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हमारी पहचान – भाग २

अक्टूबर 15, 2006

गतांक से आगे…

अब आप पूछेंगे, कि अगर इतना सब हो रहा है तो फिर आप ”वंदे मातरम्” पर ये पुराना ढोल काहे बजाते रहते हो, कि हमारे पूर्वजों ने ये किया, वो किया? नये ज़माने की बात करो. इस सवाल का जवाब भी एक और सवाल में है. एक बात बताईये, कोई इन्सान भारतीय कब कहलाया जा सकता है? बताईये, जवाब इतना मुश्किल भी नहीं है. एक आदमी, नाम ”फ़कीरचंद” कोलकता में साइकिल रिक्शा चलाता है आप कैसे बतायेंगे कि वो भारतीय है कि नहीं? उसका जन्म भारत में हुआ के नहीं यह देख कर, या उसका पासपोर्ट (जो उसके पास है ही नहीं!) देख कर. नहीं, भारतीयता, खून में, दिल-ओ-दिमाग़ में होती है. आज हमारा हीरो फ़कीरचंद, रोटी खाता, बंगाली भाषा में बात करता है, जरूरत पडे तो हिन्दी बोल लेता है. बहुत मेहनत कर के अपना और अपने बच्चों का पेट पालता है. हर दुर्गा पूजा के लिये अपना पेट काट कर सालभर पैसा जमा करता है, माँ की मूर्ति खुद अपने हाथ से बनाता है. ”मछेर झोल और भात” उसे अच्छा लगता है. अब सोचिये यही फ़कीरचंद अब एक बहुत बड़ी सोफ्टवेअर कंपनी में काम करता है. कोलकता में ही रहता है. साल में छह महीने देश के बाहर गुज़ारता है. बीवी और बच्चों को हर शनिवार घुमाने ले जाता है, खाना पिज़्ज़ा हट या मैकडोनाल्ड में खाता है. ”क्या करें, आज काल बच्चे इन सब चीजों के बिना रह ही नहीं सकते” दुर्गापूजा, कालीपूजा इन सब बातों के लिये उसके पास वक्त नहीं है. घर में सब अंग्रेज़ी में बात करते है. बच्चों को बंगाली आती है, बस ”किच्छु किच्छु” (उतनी ही आती है!), पेप्सी या कोक के बिना उन्हें खाना हज़म नहीं होता. और कहानी ऐसे ही आगे बढ़ती रही. अब बताईये कौन सा फ़कीरचंद आपको ज़्यादा भारतीय लगता है?

अब इसमे किसी भी फ़कीरचंद या उसके बच्चों का कोई दोष नहीं. पानी वहीं बहता है जहां ढलान हो. भारत की प्रगति के साथ साथ भारतीयता भी बढ़नी जरुरी है. विदेशों से आनेवाली हर चीज़ बुरी नहीं. परंतु, हमें क्या लेना है क्या नहीं, यह निर्णय हमारा होना चाहिये. मुझे भी पिज़्ज़ा पसंद है पर मेरी माँ की बनायी हुई मूँग की दाल की खिचड़ी और मेथी का साग (देसी घी के साथ!), कोई तुलना नहीं.

आज कल कुछ लोग ”ब्राण्ड इण्डिया” की बात करते है. मुझे बहुत दुख होता है यह सुनकर. यह देश हमारी माँ है, हमें इसे बेचने के लिये नहीं सजाना है. हमे उसे उसी भक्तिभाव से सजाना है जैसे माँ दुर्गा को सजाते है. इसलिये नहीं कि दूसरे देश उसे देख कर उसका सम्मान करें. इसलिये हम उसके बच्चे है. भारत महान था, है, और रहेगा. उसके लिये इश्तेहार लगाने कि ज़रूरत नहीं. कल आज और कल के इस खेल में अगर हमें जीतना है तो हमें जानना होगा की हम कल क्या थे और आज क्या हैं. सबसे ज़्यादा ज़रूरी यह है की आज हम जो भी हैं, वो हम कैसे बने? अगर हमारा कल समृद्ध था तो आज हम समृद्ध क्यों नहीं? ऐसी हमने कौन सी ग़लतियां कीं जिसका यह परिणाम है. हमें हमारी पहचान नहीं भूलनी है, नहीं तो हम जीत कर भी हार जायेंगे. हो सकता है कि एक दिन मैकडोनाल्ड को भी एक भारतीय कंपनी द्वारा खरीद लिया जाय, लेकिन वो तब तक भारतीय नहीं होगा जब तक उसमे, बर्गर के साथ साथ ”सरसों दा साग ते मक्के दी रोटी” ना मिले. जिस दिन ऐसा होगा, मित्रों, उस दिन मै गंगा में डुबकी लगाऊंगा. और अगर ऐसा न हुआ तो कमबख्त ”चाय” पीना छोड़ दूँगा!

