Archive for the ‘प्रगतिपथ’ Category

h1

बूझे लाल बुझक्कड़ – ८

फ़रवरी 2, 2007

ये पुछक्कड़ लगता है फिर से कठिन सवाल पूछ के भाग गया. सवाल पूछे तो पुछक्कड़ और जनता के अण्डे-टमाटर झेले बुझक्कड़, ये कहाँ का न्याय है? पंकज भाई ने तो सीधे-सीधे हाथ खड़े कर दिये. वैसे समीर जी को भी उत्तर नहीं पता था, पर वो घुमाते-घुमाते डकैतों की बस्ती में ले गये! सागर भाई ने सही जगह पर सही अक्ल लगा दी, इतना तो पता लगा ही लाये कि खज़ाना कहाँ छि‍पा है. तो इसी बात के लिये बधाई ले लीजिये सागर भाई!

दिये गये मानचित्र में रंग भरने का आधार था जिनी सूचकांक! बड़ा अजीब सा नाम है यह तो, पर यह आखिर है क्या? आइये जानने का प्रयास करते हैं. भारत के परिप्रेक्ष्य में भी इस सूचकांक की चर्चा करेंगे.

बचपन में गणित की कक्षा याद आती है जब मास्टरजी सवाल पूछते थे, “रामू, तुम्हारी कक्षा में २५ छात्र हैं. अगर मैं तुम्हें ५० संतरे दूँ और कहूँ कि अपनी कक्षा में बाँटो तो हर एक के हिस्से में कितने संतरे आयेंगे?” रामू झट से जवाब दे देता था, “२ संतरे मास्टरजी”. लेकिन रामू को शायद पता नहीं होता था कि दुनियाँ में बंटवारे का गणित इतना आसान नहीं होता. जी हाँ, आज बड़ी से बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की समस्या है सम्पत्ति का असमान वितरण. आज आम आदमी यह कहने से कतई नहीं चूकता कि भारत में अमीर और अमीर होता जा रहा है, तथा गरीब और भी गरीब. पर इस कथन के में सत्य कितना है, इसे भी समझने का प्रयास करेंगे.

कल्पना कीजिये दो विपरीत परिस्थितियों की – पहली जिसमें सम्पत्ति का वितरण सभी लोगों में बराबर-बराबर है, कुछ कम ज़्यादा नहीं, एकदम रामू वाला गणित! और दूसरी परिस्थिति जिसमें सारी सम्पत्ति एक ही व्यक्ति के पास संचित है और बाकी सबके पास कुछ भी नहीं. जिनी सूचकांक किसी भी प्रकार के वितरण को संख्यात्मक रूप से दर्शाने के लिये ० और १ के बीच का एक अंक होता है. पहली (पूर्णत: समान) वितरण की स्थिति का जिनी सूचकांक होता है ० और दूसरी (पूर्णत: असमान) वितरण की स्थिति का जिनी सूचकांक होता है १. पर व्यवहारिक स्थिति तो कुछ बीच की ही होती है, और जैसा कि आप समझ ही गये होंगे कि जिनी सूचकांक जितना कम होता है अर्थव्यवस्था में संपत्ति का बंटवारा उतना ही समान होता है. मान लीजिये कि सबसे गरीब १०% लोगों के पास कुल सम्पत्ति की मात्र २% पूँजी है, सबसे गरीब २०% लोगों के पास ८%, और इसी प्रकार आगे चलते हुये यदि सांकेतिक रूप में कहें तो सबसे गरीब क% लोगों के पास ख% पूँजी है. यह स्पष्ट है कि क का मान ख के मान से कभी कम नहीं होगा, और सम्पूर्ण समानता की स्थिति में क और ख का मान हमेशा बराबर होगा. अब इन्हीं बिंदुओं (ख,क) को जोड-जोड़कर जो वक्र बना उसको कहिये लॉरेंज़ वक्र. जिनी सूचकांक सम्पूर्ण समानता की रेखा “ख = क” और लॉरेंज़ वक्र के बीच का क्षेत्रफ़ल का दुगना होता है. किसी भी तंत्र की असमानता को इस प्रकार संख्यात्मक रूप से निरूपित करने का विचार सबसे पहले १९१२ में इतालवी सांखिकीयविद और समाजशास्त्री कोराडो जिनी के दिमाग़ में आया और आज यह किसी भी देश के सम्पत्ति वितरण में असमानता मापने का मानक तरीका है.

अब बात करते हैं कुछ चुनिंदा देशों के जिनी सूचकांक की.

  • भारत: ०.३२५
  • चीन: ०.४४
  • संयुक्त राज्य अमेरिका: ०.४५
  • रूस: ०.३९९
  • दक्षिण कोरिया: ०.३५८
  • ब्राज़ील: ०.५९७

स्पष्ट है कि भारत में पूँजी का वितरण अन्य कई विकासशील देशों और विकसित देशों की तुलना में आधिक समान है, और हममें से अधिकांश अभी भी रटा-रटाया वाक्य कह देते हैं कि हमारे देश में सारा पैसा अमीरों के पास ही संचित है, जो कि अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में सही नहीं है. हमारी स्थिति निश्चित ही बेहतर है. न सिर्फ़ बेहतर है, बल्कि दिन-प्रतिदिन और भी सुधर रही है.

