दूर जाते हुए पिण्डों से उत्सर्जित प्रकाश की प्रेक्षित तरंग द्धैर्य (Wave Length) बढ़ती जाती है. इसे डॉप्लर का सिद्धान्त कहा जाता है. अब दूरस्थ दीर्घिकाओं में हाइड्रोजन से हुए रेडियो उत्सर्जन का प्रेक्षण GMRT के माध्यम से संभव हो सकेगा.

आज प्रौद्योगिकी क्रान्ति के इस दौर में भारत को मूलभूत विज्ञान में निवेश करते देखना एक सुखद अनुभव है. भारतीय वैज्ञानिकों और अभियंताओं के सतत परिश्रम से ही यह चुनौतीपूर्ण कार्य संभव हो सका है.

अब एण्टेना रुक गया है, शायद उसकी तलाश पूरी हुई. मैं वापस अपने कार्यालय भवन जा रही हूँ. मुझे आगे बढ़ते हुए हर कदम में गौरव की अनुभूति हो रही है – अपने लिये और अपने देश के लिये!

कुछ कड़ियाँ: GMRT का आधिकारिक जालघर, राष्ट्रीय रेडियो खगोलिकी केन्द्र (NCRA), टाटा मूलभूत शोध संस्थान

(लेखिका स्वयं एक खगोलशास्त्री हैं और यह आलेख उनका अनुभव है.)

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भारतीय अंक प्रणाली

अगस्त 16, 2006

सुबह सुबह सेठ लक्खीमल मिल गये, जिनसे पिछले महीने मैंने DCCCLXXXVIII रुपये उधार लिये थे. अपना रास्ता बदलता कि उससे पहले ही सेठजी की आवाज़ आयी, “क्यों उधारचंद, कब वापस कर रहे हो”? मैंने कहा “बस पहली तारीख को पगार मिलते ही सब चुकता कर दूंगा. सेठजी बोले वो छोड़ो, XIV रुपया टक्का के हिसाब से जो सूद बनता है, सो दे दो अभी. मैंने पूछा “कितना हुआ”? सेठजी ने हिसाब तो शुरु कर दिया, पर पूरा नहीं कर पाये! भला हो उनका जो रोमन पद्धिति से हिसाब करते हैं!

अरब के व्यापारी इस मामले में बहुत होशियार निकले. उन्होंने 0 से 9 तक के सभी अंक भारतीयों से सीख लिये. जोड़-घटाना-गुणा-भाग भी सीख लिया. और तो और सारे विश्व में हमारी संख्या पद्धिति का प्रचार भी कर दिया. सो सारी दुनियां के लिये 0-9 कहलाये ‘अरेबिक नम्बर्स’ और अरब लोगों के लिये कहलाये ‘हिंदसा’, हिंदुस्तान से जो सीखे थे उन्होंने.

अब चमत्कार देखिये, जोड़-घटाना-गुणा-भाग में तो सहूलियत है ही (सो तो सेठ लक्खीमल जी ने आपको समझा ही दिया है!) पर और भी लाभ हैं. अब सीधा सा सवाल है – 1,2,3,4,….. कुल कितनी संख्यायें है? असीम, अगणित, अनंत! और रोमन पद्धिति में ज्यों-ज्यों संख्या बड़ी हुई, एक और नये चिन्ह (I, V, X, L, C, D, M इत्यादि) की आवश्यकता हुई. अत: रोमन पद्धिति अक्षम है सभी संख्याओं के निरूपण में! तो ऐसी पद्धिति तो स्वयं में अपूर्ण है, तो उससे और क्या अपेक्षा रखनी! दूसरी ओर भारतीय पद्धिति में 0 से लेकर 9, ये 10 चिन्ह ही पर्याप्त हैं किसी भी बड़ी से बड़ी संख्या को निरूपित करने के लिये!

जब भारतीय पद्धिति तेरहवीं शताब्दी में यूरोप पहुची तो रोमन कैथोलिक चर्च ने जमकर इसका विरोध किया और भारतीय पद्धिति को ‘शैतान का काम’ कहा! परन्तु सही बात कब तक दबायी जा सकती थी, सो अब परिणाम सबके सामने है.

और तो और, भारतीयों ने यह भी सिद्ध किया कि किसी भी संख्या का निरूपण मात्र दो चिन्हों (0 और 1) के माध्यम से ही संभव है. जी हाँ, यहाँ वर्तमान बाइनरी सिस्टम (द्विअंकीय प्रणाली) की ही बात की जा रही है, जो आज समूचे कम्प्यूटर विज्ञान का आधार है. पिंगला ने पांचवीं शताब्दी ई.पू. में ही यह द्विअंकीय प्रणाली खोज निकाली था, और वह भी साहित्य के माध्यम से! उनके छंद सूत्रों में, जो मूलत: संस्कृत श्लोकों के विन्यास और उनकी लंबाई को मापने के लिये प्रयोग किये गये थे, पूरी द्विअंकीय प्रणाली छिपी हुई है! सोचिये जो काम यूरोपीय लोग तेरहवीं शताब्दी तक अनगिनत चिन्हों के साथ करते थे (सो भी अधूरा!), वह पिंगला ने मात्र दो चिन्हों में कर दिखाया था ईसा से 500 साल पहले! यहां यह भी इंगित करना उचित होगा कि उस समय शून्य की संकल्पना करना कितनी बड़ी उपलब्धि रही होगी. आज का कम्प्यूटर विज्ञान उसी भारतीय प्रणाली, उसी गहरी सोच पर आधारित है.

कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है… कि भारत इस सबका पेटेण्ट ले ही लेना चाहिये, इससे पहले कि यह भी पराया हो चले!