क्रमश:… हमारे हिन्दी और अंग्रेजी चिट्ठों पर आयी टिप्पणियों से प्रेरित विचारों के साथ

5 टिप्पणिया

  1. अभी इस श्रृंखला के आपके प्रथम दो लेख पढ़े। लेख तो अच्छे है, विचारोत्तेजक हैं। सम्पूर्ण लेख एक ही बार में होता तो सम्भवत: इसे एक साथ ही पढ़ना अच्छा लगता, और कदाचित आप अपने राष्ट्रवादी विचारों को और प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत करते।

    हाँ, एक रोचक बात और भी रही। निम्न उद्धृत वाक्य इस लेख में अवश्य ही भ्रांति कारक (अथवा यूँ कहें कि श्लेष अलंकार युक्त) लगा।

    हो सकता है के एक दिन मैकडोनाल्ड भी कोई भारतीय कंपनी खरीद ले

    यद्यपि लेख के सन्दर्भ में सही अभिप्राय समझा जा सकता है, परंतु यदि पाठक इसके दूसरे सम्भावित अर्थ को भी देखें तो भी यह वाक्य सन्दर्भ से अधिक परे नहीँ रहेगा।😉


  2. वन्दे-वन्देमातरम् ।
    आपकी सारी टीम को मेरी शुभकामनाएं और दुआएं। अपनी जड़ों से जुड़े रह कर ही आसमान को छुया जा सकता है-यह तथ्य इतनी खूबसूरती से आप लोग पाठकों के दिलों मे उतार रहे है कि वन्दे-वन्देमातरम् कहने को मन किया। कृपया जारी रखें ।


  3. धन्यवाद राजीव जी, हमने भूल सुधार कर लिया है. लेख इतना लम्बा हो रहा था कि पाठक ऊब न जायें, इस आशंका से इसको कड़ियों में तोड़ना पड़ा. और रत्ना जी, “अपनी जड़ों से जुड़े़ रह कर ही आसमान को छुया जा सकता है” – इतने सुंदर और संक्षेप रूप में आपने हमारे लेख का सार व्यक्त किया, प्रसन्नता हुई.

    जैसा कि लेख के अंत में कहा है, सभी टिप्पणियों का समावेश कर इस श्रृंखला का तीसरा भाग तैयार किया जा रहा है.


  4. “मुझे भी पिज़्ज़ा पसंद है पर मेरी माँ की बनायी हुई मूँग की दाल की खिचड़ी और मेथी का साग (देसी घी के साथ!), कोई तुलना नहीं”

    बिल्कुल सही कहा आपने. हम या तो पश्चिम के पीछे भगते हैं या वो हमें बिल्कुल नही सुहाता. हमे अपनी संस्क्रति का सम्मान करते हुए पश्चिम से भी कुछ सीखना पडेगा.


  5. It is individual choice isn’t it. I have lived outsside India for the past 8 years with little prospects of returning back. Having said that i predominantly eat indian food. I do like to eat pizza or whatever else (thai, chinesee, j japanese, ititalian …) ) Does that make me less indian ? Food, demeanor, accent are aall superfluous things, its the way of thinking that defines a man. As long as i act in my little ways to support India i qualify i think.



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