Archive for the ‘भविष्य’ Category

h1

बूझे लाल बुझक्कड़ – ८

फ़रवरी 2, 2007

ये पुछक्कड़ लगता है फिर से कठिन सवाल पूछ के भाग गया. सवाल पूछे तो पुछक्कड़ और जनता के अण्डे-टमाटर झेले बुझक्कड़, ये कहाँ का न्याय है? पंकज भाई ने तो सीधे-सीधे हाथ खड़े कर दिये. वैसे समीर जी को भी उत्तर नहीं पता था, पर वो घुमाते-घुमाते डकैतों की बस्ती में ले गये! सागर भाई ने सही जगह पर सही अक्ल लगा दी, इतना तो पता लगा ही लाये कि खज़ाना कहाँ छि‍पा है. तो इसी बात के लिये बधाई ले लीजिये सागर भाई!

दिये गये मानचित्र में रंग भरने का आधार था जिनी सूचकांक! बड़ा अजीब सा नाम है यह तो, पर यह आखिर है क्या? आइये जानने का प्रयास करते हैं. भारत के परिप्रेक्ष्य में भी इस सूचकांक की चर्चा करेंगे.

बचपन में गणित की कक्षा याद आती है जब मास्टरजी सवाल पूछते थे, “रामू, तुम्हारी कक्षा में २५ छात्र हैं. अगर मैं तुम्हें ५० संतरे दूँ और कहूँ कि अपनी कक्षा में बाँटो तो हर एक के हिस्से में कितने संतरे आयेंगे?” रामू झट से जवाब दे देता था, “२ संतरे मास्टरजी”. लेकिन रामू को शायद पता नहीं होता था कि दुनियाँ में बंटवारे का गणित इतना आसान नहीं होता. जी हाँ, आज बड़ी से बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की समस्या है सम्पत्ति का असमान वितरण. आज आम आदमी यह कहने से कतई नहीं चूकता कि भारत में अमीर और अमीर होता जा रहा है, तथा गरीब और भी गरीब. पर इस कथन के में सत्य कितना है, इसे भी समझने का प्रयास करेंगे.

कल्पना कीजिये दो विपरीत परिस्थितियों की – पहली जिसमें सम्पत्ति का वितरण सभी लोगों में बराबर-बराबर है, कुछ कम ज़्यादा नहीं, एकदम रामू वाला गणित! और दूसरी परिस्थिति जिसमें सारी सम्पत्ति एक ही व्यक्ति के पास संचित है और बाकी सबके पास कुछ भी नहीं. जिनी सूचकांक किसी भी प्रकार के वितरण को संख्यात्मक रूप से दर्शाने के लिये ० और १ के बीच का एक अंक होता है. पहली (पूर्णत: समान) वितरण की स्थिति का जिनी सूचकांक होता है ० और दूसरी (पूर्णत: असमान) वितरण की स्थिति का जिनी सूचकांक होता है १. पर व्यवहारिक स्थिति तो कुछ बीच की ही होती है, और जैसा कि आप समझ ही गये होंगे कि जिनी सूचकांक जितना कम होता है अर्थव्यवस्था में संपत्ति का बंटवारा उतना ही समान होता है. मान लीजिये कि सबसे गरीब १०% लोगों के पास कुल सम्पत्ति की मात्र २% पूँजी है, सबसे गरीब २०% लोगों के पास ८%, और इसी प्रकार आगे चलते हुये यदि सांकेतिक रूप में कहें तो सबसे गरीब क% लोगों के पास ख% पूँजी है. यह स्पष्ट है कि क का मान ख के मान से कभी कम नहीं होगा, और सम्पूर्ण समानता की स्थिति में क और ख का मान हमेशा बराबर होगा. अब इन्हीं बिंदुओं (ख,क) को जोड-जोड़कर जो वक्र बना उसको कहिये लॉरेंज़ वक्र. जिनी सूचकांक सम्पूर्ण समानता की रेखा “ख = क” और लॉरेंज़ वक्र के बीच का क्षेत्रफ़ल का दुगना होता है. किसी भी तंत्र की असमानता को इस प्रकार संख्यात्मक रूप से निरूपित करने का विचार सबसे पहले १९१२ में इतालवी सांखिकीयविद और समाजशास्त्री कोराडो जिनी के दिमाग़ में आया और आज यह किसी भी देश के सम्पत्ति वितरण में असमानता मापने का मानक तरीका है.

