Archive for जनवरी, 2007

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भारत:व्यक्ति बनाम तंत्र

जनवरी 24, 2007

हमारे समाज में यह आम धारणा है कि व्यक्ति विशेष तो अपने दम पर बहुत कुछ अर्जित कर सकता है, सफलता की नयी-नयी ऊँचाइयां छूकर नित नये मानदण्ड स्थापित कर सकता है, परन्तु उसके इस विकास में हमारे देश के मूलभूत ढाँचे का योगदान न के बराबर ही है, या कहिये कि है ही नहीं! तो सवाल उठता है कि इस अवधारणा में सच्चाई आखिर कितनी है? आइये चर्चा करें.

एक समाज को समझने और उस पर अपनी राय बनाने के मापदण्ड उन मापदण्डों से सर्वथा भिन्न हैं जो कि एक व्यक्ति विशेष को समझने और उस पर अपनी राय बनाने के लिये चाहिये. या यूं समझिये कि समाज को जानने का प्रयास करना मतलब एक वृहत् या स्थूल अध्य्यन और उस समाज के व्यक्तियों को एक-एक कर समझना मतलब एक सूक्ष्म अध्ययन. इसी बात को गणित की भाषा में कहा जाय तो यह कि एक समाज का स्थूल स्वरूप उसके व्यक्तियों के सूक्ष्म वैयक्तिक गुणों का औसत मान है, जो कि बहुमत के आस-पास ही है. और जैसा कि सांखिकीय तथ्य है, एक व्यक्ति विशेष के वैयक्तिक गुण-धर्म पूरे समूह के औसत गुण-धर्मों के औसत मान से बहुत अधिक विचलित हों, ऐसा विरले ही होता है, आखिरकार सूक्ष्म वैयक्तिक गुण ही तो पूरे समाज को एक वृहत् स्वरूप प्रदान करते हैं.

कोई भी निर्जीव भौतिक तंत्र हो, पूरे तंत्र की किसी भी विशेषता को समृद्ध करने के लिये एक प्रकार की वाह्य ऊर्जा चाहिये. इसी प्रकार, यदि सामजिक तंत्र की बात की जाय तो उसकी समृद्धि और विकास के लिये भी वाह्य संस्कृतियों की रोशनी समाज में आती रहनी चाहिये. पर इसके अलावा बहुत सी नयी-नयी बातें जानने और सीखते रहने की मानवीय उत्कंठा भी नये लक्ष्य निर्धारित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक है. कई बार एक व्यक्ति विशेष की ऐसी ही उत्कंठा उसे वर्तमान सामाजिक सीमाओं से परे सोचने को प्रेरित करती है और देखते-देखते यही उत्कंठा एक प्रेरणा की तरह पूरे तंत्र में फैल जाती है और समाज को एक नयी दिशा देती है. दिलचस्प बात यह है कि लगभग प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी एक ऐसे दौर से गुज़रता है जब उसमें सीमाओं को लांघकर कुछ हटकर करने की तीव्र लालसा होती है, पर अधिकांश व्यक्तियों में यह एक क्षणिक उद्वेग ही होता है और वे भी फिर से भीड़ में ही कहीं खो जाते हैं, या कई बार तो भीड़ ही उन्हें अपनी ओर खींच लेती है! और इस प्रकार अक्सर “समाज” ही वैयक्तिक उत्कंठाओं के दमन का कारण बनता है. यह समाज का वह अंग होता है जो कभी स्वयं नये मार्ग पर जाने में असफल रहा होता है.