“भारत में अमीर और अमीर होता जा रहा है, तथा गरीब और भी गरीब”, इस छपे-छपाये, रटे-रटाये कथन का विश्लेषण करेंगे अगले अंक में. भारत की सम्पत्ति है उसके जी.डी.पी. से कहीं अधिक! कैसे? यह भी जानेंगे अगले अंक में.

साभार: वोलफ़्राम पर जिनी सूचकांक का पृष्ठ, विकिपीडिया पर जिनी सूचकांक का पृष्ठ, विभिन्न देशों का जिनी सूचकांक

h1

आसमान से आगे

जनवरी 17, 2007

एक और सफ़ल प्रक्षेपण! भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने १० जनवरी २००७ को ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण वाहक (पी.एस.एल.वी.) को चार उपग्रहों के साथ आकाश में रवाना कर वर्ष की धमाकेदार शुरुआत कर ही दी. एक वाहक में चार उपग्रह अपने आप में बड़ी उपलब्धि है. इन चार में से दो उपग्रह हमारे थे और दो दूसरे देशों के.

जब भी इसरो ऐसी सफलता प्राप्त करता है, मुझे दो घटनायें याद आ जाती हैं. तो पहले उन्हीं का उल्लेख करते हैं. पहली घटना है, प्रख्यात रसायनज्ञ प्रो. रघुनाथ अनंत मशेलकर का एक व्याख्यान जिसमें उन्होंने भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों का ज़िक्र किया था. वे दक्षिण अफ़्रीका में एक ऐसे उपग्रह केन्द्र की यात्रा पर थे जहाँ विश्व के अनेक देशों द्वारा अंतरिक्ष में स्थापित उपग्रहों से प्राप्त जानकारी एकत्रित की जाती है और यथोचित रूप से वितरित की जाती है. प्रो. मशेलकर ने केन्द्र के अधिकारियों से अनुरोध किया कि वे उपग्रहों से प्राप्त सर्वश्रेष्ठ तस्वीरें उनको दिखायें. अधिकारी उनको एक कोने में ले गये और वहाँ आई.आर.एस.-१ सी द्वारा ली गयी तस्वीरें दिखायीं. जी हाँ, आई.आर.एस. मतलब इण्डियन रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट! प्रो. मशेलकर के लिये यह हर्ष और गर्व की सुखद अनुभूति थी.

दूसरी घटना है मई १९९८ की जब भारत ने नाभिकीय परीक्षण किये थे. उसके बाद अमेरिकी खुफिया विभाग सी.आई.ए. को सरदर्द हुआ कि उनके “की होल श्रृंखला” के जासूसी उपग्रह, खास तौर पर के.एच.-११, भला इस बात का पता पहले से कैसे नहीं लगा पाये. इस बारे में एक भारतीय अधिकारी ने कहा था कि यह अमेरिका की असफ़लता नहीं बल्कि भारत की सफ़लता है. हमको पता था कि उनके उपग्रह कब और क्या देखने में सक्षम हैं. इसका अर्थ अमेरिकी खुफ़िया विभाग के ही एक अधिकारी के इस कथन से समझा जा सकता है – “जिस देश के पास खुद इस तरह के आधा दर्जन उपग्रह हों, और जिसके एक दर्जन से अधिक उपग्रह अंतरिक्ष में घूम रहे हों, उसको आप इस प्रकार से बेवकूफ़ नहीं बना सकते. वे अच्छी तरह से जानते थे कि हम क्या देख रहे हैं और क्या नहीं”!

आइये जानें कि अपनी स्थापना के पश्चात् पिछले ४० वर्षों में इसरो की क्या उपलब्धियाँ रहीं. एक प्रक्षेपण में दो मुख्य भाग होते हैं – वाहक और उपग्रह. इन दोनों में प्रयोग होने वाली तकनीकियाँ सर्वथा भिन्न और क्लिष्ट होती हैं. और खर्चा तो होता ही है (हालांकि इसरो नासा के वार्षिक बजट के पचासवें हिस्से से भी कम धन में काम चला लेता है!). इसरो ने शुरु में उपग्रह निर्माण की तकनीकी विकसित की और अपने उपग्रहों को विदेशी प्रक्षेपकों सहायता से अंतरिक्ष में स्थापित किया. साथ-साथ प्रक्षेपक राकेटों के निर्माण की ओर भी ध्यान दिया गया. शुरु के प्रक्षेपक राकेट, जैसे एस.एल.वी.-३ कम भार वाले उपग्रहों (लगभग ४० किलोग्राम) को ही पृथ्वी से करीब ४०० किलोमीटर तक ले जाने में सक्षम थे. हमने प्रगति जारी रखी और यह सफ़र ए.एस.एल.वी. और पी.एस.एल.वी. से होते हुये अब जी.एस.एल.वी. तक आ पहुँचा है जो करीब २००० किलोग्राम के उपग्रह को भूस्थैतिक कक्षा (पृथ्वी से ३६००० किलोमीटर) में स्थापित करने में सक्षम है! यहाँ यह इंगित करना उचित होगा कि इसमें से अधिकांश तकनीकी स्वयं इसरो ने विकसित की है. यह कुछ निराशावादी भारतीयों और निष्क्रिय मीडिया की ही सोच की देन है कि हममें से बहुतों के विचार से हम विदेशों से तकनीकी खरीदते हैं या नकल करते हैं. खैर, मीडिया वाले भी दिवाली का राकेट बनाने और जी.एस.एल.वी. बनाने में अंतर की समझ कहाँ से रखें! रूस के नकलची – यह है खिताब हमारे कर्मठ वैज्ञानिकों और अभियन्ताओं का! ये वही वैज्ञानिक हैं जिन्होंने क्रायोजेनिक इंजन की तकनीकी स्वयं ही विकसित कर ली है! जाने दीजिये, इस बारे में चर्चा फिर कभी.