अब बात करते हैं कुछ चुनिंदा देशों के जिनी सूचकांक की.

  • भारत: ०.३२५
  • चीन: ०.४४
  • संयुक्त राज्य अमेरिका: ०.४५
  • रूस: ०.३९९
  • दक्षिण कोरिया: ०.३५८
  • ब्राज़ील: ०.५९७

स्पष्ट है कि भारत में पूँजी का वितरण अन्य कई विकासशील देशों और विकसित देशों की तुलना में आधिक समान है, और हममें से अधिकांश अभी भी रटा-रटाया वाक्य कह देते हैं कि हमारे देश में सारा पैसा अमीरों के पास ही संचित है, जो कि अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में सही नहीं है. हमारी स्थिति निश्चित ही बेहतर है. न सिर्फ़ बेहतर है, बल्कि दिन-प्रतिदिन और भी सुधर रही है.

“भारत में अमीर और अमीर होता जा रहा है, तथा गरीब और भी गरीब”, इस छपे-छपाये, रटे-रटाये कथन का विश्लेषण करेंगे अगले अंक में. भारत की सम्पत्ति है उसके जी.डी.पी. से कहीं अधिक! कैसे? यह भी जानेंगे अगले अंक में.

साभार: वोलफ़्राम पर जिनी सूचकांक का पृष्ठ, विकिपीडिया पर जिनी सूचकांक का पृष्ठ, विभिन्न देशों का जिनी सूचकांक

h1

भारत:व्यक्ति बनाम तंत्र

जनवरी 24, 2007

हमारे समाज में यह आम धारणा है कि व्यक्ति विशेष तो अपने दम पर बहुत कुछ अर्जित कर सकता है, सफलता की नयी-नयी ऊँचाइयां छूकर नित नये मानदण्ड स्थापित कर सकता है, परन्तु उसके इस विकास में हमारे देश के मूलभूत ढाँचे का योगदान न के बराबर ही है, या कहिये कि है ही नहीं! तो सवाल उठता है कि इस अवधारणा में सच्चाई आखिर कितनी है? आइये चर्चा करें.

एक समाज को समझने और उस पर अपनी राय बनाने के मापदण्ड उन मापदण्डों से सर्वथा भिन्न हैं जो कि एक व्यक्ति विशेष को समझने और उस पर अपनी राय बनाने के लिये चाहिये. या यूं समझिये कि समाज को जानने का प्रयास करना मतलब एक वृहत् या स्थूल अध्य्यन और उस समाज के व्यक्तियों को एक-एक कर समझना मतलब एक सूक्ष्म अध्ययन. इसी बात को गणित की भाषा में कहा जाय तो यह कि एक समाज का स्थूल स्वरूप उसके व्यक्तियों के सूक्ष्म वैयक्तिक गुणों का औसत मान है, जो कि बहुमत के आस-पास ही है. और जैसा कि सांखिकीय तथ्य है, एक व्यक्ति विशेष के वैयक्तिक गुण-धर्म पूरे समूह के औसत गुण-धर्मों के औसत मान से बहुत अधिक विचलित हों, ऐसा विरले ही होता है, आखिरकार सूक्ष्म वैयक्तिक गुण ही तो पूरे समाज को एक वृहत् स्वरूप प्रदान करते हैं.

