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हमारी पहचान – भाग १

अक्टूबर 13, 2006

हमें शिकायत है, सारे जहां से शिकायत है. क्या कहा? क्यों? कभी भारत देश के बाहर किसी विकसित देश में निकले हो? नहीं? तो फिर कई तरह की बदनामी से बच गये भैया! ये विकसित देश वही देश हैं जहाँ, बच्चों को एक उम्र के बाद माँ-बाप से मिलने के लिये अपोइन्ट्मेन्ट लेना पड़ता है, मतलब अगर बच्चे मिलना चाहें तो! हाँ, कोई जबरदस्ती नहीं. जहाँ इतनी आज़ादी है के बच्चे अपने माता-पिता पर मुकदमा चला सकते है अगर उन्हे डाँटा गया तो. हाँ, तो मै क्या कह रहा था? हाँ, शिकायत है. शिकायत यह है की इन देशों के बहुत से लोग हमारे देश को इज्जत नहीं देते. कहने को मुँह खोल के भारत को “अनोखा देश, रंगबिरंगा देश, अनगिनत भाषाओं का देश कहेंगे” लेकिन चार दिन इन लोगों के साथ गुज़ारिये पता चल जायेगा कि ये लोग हमारे बारे में क्या सोचते है. अब इस जगह मैं वाचकों को दो हिस्सों में बाँटना चाहूँगा. एक जो इस विचारधारा के हैं, कि भैया वो लोग कुछ भी सोचें, हमें तो अपने रस्ते चलते रहना है. मैं ऐसे साधु पुरुषों को और स्त्रियों को सादर विनती करूँगा कि अभी इस लेख को पढ़ना बन्द कर दें. दूसरा गुट है ऐसे लोगों का जिन्हें ऐसी ही शिकायत है. तो मेरे शिकायत प्रधान बन्धुओं और भगिनिओं आओ, सोचें कि यह सब क्या है और क्यूँ है? हम बात करेंगे कुछ सवालों की और उनके जवाबों की. शुरु करें?

हाँ तो सबसे पहला सवाल, क्यूँ भाई भारत के लोग सर के बल चलते हैं या चाँदी सोना उगाते है जो सारी दुनियाँ उनका सम्मान करे? कुछ लोग कहेंगे, क्या बात करते हो? हमारे देश कि सांस्कृतिक धरोहर देखो, मंदिर देखो, हमारी विविधता में एकता देखो. जानते हो, शून्य की खोज हमारे देश में हुई, तुम जिसे पाइथागोरस थ्योरम के नाम से जानते हो उसे पाइथागोरस के २५० साल पहले बौधायन ने खोजा था. दिल्ली का लौह स्तंभ जानते हो १२०० साल तक खुली हवा, धूप, बारिश झेलते हुए खडा है, आज तक कोई माई का लाल वैसा लोहा तैयार नहीं कर सका है. दुनियाँ भर के वैज्ञानिक थक गये. भास्कर, आर्यभट्ट, पाणिनी, सुश्रुत नाम भी सुने है? दुनियाँ की सबसे पहली प्लास्टिक सर्जरी सुश्रुत ने की थी सदियों पहले. अणु कि खोज महर्षि कणाद ने इन फिरंगो से हजारों साल पहले की थी. वेद, गीता जैसे ग्रन्थ यहाँ लिखे गये. दुनियाँ का सबसे पहला विश्वविद्यालय हमारे यहाँ बना. अरे, जब यह आज के विकसित देश के लोग जानवरों की तरह जंगलों मे घूमते थे और कपडे़ पहनना सीख रहे थे, तब मेरे देश मे लोग सोने के तारों से भी वस्त्र बुना करते थे! शान्ति, शान्ति, शान्ति! मानते हैं आपकी बात. लेकिन यह तो हुई पुरानी बात. अब क्या हो रहा है? आज हम क्या हैं? अब हम फिर से बचे हुए वाचकों को दो हिस्सों में बांटते है. एक जो कहेंगे हाँ भाई सच है, इन लालची नेताओं ने हमें कहीं का नहीं छोडा. इसीलिये तो हम भारत छोड़कर यहाँ आकर बस गये. या फिर, इसी लिये हम कोशिश कर रहे है कि हमारा बेटा अमरीका मे बस जाये और हमें भी एक दिन इस नरक से छुटकारा दिला दे. वैसे हम वहाँ पर जाकर एक ब्लॉग शुरु करेंगे जिसमें अपने देश के बारे में उसकी महानता के बारे मे लिखेंगे. ऐसे लोग इस लेख को आगे पढकर अपना वक्त ज़ाया न करें, अमरीकी दूतावास कि क़तार बहुत लम्बी होती है, अभी जाकर नम्बर लगायेंगे तो शायद वीज़ा मिल जाये. जय रामजी की. हाँ भई, दूसरे हिस्से मे कोई बचा है? हाँ बिल्कुल हैं, धन्यवाद. आप ही देश कि आशा हैं. चलिये अब बात को आगे बढाते है. और आज की बात करते है.