क्या कोई ऐसा उपाय है कि समाज के इस अंग के कुप्रभाव से बचा जा सके? एक व्यक्ति का पूरे समाज पर क्या प्रभाव होता है? इतिहास साक्षी है कि अतीत में जितने भी सामजिक, दार्शनिक अथवा वैज्ञानिक परिवर्तन हुए, उनमें एक व्यक्ति विशेष अथवा छोटे समूह को ही लीक से हटकर चलना पड़ा और धीरे-धीरे समाज भी उनके साथ हुआ. इस सम्बन्ध में अमूल एक अच्छा उदाहरण है. कुछ ग्रामवासियों की एक पहल को वर्गीस कुरियन का नेतृत्व मिला और समूचे देश में श्वेत क्रांति आ गयी. इसी प्रकार हाल में नोबल पुरस्कार के कारण चर्चा में आयी बंग्लादेश की ग्रामीण बैंक का सपना साकार करने वाले मुहम्मद युनुस ने विपरीत परिस्थितियों का सामना करके एक मिसाल खड़ी की है. पर एक दृष्टि से देखा जाय तो क्या परिवर्तन का यह तरीका बहुत अक्षम नहीं है! याद कीजिये १८५७ की क्रांति जो इतिहास के पन्नों में एक विद्रोह बनकर रह गयी! कुछ व्यक्तियों द्वारा शुरु किये गये इस पुण्य कार्य को ब्रितानी सरकार सिर्फ़ इसलिये कुचल पायी क्योंकि सामाजिक चेतना का अभाव था. यदि सामजिक चेतना एक साथ जागृत हो जाय तो क्या नहीं हो सकता! वे व्यक्ति जिनकी सोच इस दिशा में सकारात्मक है, यदि एक साथ आगे आयें तो हमें क्यों उन व्यक्तियों के अवतरित होने की प्रतीक्षा करनी पड़े जो समाज को अपने बलबूते पर आगे बढायें? कदम-कदम से ही कारवां बनता है, और यही तो लोकतंत्र का सार है.

यह समझना आवश्यक है कि यदि समाज का ही एक अंग खुली और सकारात्मक सोच वाले व्यक्तियों को आगे आने से रोकेगा तो सबको सामूहिक जिम्मेदारी का बोझ उठाने को तैयार रहना चाहिये. समाज का प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह कितना भी विवेकी, समृद्ध अथवा सफल क्यों न हो – सभी को अपने दृष्टिकोण में यथोचित परिवर्थन करना होगा. हम अभी तक लोकतंत्र की शक्ति और उसके संभावित परिणामों को नहीं समझ पाये हैं, इन्हें जल्दी ही समझना बेहतर होगा.

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कहानी दो अंकों की

जनवरी 21, 2007

कला और विज्ञान को आमतौर पर अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है. अंग्रेज़ों द्वारा तैयार की गयी वर्तमान भारतीय शिक्षा प्रणाली में भी दोनों विषय माध्यमिक स्तर पर ही अलग कर दिये जाते है. क्या कला और विज्ञान साथ-साथ नहीं चल सकते? अगर कोई कहे कि कम्प्यूटर क्रांति कला की एक बड़ी देन है तो उस व्यक्ति पर निश्चित रूप से संदेह की दृष्टि से देखा जायेगा!

कला और विज्ञान का एकात्म स्वरूप के ईसा से कोई ५०० वर्ष पूर्व भारतीय विद्वान पिंगल को विदित था. यदि कहें कि कम्प्यूटर क्रांति का स्रोत पिंगल की इसी सोच में छिपा है, तो गलत न होगा! कैसे? आइये जानने का प्रयास करें.

कम्प्यूटर जो भी कुछ करता है, उसमें एक गणना छिपी होती है. अब एक निर्जीव वस्तु गणना कैसे करे, और उस वस्तु को गिनती समझायी जाय तो भला कैसे! यह सब संभव है द्विअंकीय प्रणाली के माध्यम से. ये दो अंक १ और ० हार्ड डिस्क के किसी क्षेत्र के चुम्बकीयकृत होने या न होने को निरूपित कर सकते हैं या सी.डी. के किसी स्थान पर प्रकाश के ध्रुवीयकरण की दो अलग अवस्थाओं को भी. अब प्रश्न यह है कि इसमें कला कहाँ से आ गयी? तो जवाब है कि यह विचार कि किसी वस्तु की दो अवस्थाओं के आधार पर कोई भी कठिन से कठिन गणना संभव है, कला से ही आया. अब सोचिये न, ये दो अवस्थायें कविता में प्रयोग किये जाने वाले छन्दों के किसी स्थान पर लघु अथवा गुरु होने का निरूपण भी तो कर सकतीं हैं! द्विअंकीय सिद्धान्त यहीं से आया! पिंगल के छन्द शास्त्र में पद्यों में छिपे इस सिद्धान्त का वर्णन बहुत सहजता और वैज्ञानिक ढंग से किया गया है.