आज इसरो आकाश से बातें कर पा रहा है क्योंकि उसकी नींव विक्रम साराभाई, सतीश धवन, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और अन्य वैज्ञानिकों के मजबूत कंधों पर रखी गयी है. अभी आने वाले समय में चन्द्रयान-१ और २, जी.एस.एल.वी. एम.के.-२,३,४ की परियोजनायें प्रमुख हैं. इसरो निश्चित ही विश्व-स्तर का कार्य कर रहा है. हमारे पास टी.ई.एस., कार्टोसेट – १ और २ ऐसे उपग्रह हैं जिनकी विभेदन क्षमता १ मीटर से भी बेहतर है, और गुणवत्ता की दृष्टि से इनसे ली गयीं तस्वीरें “गूगल अर्थ” की सर्वश्रेष्ठ तस्वीरों के आस-पास हैं.

अब चर्चा करते हैं १० जनवरी को किये गये प्रक्षेपण की. प्रक्षेपण वाहक था पी.एस.एल.वी. सी.-७. यह पी.एस.एल.वी. द्वारा किया गया दसवाँ प्रक्षेपण था. इनमें पहले के अलावा बाकी नौ पूर्णत: सफ़ल रहे. इस बार पी.एस.एल.वी का काम था चार उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में लेकर जाना. इनमें से दो उपग्रह कार्टोसेट-२ और स्पेस रिकवरी कैप्सूल भारत के थे और एक था इंडोनेशिया का उपग्रह और दूसरा अर्जेन्टीना का ६ किलोग्राम का छोटा सा उपग्रह. ये चारों ६४० किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित ध्रुवीय कक्षा में सफ़लता पूर्वक छोड़ दिये गये. यह बारीक काम कितनी खूबसूरती से किया गया, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुख्य उपग्रह कार्टोसेट-२ को बिलकुल सही कक्षा में स्थापित करने में अपेक्षा से बहुत कम ईंधन खर्च हुआ और इससे उसकी उम्र दो वर्ष और बढ़ गयी!

इस प्रक्षेपण का मुख्य उपग्रह कार्टोसेट-२ एक दूर संवेदी उपग्रह है जिसका (पैन्क्रोमैटिक) कैमरा एक मीटर से भी बेहतर विभेदन क्षमता वाली तस्वीरें लेने में सक्षम है. इन तस्वीरों का उपयोग भारत और दूसरे देशों द्वारा शहर योजनाओं और कृषि में फ़सलों के निरीक्षण के लिये किया जायेगा. ऐसे उपग्रहों की तस्वीरें सैनिकों के लिये भी मददगार साबित हो रही हैं. उदाहरण के लिये कारगिल युद्ध में आई.आर.एस. से ली गयी तस्वीरें घुसपैठियों का ठिकाना ढूँढने में बहुत कारगर साबित हुयीं थीं. ऐसे अनुभव से प्रेरणा लेकर सन् २००१ में टी.ई.एस. उपग्रह बनाया गया जो पूरी तरह से भारतीय रक्षा सेनाओं को समर्पित है!

पी.एस.एल.वी. पर भारत भूमि से अंतरिक्ष तक की सवारी करने वालों में एस.आर.ई. (स्पेस कैप्सूल रिकवरी एक्सपेरिमेंट) भी है. यह एक विलक्षण प्रयोग है. करीब १२ दिन तक अंतरिक्ष यात्रा कराने के बाद २२ जनवरी को एस.आर.ई. को वापस धरती पर बुलाया जायेगा! यह बंगाल की खाड़ी के निकट पैराशूटों की सहायता से उतारा जायेगा जहाँ तट रक्षक इसके स्वागत के लिये पहले से ही उपस्थित होंगे. यह अद्भुत प्रयोग अंतरिक्ष में मानव भेजने की दिशा में भारत का पहला कदम भी माना जा सकता है. एस.आर.ई. को सफ़लतापूर्वक वापस बुलाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है. वापस आते समय हवा के घर्षण के कारण इसकी बाहरी सहत पर तापमान होगा करीब २००० डिग्री सेल्सियस, जबकि अंदर का तापमान करीब ४० डिग्री सेल्सियस. उल्लेखनीय है कि ऐसी परिस्थितियों का सामना भारतीय वैज्ञानिक अग्नि मिसाइल के समय पहले ही सफ़लतापूर्वक कर चुके हैं! एस.आर.ई. के प्रयोग की सफ़लता या असफ़लता इसरो की भावी दिशा निर्धारित करेगी.