कोई भी निर्जीव भौतिक तंत्र हो, पूरे तंत्र की किसी भी विशेषता को समृद्ध करने के लिये एक प्रकार की वाह्य ऊर्जा चाहिये. इसी प्रकार, यदि सामजिक तंत्र की बात की जाय तो उसकी समृद्धि और विकास के लिये भी वाह्य संस्कृतियों की रोशनी समाज में आती रहनी चाहिये. पर इसके अलावा बहुत सी नयी-नयी बातें जानने और सीखते रहने की मानवीय उत्कंठा भी नये लक्ष्य निर्धारित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक है. कई बार एक व्यक्ति विशेष की ऐसी ही उत्कंठा उसे वर्तमान सामाजिक सीमाओं से परे सोचने को प्रेरित करती है और देखते-देखते यही उत्कंठा एक प्रेरणा की तरह पूरे तंत्र में फैल जाती है और समाज को एक नयी दिशा देती है. दिलचस्प बात यह है कि लगभग प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी एक ऐसे दौर से गुज़रता है जब उसमें सीमाओं को लांघकर कुछ हटकर करने की तीव्र लालसा होती है, पर अधिकांश व्यक्तियों में यह एक क्षणिक उद्वेग ही होता है और वे भी फिर से भीड़ में ही कहीं खो जाते हैं, या कई बार तो भीड़ ही उन्हें अपनी ओर खींच लेती है! और इस प्रकार अक्सर “समाज” ही वैयक्तिक उत्कंठाओं के दमन का कारण बनता है. यह समाज का वह अंग होता है जो कभी स्वयं नये मार्ग पर जाने में असफल रहा होता है.

क्या कोई ऐसा उपाय है कि समाज के इस अंग के कुप्रभाव से बचा जा सके? एक व्यक्ति का पूरे समाज पर क्या प्रभाव होता है? इतिहास साक्षी है कि अतीत में जितने भी सामजिक, दार्शनिक अथवा वैज्ञानिक परिवर्तन हुए, उनमें एक व्यक्ति विशेष अथवा छोटे समूह को ही लीक से हटकर चलना पड़ा और धीरे-धीरे समाज भी उनके साथ हुआ. इस सम्बन्ध में अमूल एक अच्छा उदाहरण है. कुछ ग्रामवासियों की एक पहल को वर्गीस कुरियन का नेतृत्व मिला और समूचे देश में श्वेत क्रांति आ गयी. इसी प्रकार हाल में नोबल पुरस्कार के कारण चर्चा में आयी बंग्लादेश की ग्रामीण बैंक का सपना साकार करने वाले मुहम्मद युनुस ने विपरीत परिस्थितियों का सामना करके एक मिसाल खड़ी की है. पर एक दृष्टि से देखा जाय तो क्या परिवर्तन का यह तरीका बहुत अक्षम नहीं है! याद कीजिये १८५७ की क्रांति जो इतिहास के पन्नों में एक विद्रोह बनकर रह गयी! कुछ व्यक्तियों द्वारा शुरु किये गये इस पुण्य कार्य को ब्रितानी सरकार सिर्फ़ इसलिये कुचल पायी क्योंकि सामाजिक चेतना का अभाव था. यदि सामजिक चेतना एक साथ जागृत हो जाय तो क्या नहीं हो सकता! वे व्यक्ति जिनकी सोच इस दिशा में सकारात्मक है, यदि एक साथ आगे आयें तो हमें क्यों उन व्यक्तियों के अवतरित होने की प्रतीक्षा करनी पड़े जो समाज को अपने बलबूते पर आगे बढायें? कदम-कदम से ही कारवां बनता है, और यही तो लोकतंत्र का सार है.

यह समझना आवश्यक है कि यदि समाज का ही एक अंग खुली और सकारात्मक सोच वाले व्यक्तियों को आगे आने से रोकेगा तो सबको सामूहिक जिम्मेदारी का बोझ उठाने को तैयार रहना चाहिये. समाज का प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह कितना भी विवेकी, समृद्ध अथवा सफल क्यों न हो – सभी को अपने दृष्टिकोण में यथोचित परिवर्थन करना होगा. हम अभी तक लोकतंत्र की शक्ति और उसके संभावित परिणामों को नहीं समझ पाये हैं, इन्हें जल्दी ही समझना बेहतर होगा.