पिंगल ने कई छन्दों का वर्गीकरण आठ गणों के आधार पर किया. इस वर्गीकरण को समझने के लिये पहले देखें एक सूत्र: “यमाताराजभानसलगा“. यदि मात्रा गुरु है तो लिखें १ और यदि लघु है तो ०. अब इस सूत्र में तीन-तीन अक्षरों को क्रमानुसार लेकर बनायें आठ गण,

  • यगण = यमाता = (०,१,१)
  • मगण = मातारा = (१,१,१)
  • तगण = ताराज = (१,१,०)
  • रगण = राजभा = (१,०,१)
  • जगण = जभान = (०,१,०)
  • भगण = भानस = (१,०,०)
  • नगण = नसल = (०,०,०)
  • सगण = सलगा = (०,०,१)

अब ये आठ गण यूँ समझिये कि हुये ईंट, जिनसे मिलकर कविता का सुंदर महल खड़ा है. इन ईंटों का प्रयोग करके बहुत से सुंदर छन्द परिभाषित और वर्गीकृत किये जा सकते हैं. यही नहीं, ये आठ गण ० से लेकर ७ तक की संख्याओं का द्विअंकीय प्रणाली में निरूपण कर रहे हैं, सो अलग. और तो और इनमें गणित की सुप्रसिद्ध द्विपद प्रमेय [Binomial Theorem] भी छिपी बैठी है! यदि ल और ग दो चर हैं [या दो अवस्थायें हैं], तो (ल+) के विस्तार में लग का गुणांक = उन गणों की संख्या जिनमें दो लघु तथा एक गुरु है = ३ [ज‍गण, भगण, सगण]. तो इस प्रकार (ल+) = ल+ ३ल+ ३लग+ .

छन्दों से गणित और कम्प्यूटर विज्ञान का यह रास्ता पिंगल ने दिखाया. क्या यह एक संयोग ही है कि छन्दों के अध्ययन में भी हम विश्व में अग्रणी रहे और आज २५०० वर्षों के बाद कम्प्यूटर विज्ञान में भी अपनी सर्वोत्कॄष्टता सिद्ध कर चुके हैं! शायद यह सब हमारे उन पुरखों का आशीर्वाद है जिनकी कल की सोच की रोशनी हमारे आज को प्रकाशित कर रही है.

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आसमान से आगे

जनवरी 17, 2007

एक और सफ़ल प्रक्षेपण! भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने १० जनवरी २००७ को ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण वाहक (पी.एस.एल.वी.) को चार उपग्रहों के साथ आकाश में रवाना कर वर्ष की धमाकेदार शुरुआत कर ही दी. एक वाहक में चार उपग्रह अपने आप में बड़ी उपलब्धि है. इन चार में से दो उपग्रह हमारे थे और दो दूसरे देशों के.

जब भी इसरो ऐसी सफलता प्राप्त करता है, मुझे दो घटनायें याद आ जाती हैं. तो पहले उन्हीं का उल्लेख करते हैं. पहली घटना है, प्रख्यात रसायनज्ञ प्रो. रघुनाथ अनंत मशेलकर का एक व्याख्यान जिसमें उन्होंने भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों का ज़िक्र किया था. वे दक्षिण अफ़्रीका में एक ऐसे उपग्रह केन्द्र की यात्रा पर थे जहाँ विश्व के अनेक देशों द्वारा अंतरिक्ष में स्थापित उपग्रहों से प्राप्त जानकारी एकत्रित की जाती है और यथोचित रूप से वितरित की जाती है. प्रो. मशेलकर ने केन्द्र के अधिकारियों से अनुरोध किया कि वे उपग्रहों से प्राप्त सर्वश्रेष्ठ तस्वीरें उनको दिखायें. अधिकारी उनको एक कोने में ले गये और वहाँ आई.आर.एस.-१ सी द्वारा ली गयी तस्वीरें दिखायीं. जी हाँ, आई.आर.एस. मतलब इण्डियन रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट! प्रो. मशेलकर के लिये यह हर्ष और गर्व की सुखद अनुभूति थी.