सम्बन्धित कड़ियाँ:
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का जालघर, पी.एस.एल.वी. प्रक्षेपण की आधिकारिक सूचना, सी.एन.एन. आई.बी.एन. पर प्रक्षेपण का समाचार (वीडियो)

h1

इन्दौर के बढ़ते कदम

अक्टूबर 11, 2006

इन्दौर – विकास की राह पर तेज़ी से अपने कदम बढ़ाता एक शहर. यह शहर मुझे हमेशा से ही अपने घर की तरह प्रिय रहा है. यह बात अलग है कि यहाँ न तो मेरा घर है और न ही कोई रिश्तेदार! जो भी हो, मुझे इस शहर से बेहद लगाव है. चाहे कोई अमीर हो या ग़रीब, इस शहर ने हर एक को अपनाया है.

क्या नहीं है यहाँ? मराठों का इतिहास, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय और उससे जुड़े कई शिक्षण संस्थान. और हाँ, मैं शब-ए-मालवा को कैसे भूल सकता हूँ, गर्मियों की वो सुहानी शामें और वो ठण्डी हवायें, आह! “जैसे सहराओं में हौले से चले बाद-ए-नसीम!”

भारत के कोने-कोने से आकर यहाँ कितनी ही पीढ़ियों से लोग बसे हैं. मराठी, सिंधी, दक्षिण भारतीय, पंजाबी, मारवाड़ी, राजस्थानी और मालवा के मूल निवासी तो हैं हीं. खान-पान भी सभी प्रकार का, सभी प्रकार के भारतीय व्यंजन. इतनी विविधता है, इसीलिये तो इसको अक्सर मिनी-मुंबई कह दिया जाता है.

इन्दौर से एक घण्टे की दूरी पर हैं सतपुड़ा की पहाड़ियाँ, नर्मदा की घाटी तथा ओंकारेश्वर और महाकाल के मन्दिर. ओंकारेश्वर का धार्मिक महत्व तो है ही, साथ ही यहां की प्राकृतिक भी छटा देखते ही बनती है. यहाँ नर्मदा नदी ॐ की आकृति बनाती है.

इन्दौर को मध्य भारत की वाणिज्यिक राजधानी भी कहा जाता है और यहाँ सबकी पसंद और जेब के हिसाब से बहुत से बाज़ार हैं. ग्लोबस और रेडियो मिर्ची सबसे पहले यहीं आरम्भ हुये थे, और अब सेज़ और कई अन्य सूचना प्रौद्योगिकी पार्क भी शहर का मुख्य हिस्सा हो गये हैं.

अब मैं घूम-फिरकर उस बात पर आता हूँ जिसने मुझे इस लेख को लिखने को प्रेरित किया, और वह है इन्दौर का सड़क परिवहन तंत्र. इन्दौर का आधुनिक सड़क परिवहन तंत्र किसी भी विकसित देश को टक्कर देता है. अन्य सुविधाओं के अलावा इन्दौर के पास अभी ५० टाटा स्टार बसें हैं, जिनमें उपग्रहों से संचालित जी.पी.एस. के अलावा कम्प्यूटरीकृत टिकट मशीनें भी हैं! बस स्थानकों पर भी इलेक्ट्रानिक सूचना पट लगे हैं जिन पर यह देखा जा सकता है कि कौन सी बस कहां है, और कितनी देर में अमुक स्थानक तक पहुंचेगी. और इतनी सारी सुविधायें पुरानी नगर बस सेवा के किराये पर ही! इसके बावजूद भी इन्दौर नगर निगम ३-४ महीनों में ही इस सेवा से १ करोड़ रुपये का लाभ उठा चुका है. ये बसें समय पर आती हैं और विभिन्न मार्गों के हिसाब से अलग-अलग रंगों की हैं. बसों के कर्मचारियों को जनता के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये, इस बारे में भी एक प्रबंधन संस्था कर्मचारियों को प्रशिक्षण दे रही है. बसों के रख-रखाव पर तो विशेष ध्यान दिया ही जा रहा है.

इन्दौर के जिला कलक्टर श्री विवेक अग्रवाल के प्रयासों से ही यह सब संभव हो सका है. अभी फोन करके टैक्सी बुलाने की सार्वजनिक सेवा भी जल्दी ही शुरु होगी, और सड़कों पर पुराने टैम्पुओं का बोझ कुछ हल्का होगा.

दिल्ली को इन्दौर से इस बारे में कुछ सीखना चाहिये. दिल्ली चार साल में इस प्रकार की केवल ६ बसें ही सड़कों पर उतार पाया है. अभी अहमदाबाद ने भी इन्दौर के नक़्शे-क़दम पर चलने का निर्णय लिया है. बाकी बड़े शहरों को भी श्री अग्रवाल के इन्दौर से कुछ सबक लेना होगा. भारत ऐसे ही धीरे-धीरे विकास के मार्ग पर बढ़ता रहे, शुभकामनायें!

h1

आकाश छू लो वायु सैनिकों !