एक वक्त हम भी काफ़ी निराश थे अपने देश से, लेकिन अब सूरत बदलती नजर आ रही है. बात है १९९१ की, जब प्रधान मंत्री पी.वी. नरसिम्हाराव के नेतृत्व में वित्त मंत्री डा. मनमोहन सिंह ने भारत की अर्थव्यवस्था का वैश्वीकरण शुरु किया. अब तो लोगों को विश्वास हो गया कि हम फिर से गुलामी की ओर जा रहे हैं. अब हर भारतीय कंपनी को विदेशी कंपनियाँ खरीद लेंगी. और ऐस कई मामलों में हुआ भी, केल्विनेटेर, लिम्का, गोल्ड स्पोट, जैसे कई उदाहरण दिये जा सकते है. लेकिन आज क्या हो रहा है १५ साल बाद? बात ज्यादा पुरानी नहीं है, ५ सितंम्बर २००६, एक सर्वेक्षण के अनुसार, १ जनवरी २००६ से ३० जून २००६ तक के छ्ह महीनों में, भारतीय कंपनियों ने २५५ विदेशी कंपनियों पर कब्जा कर लिया है या बहुत बड़ा हिस्सा खरीद लिया है. और इनमें से लगभग सारी कंपनियां विकसित देशों की ही है. इस सारी ”शोपिंग” की कीमत है लगभग १७ अरब अमरीकी डालर. पिछले साल इसी दौरान भारतीय कंपनियों ने ६ अरब अमरीकी डालर की खरीदारी की. मतलब १७५ प्रतिशत कि बढ़ोत्तरी एक साल के अन्दर. भारत आज तीसरा सबसे ज्यादा तेजी से विदेशी कंपनियाँ खरीदने वाला देश बन गया है. इसका मतलब ये कि जिस तरह से जब हम भारत में बने हुए शीतल पेय खरीदते है तब उस से होने वाला मुनाफ़ा भारत में नहीं भारत के बाहर बैठे उस कंपनी के मलिक के जेब में जाता है. वैसे ही अब भारतीय कंपनियाँ विदेशों से पैसा कमाकर हमारे देश को समृद्ध बनाने में मदद करेंगी. भारत की कई बड़ी समस्यायें भारत के लिये फायदेमंद साबित हो रही है. पहली समस्या – जनसंख्या. आज भारतीय नागरिक की औसत उम्र बहुत से देशों से कम है. मतलब, आने वाले २०-२५ सालों भारत में तुलनात्मक रुप से सबसे ज़्यादा जवान हाथ होंगे जब बाकी देशों में बूढ़ों की संख्या जवानों से ज्यादा होगी. दूसरी समस्या, भारत में व्यापार करना आग में चलने के बराबर है, जिसकी वजह से भारतीय व्यापारी, विदेशी व्यापरियों से ज्यादा आसानी से चुनौतियों का सामना कर पाते है. उदाहरणार्थ, फ़्रांस में आज व्यापार प्रबंधन के क्षेत्र में, किसी अभ्यर्थी के पास भारत में काम करने का अनुभव होना विशेष योग्यता माना जाता है. कई बड़ी-बड़ी विदेशी कंपनियों का प्रबंधन भारतीयों के हाथ है. भारत की अर्थव्यवस्था आज ८% की गति से बढ़ रही है. टाटा, रिलायंस, वीडियोकोन ही नहीं छोटी छोटी कंपनियाँ भी अब बहुराष्ट्रीय बन रही हैं. सिर्फ़ निजी कंपनियाँ ही नहीं, ओ.एन.जी.सी. जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम भी दुनियाँ भर में अपने हाथ-पाँव फैला रहे हैं. सूचना प्रौद्यौगिकी और दवा के क्षेत्र में भारत विश्वस्तर पर प्रसिद्ध है ही.