दूसरी घटना है मई १९९८ की जब भारत ने नाभिकीय परीक्षण किये थे. उसके बाद अमेरिकी खुफिया विभाग सी.आई.ए. को सरदर्द हुआ कि उनके “की होल श्रृंखला” के जासूसी उपग्रह, खास तौर पर के.एच.-११, भला इस बात का पता पहले से कैसे नहीं लगा पाये. इस बारे में एक भारतीय अधिकारी ने कहा था कि यह अमेरिका की असफ़लता नहीं बल्कि भारत की सफ़लता है. हमको पता था कि उनके उपग्रह कब और क्या देखने में सक्षम हैं. इसका अर्थ अमेरिकी खुफ़िया विभाग के ही एक अधिकारी के इस कथन से समझा जा सकता है – “जिस देश के पास खुद इस तरह के आधा दर्जन उपग्रह हों, और जिसके एक दर्जन से अधिक उपग्रह अंतरिक्ष में घूम रहे हों, उसको आप इस प्रकार से बेवकूफ़ नहीं बना सकते. वे अच्छी तरह से जानते थे कि हम क्या देख रहे हैं और क्या नहीं”!

आइये जानें कि अपनी स्थापना के पश्चात् पिछले ४० वर्षों में इसरो की क्या उपलब्धियाँ रहीं. एक प्रक्षेपण में दो मुख्य भाग होते हैं – वाहक और उपग्रह. इन दोनों में प्रयोग होने वाली तकनीकियाँ सर्वथा भिन्न और क्लिष्ट होती हैं. और खर्चा तो होता ही है (हालांकि इसरो नासा के वार्षिक बजट के पचासवें हिस्से से भी कम धन में काम चला लेता है!). इसरो ने शुरु में उपग्रह निर्माण की तकनीकी विकसित की और अपने उपग्रहों को विदेशी प्रक्षेपकों सहायता से अंतरिक्ष में स्थापित किया. साथ-साथ प्रक्षेपक राकेटों के निर्माण की ओर भी ध्यान दिया गया. शुरु के प्रक्षेपक राकेट, जैसे एस.एल.वी.-३ कम भार वाले उपग्रहों (लगभग ४० किलोग्राम) को ही पृथ्वी से करीब ४०० किलोमीटर तक ले जाने में सक्षम थे. हमने प्रगति जारी रखी और यह सफ़र ए.एस.एल.वी. और पी.एस.एल.वी. से होते हुये अब जी.एस.एल.वी. तक आ पहुँचा है जो करीब २००० किलोग्राम के उपग्रह को भूस्थैतिक कक्षा (पृथ्वी से ३६००० किलोमीटर) में स्थापित करने में सक्षम है! यहाँ यह इंगित करना उचित होगा कि इसमें से अधिकांश तकनीकी स्वयं इसरो ने विकसित की है. यह कुछ निराशावादी भारतीयों और निष्क्रिय मीडिया की ही सोच की देन है कि हममें से बहुतों के विचार से हम विदेशों से तकनीकी खरीदते हैं या नकल करते हैं. खैर, मीडिया वाले भी दिवाली का राकेट बनाने और जी.एस.एल.वी. बनाने में अंतर की समझ कहाँ से रखें! रूस के नकलची – यह है खिताब हमारे कर्मठ वैज्ञानिकों और अभियन्ताओं का! ये वही वैज्ञानिक हैं जिन्होंने क्रायोजेनिक इंजन की तकनीकी स्वयं ही विकसित कर ली है! जाने दीजिये, इस बारे में चर्चा फिर कभी.

आज इसरो आकाश से बातें कर पा रहा है क्योंकि उसकी नींव विक्रम साराभाई, सतीश धवन, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और अन्य वैज्ञानिकों के मजबूत कंधों पर रखी गयी है. अभी आने वाले समय में चन्द्रयान-१ और २, जी.एस.एल.वी. एम.के.-२,३,४ की परियोजनायें प्रमुख हैं. इसरो निश्चित ही विश्व-स्तर का कार्य कर रहा है. हमारे पास टी.ई.एस., कार्टोसेट – १ और २ ऐसे उपग्रह हैं जिनकी विभेदन क्षमता १ मीटर से भी बेहतर है, और गुणवत्ता की दृष्टि से इनसे ली गयीं तस्वीरें “गूगल अर्थ” की सर्वश्रेष्ठ तस्वीरों के आस-पास हैं.