अक्टूबर 8, 2006

आज भारतीय वायु सेना का पिचहत्तरवां जन्मदिवस है. हमारी वायु सेना विश्व की चार सबसे बड़ी वायु सेनाओं में से एक है. समय चाहे युद्ध का हो या शान्ति का, हमारी सेनायें सदैव अपना शौर्य और पराक्रम प्रदर्शित करती रही हैं. आज हमारे पास विश्व के सर्वश्रष्ठ लड़ाकू यान हैं – जागुआर, सुखोई और मिग के कई स्वरूप, और कुछ समय बाद हमारा अपना तेजस भी वायु सेना की शोभा बढ़ायेगा.

इस बार वायु सेना दिवस के आयोजन का प्रमुख स्थल था हिन्डन, ग़ाज़ियाबाद स्थित वायु सेना का अड्डा. इस समारोह ऐसा में बहुत कुछ था जो पहली बार हुआ. यह विश्व में पहला मौका था जब किसी देश की वायु सेना के प्रमुख सीधे वायु मार्ग से ही किसी समारोह में उतरे हों. जी हाँ, ६१ वर्षीय एयर चीफ़ मार्शल शशीन्द्र पाल त्यागी कोई कार या जीप नहीं, बल्कि एक पैराशूट लेकर समारोह में उपस्थित हुए!

परेड तो होनी ही थी, उसके बाद अपनी ही तरह की पहली (संगीतमय) ड्रिल परेड भी हुई. इसमें वायु सेना के जवानों का अद्भुत सामंजस्य देखते ही बनता था. सुखोई और मिग विमानों की कलाबाज़ियाँ दिखाकर हमारे विश्वस्तरीय चालकों ने सबका मन मोह लिया. इस समारोह में पहली बार सारंग दल के चार हेलीकाप्टरों ने एक साथ हवा में करतब दिखाये. ध्यान देने योग्य बात यह है कि हेलीकाप्टरों से इस प्रकार के करतब दिखाना बहुत कठिन कार्य होता है और इसके लिये कड़ी मेहनत और योग्यता की आवश्यकता होती है. विश्व में सारंग के अलावा केवल दो ही ऐसे दल हैं जो इस प्रकार का प्रदर्शन करने में सक्षम हैं! कार्यक्रम में इसके अलावा युद्ध में घायल सैनिकों को तत्परता के साथ सुरक्षित स्थान तक ले जाने की कार्यवाही का भी प्रदर्शन किया गया.

अंत में सूर्य-किरण दल ने भी आकाश में गोते लगाते हुए अलग अलग आकारों में तिरंगे को उकेरा.

इन सब से हमें न केवल गर्व की अनुभूति होती है, बल्कि देशवासियों में सुरक्षा की भावना भी आती है. हम कामना करते है कि हमारी वायु सेना सारी सीमायें लांघकर आकाश को छू ले, जैसा कि वायु सेना का आदर्श वाक्य है, और भगवद् गीता के ग्यारहवें अध्याय के चौबीसवें श्लोक की आरम्भिक पंक्तियाँ भी – नभ: स्पर्शं दीप्तम्.

अगर आप दूरदर्शन पर इस कार्यक्रम को न देख पाये हों तो यहाँ अवश्य देखिये, पूरे दो घण्टे तक मंत्रमुग्ध कर देने वाला एक जादू!

h1

संभावनाओं के द्वार

अक्टूबर 3, 2006

मुझे अभी भी वे दिन अच्छी तरह से याद हैं. मैं छोटा था और मेरे रिश्ते के कुछ भाई-बहन अमरीका और यूरोप में अपनी पढ़ाई करने गये थे. जब भी वे वापस भारत आते तो अपने संग न जाने कितने किस्से कहानियाँ लाते. बाहर की दुनियाँ के किस्से मैं बड़े चाव से सुनता था. वे कहते थे कि मैं भी बड़ा होकर इन बड़े-बड़े देशों में घूमूँगा. उन्होंने मुझे यह भी बताया कि भारत अमरीका-यूरोप से ५० साल पीछे है और यहां अवसरों की बहुत कमी है.

संयोगवश मैं भी यूरोप आया और मुझे यहाँ ऐसा कुछ विशेष नहीं लगा जो कि मेरे बचपन की कल्पना से मेल खाता. मुझे समझ नहीं आया कि यहाँ भारत के किसी भी आधुनिक शहर के मुकाबले ऐसा क्या खास है? मैंने अपनी बहन से फोन पर पूछा तो उन्होंने कहा, “किड्डू, हम तो वहाँ १५ साल पहले थे, और अब ज़माना बदल रहा है. भारत में भी कई बदलाव हो रहे हैं, और अच्छे के लिये हो रहे हैं.” बाद में एक कम्प्यूटर पत्रिका के लिये साक्षात्कार देते समय मैंने अपनी बहन के ये शब्द पत्रकार के सामने भी रखे. आज भारत बदल चुका है और यहाँ अवसरों की कोई कमी नहीं है. यह बात आई.बी.ई.एफ़. के द्वारा स्थापित संगठन ‘इण्डिया ऐवरीव्हेयर´ ने लगभग छ: महीने पहले डावोस, स्विट्ज़रलैण्ड में विश्व आर्थिक मंच में स्पष्ट रूप से कही है. भारत में वह सब कुछ है जो इसको २०२० तक विकसित देशों की सूची में ला खड़ा करेगा. आज स्थिति यह है कि यदि कोई व्यक्ति अथवा संस्था अपनी पूजी लगाकर पूरी संतुष्टि चाहता है तो भारत में निवेश करता है अथवा किसी भारतीय कंपनी की सेवायें लेता है. मौके का लाभ उठाकर मैंने भी अभी हाल में ही अपने एक मित्र के साथ मिलकर एक IT/ITES कंपनी शुरु कर दी है. मैं ऐसा साहस इसीलिये कर सका कि मुझको भारत की अर्थव्यवस्था पर पूरा भरोसा है.