क्रमश:

3 टिप्पणिया

  1. आपने बहुत सारी बातों को सामने लाया है बढिया अंदाज़ मे, मगर फिर भी ये हमारा दिल कहता है…
    सारे जहां से अच्छा हिन्दुसतान हमारा


  2. हमारा एक पक्ष उजला है तो दूसरा दाग़दार, आपने दोनों को ही सामने रखा है। उम्मीद है कि निकट भविष्य में उजला पक्ष व्यापक हो सकेगा और दाग़दार पक्ष भी उजले पक्ष की रौशनी से परिवेष्टित हो जाएगा।


  3. यह बात सही है कि हमारा अतीत सुनहरा रहा है। किन्तु दुर्भाग्यवश हमारा वर्तमान बहुत सुनहरा नहीं है। हालांकि बहुत सारे मुद्दों पर भारत ने बहुत प्रगति की है, माना कि हमारी अर्थव्यवस्था बहुत तेजी से बढ रही है। किन्तु आज भी बीमरी, गरीबी और भुखमरी से बहुत से लोग मर रहे हैं । आज का युवा रोजगार को लेकर बहुत चिंतित है और आज भी हमारे किसान आये दिन आत्हमत्याएं कर रहे हैंॅ। गरीब और अमीर के बीच की खाई बढ रही है। किन्तु हमेशा बुरे पक्ष को देख कर दुखी होने से कोई फायदा नहीं इसी प्रकार केवल अच्छे अतीत और कुछ अच्छी बातें होने से हमें सभी चीजों के लिये आँखे भी नहीं मूँद लेनी चाहिये।
    जरूरत है अच्छे नेतृत्व की, भारत को पिछले १५ सालों से कोई युवा नेता नहीं मिला। यदि ये सही है कि भारत में युवाओं की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा है तो ये आश्चर्यजनक बात है कि हमारी राजनीति में युवा चेहरे क्यों नहीं हैं ? एसा क्यों है कि राजनीति को केवल अपराध से ही जोङकर देखा जाता है ? यदि कोई बच्चा बङा होकर राजनेता बनना चाहता है तो लोग उसका यह कह कर मजाक क्यों उङाते हैं कि ये तो है ही गुण्डा ? मेरे ख्याल से अच्छे और युवा लोगों का राजनीति में आना भारत के सुनहरे भविष्य के लिये बेहद जरूरी है ।
    मुझे याद है, दसवीं कक्षा में मैंने पढा था (शायद भारतेन्दु जी ने लिखा था) “भारतीय लोग रेल के डिब्बों की तरह हैं इन्हें सही दिशा में ले जाने के लिये एक इंजन की जरूरत है”। आशा करता हूँ कि ये इंजन गाँधी जी के मार्डन अवतार के रूप में जल्दी ही हमारे सामने होगा ।



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