अब चर्चा करते हैं १० जनवरी को किये गये प्रक्षेपण की. प्रक्षेपण वाहक था पी.एस.एल.वी. सी.-७. यह पी.एस.एल.वी. द्वारा किया गया दसवाँ प्रक्षेपण था. इनमें पहले के अलावा बाकी नौ पूर्णत: सफ़ल रहे. इस बार पी.एस.एल.वी का काम था चार उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में लेकर जाना. इनमें से दो उपग्रह कार्टोसेट-२ और स्पेस रिकवरी कैप्सूल भारत के थे और एक था इंडोनेशिया का उपग्रह और दूसरा अर्जेन्टीना का ६ किलोग्राम का छोटा सा उपग्रह. ये चारों ६४० किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित ध्रुवीय कक्षा में सफ़लता पूर्वक छोड़ दिये गये. यह बारीक काम कितनी खूबसूरती से किया गया, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुख्य उपग्रह कार्टोसेट-२ को बिलकुल सही कक्षा में स्थापित करने में अपेक्षा से बहुत कम ईंधन खर्च हुआ और इससे उसकी उम्र दो वर्ष और बढ़ गयी!

इस प्रक्षेपण का मुख्य उपग्रह कार्टोसेट-२ एक दूर संवेदी उपग्रह है जिसका (पैन्क्रोमैटिक) कैमरा एक मीटर से भी बेहतर विभेदन क्षमता वाली तस्वीरें लेने में सक्षम है. इन तस्वीरों का उपयोग भारत और दूसरे देशों द्वारा शहर योजनाओं और कृषि में फ़सलों के निरीक्षण के लिये किया जायेगा. ऐसे उपग्रहों की तस्वीरें सैनिकों के लिये भी मददगार साबित हो रही हैं. उदाहरण के लिये कारगिल युद्ध में आई.आर.एस. से ली गयी तस्वीरें घुसपैठियों का ठिकाना ढूँढने में बहुत कारगर साबित हुयीं थीं. ऐसे अनुभव से प्रेरणा लेकर सन् २००१ में टी.ई.एस. उपग्रह बनाया गया जो पूरी तरह से भारतीय रक्षा सेनाओं को समर्पित है!

पी.एस.एल.वी. पर भारत भूमि से अंतरिक्ष तक की सवारी करने वालों में एस.आर.ई. (स्पेस कैप्सूल रिकवरी एक्सपेरिमेंट) भी है. यह एक विलक्षण प्रयोग है. करीब १२ दिन तक अंतरिक्ष यात्रा कराने के बाद २२ जनवरी को एस.आर.ई. को वापस धरती पर बुलाया जायेगा! यह बंगाल की खाड़ी के निकट पैराशूटों की सहायता से उतारा जायेगा जहाँ तट रक्षक इसके स्वागत के लिये पहले से ही उपस्थित होंगे. यह अद्भुत प्रयोग अंतरिक्ष में मानव भेजने की दिशा में भारत का पहला कदम भी माना जा सकता है. एस.आर.ई. को सफ़लतापूर्वक वापस बुलाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है. वापस आते समय हवा के घर्षण के कारण इसकी बाहरी सहत पर तापमान होगा करीब २००० डिग्री सेल्सियस, जबकि अंदर का तापमान करीब ४० डिग्री सेल्सियस. उल्लेखनीय है कि ऐसी परिस्थितियों का सामना भारतीय वैज्ञानिक अग्नि मिसाइल के समय पहले ही सफ़लतापूर्वक कर चुके हैं! एस.आर.ई. के प्रयोग की सफ़लता या असफ़लता इसरो की भावी दिशा निर्धारित करेगी.

सम्बन्धित कड़ियाँ:
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का जालघर, पी.एस.एल.वी. प्रक्षेपण की आधिकारिक सूचना, सी.एन.एन. आई.बी.एन. पर प्रक्षेपण का समाचार (वीडियो)