कोई भी क्षेत्र हो, IT/ITES, बायोटेक, दवा, अंतरिक्ष, विज्ञान, फ़ैशन, बैंकिंग अथवा वित्त, सभी में भारतीय लोगों ने कठिन परिश्रम कर अपनी एक पहचान बनाई है. न सिर्फ़ बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, बल्कि छोटी कंपनियाँ और हम जैसे व्यक्ति भी इस तथ्य को समझ पा रहे हैं और इसका लाभ उठाकर स्वयं को और अपने देश को कुछ दे पा रहे हैं. मैककिंजी के माइकल फ़र्नांडीज़ के अनुसार भारत में फुटकर बाज़ार की कीमत अगले ५-६ बर्षों में करीब ५०० अरब अमरीकी डालर हो जायेगी. अब कौन ऐसा मौका गंवाना चाहेगा! द्वार सबके लिये खुले हैं.

h1

चमत्कार कचरे का : ऊर्जा (भाग ३)

सितम्बर 14, 2006

बात है कुछ साल-डेढ़ साल पहले की. हम और हमारी पत्नीजी कोलकाता से मुम्बई आ रहे थे. गीतांजलि एक्सप्रेस का वातानुकूलित डिब्बा, और हमारी सामने वाली सीट पर एक सज्जन और उनकी पत्नीजी आकर विराजमान हुए. महोदय लगभग ४५ से ५० साल की उम्र के होंगे, महोदया विदेशी थीं. थोडी ही देर मे ज्ञात हुआ के महोदय मध्य-पूर्व के किसी देश में अभियन्ता के रूप में कार्यरत हैं, खुशी की बात है! थोड़ी देर मे चायवाला आया. महोदय ने चाय की एक प्याली खरीदी और अपनी पत्नी को देने लगे ज्ञान, “देखो कितनी सहूलियत है, चाय पियो और खाली प्याली फेंक दो. प्लास्टिक जैसी सस्ती चीज़ छोड़कर हमारे रेलवे मंत्री कहते हैं कि मिट्टी के कुल्हड़ इस्तेमाल करो.” अब कुल्हड़ कितने काम की चीज़ है यह विवाद फिर कभी. लेकिन सोचिये यह कि “यूज़ एण्ड थ्रो” वाली आदत हमें किस कदर संकट में डाल सकती है!

सन २००३-०४ में भारत में लगभग ४२ लाख टन प्लास्टिक का इस्तेमाल हुआ. सन २०१० तक यही आंकडा १२५ लाख टन हो जायेगा और भारत दुनियाँ का तीसरा सबसे ज्यादा प्लास्टिक इस्तेमाल करने वाला देश बन जायेगा. और हम लोग इस प्लास्टिक को इस्तेमाल करके, जैसा कि उन सज्जन ने भी कहा, फेंक देंगे. फिर चाहें वह जाकर नदी नालों में अवरोध पैदा करे, गाय भैंसों के पेट में जाकर उन्हें मारता रहे. अब कई राज्य सरकारों ने प्लास्टिक की थैलियों पर पाबंदी लगादी है लेकिन फिर भी प्लास्टिक अलग-अलग रूप में इस्तेमाल तो होगा ही और हमारे भविष्य के लिये खतरा बनेगा. किसी भी प्लास्टिक को प्राकृतिक रूप से विघटित होने के लिये लगभग १० लाख साल तक लग सकते है. यह समस्या सिर्फ़ हमारे देश की ही नहीं है, सारी दुनियाँ इससे परेशान है.

अच्छी खबर ये है कि इस समस्या का समाधान हमारे देश की एक महिला वैज्ञानिक ने ढूंढ निकाला है. नागपुर, महाराष्ट्र के एक इंजीनियरिंग महाविद्यालय की प्राध्यापिका श्रीमती अलका झाडगांवकर ने एक ऐसी प्रणाली की खोज की है जिससे प्लास्टिक को ईंधन मे परिवर्तित किया जा सकता है. वैसे तो प्लास्टिक का निर्माण पेट्रोलियम मतलब खनिज तेल से ही होता है लेकिन उसे फिर से खनिज तेल में परिवर्तित करना बडा़ ही मुश्किल और महंगा काम होता है. लेकिन यह नयी प्रक्रिया दुनियाँ की सबसे पहली प्रक्रिया है जिसमें किसी भी प्रकार की प्लास्टिक बिना किसी साफ़ सफ़ाई के सुरक्षित ढंग से इस्तेमाल की जा सकती है और वह भी व्यावसायिक रुप से! प्रो. झाडगांवकर के अनुसार, औसतन ९.५० रु. की लागत से १ किलोग्राम प्लास्टिक से ०.६ लिटर पेट्रोल, ०.३ लिटर डीज़ल व ०.१ लिटर दूसरे प्रकार के तेल का निर्माण किया जा सकता है जिसकी कीमत लगभग ३१.६५ रु. है.

इन सब चीज़ों से भी महत्वपूर्ण बात ये कि प्रो. झाडगांवकर की यह खोज सिर्फ़ एक तज़ुर्बा बन कर ही नहीं रही, उसके व्यावसयिक रुप से इस्तेमाल का बीड़ा भी उन्हीं ने उठाया है. और इस काम मे उनका साथ दे रहे हैं उनके पति, श्री उमेश झाडगांवकर. भारतीय स्टेट बैंक से ५ करोड़ रुपये कर्ज लेकर २००५ में उन्होंने पहला संयंत्र शुरु किया जो एक दिन मे लगभग ५००० किलोग्राम प्लास्टिक को ईंधन में बदल देता है. इस ईंधन को पास ही के कारखाने खरीदते है. अब इससे भी बडा, २५००० किलोग्राम (२५ टन) प्रति दिन क्षमता वाला संयंत्र बनाया जा रहा है, जिससे बनने वाले ईंधन की पूरी बुकिंग अभी से हो चुकी है! नागपुर शहर प्रतिदिन ३५ टन प्लास्टिक कचरा इकट्ठा करता है. इसका मतलब जल्दी ही झाडगांवकर परिवार को किसी और शहर मे अपने संयंत्र लगाने होंगे.

आशा है कि उनके इन प्रयासों को सफ़लता मिलेगी और सारी दुनियाँ को इस भयावह समस्या से छुटकारा मिलेगा. हमें भी इस प्रक्रिया में उनका हाथ बंटाना है. कैसे? अगर हम सब ध्यान रखें कि प्लास्टिक के सामान को सही तरीके से जमा करके अलग से रखा जाय जिससे कि वह अन्य कचरे में ना मिले और उसका निस्तारण व इस्तेमाल ठीक ढंग से हो.

क्रमशः…..

सम्बंधित कड़ियाँ: प्रो. झाडगांवकर का इस प्रक्रिया के सम्बन्ध में शोधपत्र, गुडन्यूज़ इण्डिया पर एक आलेख, केन्द्रीय प्लास्टिक अभियांत्रिकी तथा तकनीकि संस्थान

h1

एक दूरदृष्टि : ऊर्जा (भाग २)

सितम्बर 4, 2006

शुरुआत करते हैं एक निजी अनुभव से. मई १९९८, भारत के एक वरिष्ठ नाभिकीय भौतिकशास्त्री के साथ काम करने का अवसर मिला. कुछ दिन पहले ही भारत ने पाँच नाभिकीय परीक्षण किये थे. एक दिन बडे उत्साह से हमने उनसे कहा कि हमें बड़ा अभिमान है कि हमारे वैज्ञानिकों और अभियन्ताओं ने पाँच सफल परीक्षण करके सारी दुनियाँ को अपनी क्षमता से अवगत करा दिया. वे हँस कर बोले, “इसमें कौन सी बड़ी बात है”? मैने पूछा, “क्या ऐसे परिष्कृत अण्वास्त्र बनाना कोई बड़ी उपलब्धि नही? इसमें तो बड़ी आधुनिक तकनीकि का प्रयोग होता होगा? यह काम आसान तो नहीं”! उन्होंने कहा “बिल्कुल, ऐसे अण्वास्त्र बनाने की तकनीकि कुछ गिने-चुने देशों के पास ही है. परन्तु हमारे देश के वैज्ञानिक इससे भी कठिन काम हर रोज़ करते हैं”. मैं हैरान हो गया! उन्होंने समझाया कि आज भारत में २० से ज्यादा अलग-अलग प्रकार की परमाणु भट्टियाँ हैं. कुछ का इस्तेमाल शोध के लिये होता है तो कुछ का उर्जा निर्माण के लिये. एक अणवास्त्र मे समान्यत: २० से २५ किलोग्राम यूरेनियम या प्लूटोनियम का इस्तेमाल होता है और उसके विस्फोट की अभिक्रिया अनियन्त्रित होती है, जबकि किसी औसत परमाणु भट्टी मे इससे हज़ार गुना अधिक सामग्री होती है और उससे भी महत्वपूर्ण बात ये कि उसमें धीरे-धीरे नियन्त्रित रूप से अभिक्रिया करवानी होती है जो कि बहुत ही जोखिम भरा और कठिन काम है और भारतीय वैज्ञानिकों और अभियन्ताओं को इसमें कई दशकों से महारत हासिल है!

अब ज़रा ये सोचिये कि लगभग ३५ करोड़ आबादी वाला एक देश जो मुश्किल से १ साल पहले ही आज़ाद हुआ हो, जहाँ सैकड़ों लोग भूख से मर रहे हों, और ऐसी परिस्थिति मे एक वैज्ञानिक कहे कि हमें अणुशक्ति अनुसन्धान में पैसा खर्च करना चाहिये! कोई भी सामान्य आदमी उसे पागल कहेगा. लेकिन जब डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ने यह प्रस्ताव रखा तो पण्डित जवाहरलाल नेहरु ने उस पर गौर किया और सन १९४८ में परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की गई. डॉ. भाभा की दूरदॄष्टि की दाद देनी होगी कि उन्होंने उस जमाने मे अणुशक्ति के महत्व के बारे में सोचा जब परमाणु विखण्डन का एक ही भयावह और विध्वंसक उपयोग किया गया था, हिरोशिमा और नागासाकी में! लेकिन उन्होंने यह जान लिया कि यही परमाणु शक्ति एक दिन मानव के काम आएगी और इस पर शोध भारत को अभी से शुरु करना चाहिये जिससे कि बाद में हमें दूसरे देशों का मुँह न देखना पडे. वे तो फिर भी एक वैज्ञानिक थे, इस विषय के महत्व को समझना उनके लिये शायद उतना कठिन न था, लेकिन नेहरुजी ने भी इसकी गहनता को समझा ये एक महत्वपूर्ण बात है. और उनके इन प्रयासों का नतीजा यह हुआ कि आज भारत उन गिने-चुने देशों में से है जो परमाणु ऊर्जा निर्माण के पूरे नाभिकीय ईंधन चक्र (न्यूक्लियर फ़्युअल सायकल) के लिये जरूरी सारी तकनीकों की जानकारी रखते हैं. जहाँ आवश्यकता हुई वहाँ दूसरे देशों से सहायता भी ली गयी. जैसे कनाडा, अमरीका, रूस, फ़्रांस इत्यादि. उन तकनीकों के बारे मे विस्तार से चर्चा फिर कभी करेंगे.

आज हमारे देश मे कुल मिलाकर १,२४,२८७ मेगावाट (मार्च २००६) बिजली का उत्पादन होता है, उसमें से ३३६० मेगावाट बिजली (१८ अगस्त २००६ को तारापुर परमाणु बिजलीघर मे ५४० मेगावाट की दूसरी इकाई को राष्ट्रीय बिजली संजाल से जोडे जाने से यह क्षमता बढकर ३९०० मेगावाट हो गयी है) परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से आती है. और इस लेख के लिखते समय ३३८० मेगावाट क्षमता की इकाईयां निर्माणाधीन हैं, जिनमें एक ५०० मेगावाट की द्रुत प्रजनक परमाणु भट्टी (फ़ास्ट ब्रीडर रियेक्टेर) भी शामिल है. द्रुत प्रजनक परमाणु भट्टी की ये विशेषता होती है कि वह जितना ईंधन जलाती है, कुछ विशिष्ट नाभिकीय प्रक्रिया से, उससे ज्यादा ईंधन निर्माण करती है जो रासायानिक प्रक्रिया करने के बाद परमाणु भट्टियों में इस्तेमाल किया जाता है. कुछ और परियोजनायें भी विचाराधीन है. व्यावसायिक तौर पर बिजली उत्पादन के लिये परमाणु भट्टियाँ बनाना और उनके संचालन का दायित्व न्यूक्लियर पावर कारपोरेशन आफ़ इण्डिया लिमिटेड और भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड, इन दो सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर है. राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम जी ने लक्ष्य रखा है कि सन् २०२० तक कम से कम २०,००० मेगावाट बिजली नाभिकीय संयंत्रों से आनी चाहिये. परमाणु ऊर्जा निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण काम होता है उसके ईंधन की निर्माण और उससे भी महत्वपूर्ण उसके इस्तेमाल के बाद उसका रख रखाव. उसके रेडियोधर्मी होने की वजह से यह सब काम अत्यन्त खतरनाक और कठिन होते है. साथ ही साथ इनसे जुड़ी हुई हज़ारों तकनीकें अत्यन्त जटिल होती हैं, और उससे भी मुश्किल ये कि इनमें से कई तकनीकें, उनके दोहरे इस्तेमाल के कारण, हर देश को खुद ही विकसित करनी पडती हैं जिसमें कई दशकों का शोधकार्य जरूरी होता है, ये ज्ञान कुछ सालों के शोध से प्राप्त नही हो सकता.

भविष्य के लिये नयी-नयी तकनीकें विकसित की जा रही हैं. इस दिशा मे शोध की जिम्मेदरी भाभा परमाणु अनुसन्धान केन्द्र, मुम्बई और इंदिरा गाँधी परमाणु अनुसन्धान केन्द्र, कलपक्कम पर है. इन दोनों केन्द्रों में नयी और परिष्कॄत परमाणु भट्टियों, नये और ज्यादा व्यावसायिक ईंधन निर्माण तथा उसके इस्तेमाल के बाद विविध रासयानिक प्रक्रियाओं से उसमें तैयार होने वाले नये ईंधन को अलग करना, इत्यादि पर काम जारी है. साथ ही साथ कुछ नयी और ज्यादा सुरक्षित परमाणु भट्टियों के निर्माण पर भी शोधकार्य चल रहा है.

क्रमश:….

साभार: इस लेख में प्रस्तुत सारे आंकडे इन जगहों से लिये गये है – न्यूक्लियर पावर कारपोरेशन आफ़ इण्डिया लिमिटेड, परमाणु ऊर्जा विभाग