Archive for अक्टूबर, 2006

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आर. के. लक्ष्मण

अक्टूबर 20, 2006

उम्र कुछ पचास की होगी, सिर पर बालों का नामो-निशान नहीं, एक धोती और सादी सी कमीज के एक साथ चश्मा, जो मानो अभी नाक से फ़िसलने ही वाला है! यह आखिर है कौन? अरे! ये तो मैं हूं, आप भी हैं – यह है एक आम आदमी! सुप्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण का आम आदमी. बरसों से अपने कितने ही दिनों की शुरुआत करते आ रहे हैं हम समाचार पत्रों के पहले पन्ने के किसी कोने में बैठे इस आम आदमी के साथ. हममें से कितनों के जीवन में हर दिन एक नयी प्रेरणा, एक नयी ऊर्जा का संचार करता आ रहा है हमारा अपना ही प्रतिबिंब यह आम आदमी, मानो कि धुंधलके में एक आशा की किरण हो. समय चुनावों का हो या घोटालों का, या फिर कोई भ्रष्टाचार, हमारा यह आम आदमी सब पर अपनी पैनी रखता आ रहा है. उसकी खामोशी में कभी परिपक्वता नज़र आती है, तो कभी मजबूरी. वह हमारे देश की आम जनता का सच्चा प्रतिनिधि है.

आमतौर पर माना जाता है कि कार्टून मासूम बच्चों के दिलों को ही छूते हैं. कार्टूनों की दुनियां में मनुष्य व अन्य जानवर बड़े ही laxman3.jpg सामंजस्य के साथ रहते हैं. विज्ञान के शुष्क सिद्धान्तों का कार्टूनों में कोई स्थान नहीं होता, बल्कि एक विचित्र कल्पना ही उभरकर सामने आती है. कार्टूनों का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन ही होता है अत: उनके संसार कोई पीड़ा नहीं होती, पर लक्ष्मण के कार्टून इन सबसे हटकर हैं. उनके कार्टून पात्र उसी हवा में सांस लेते हैं जिनमें एक आम भारतीय. राह चलते, बाज़ारों में, घर पर या कार्यालय में जो भी कष्ट एक आम भारतीय को हो सकते हैं वे सभी कष्ट लक्ष्मण के पात्र हमारे साथ बांटते हैं.

आर.के. लक्ष्मण का जन्म १९२४ में सांस्कृतिक नगर मैसूर में हुआ. वे आठ भाई-बहनों में सबसे छोटे हैं. मैसूर के प्रतिष्ठित महाराजा कालेज से स्नातक के पश्चात उन्होंने १९४७ में कार्टूनों की दुनियां में कदम रखा. टाइम्स आफ़ इण्डिया समाचार पत्र में उन्होंने “यू सैड इट” नामक कार्टून श्रृंखला शुरू की जिसके माध्यम से उनका आम आदमी हर एक आम आदमी से रोज़ सुबह मिला करता था. कार्टूनों के अलावा उन्होंने कुछ लघु-कथायें, निबन्ध, यात्रा वृतांत व उपन्यास भी लिखे और बाद में “द टनल आफ़ टाइम” नाम से अपनी आत्म-कथा भी प्रकाशित की.

उनके बड़े भाई आर.के. नारायण की कहानियों पर आधारित दूरदर्शन धारावाहिक “मालगुडी डेज़” के छोटे से कस्बे की मिट्टी मानो लक्ष्मण के कार्टूनों को पाकर सोंधी होकर महक उठी हो. जब स्वामी क्रिकेट खेलता नज़र आता है, तब अहसास होता है कि वे पात्र कितने सच्चे थे, कितने जीवंत थे. मुझे वे सभी चेहरे अच्छे से याद है; उन्हें कोई भूल भी कैसे सकता है आखिर.

लक्ष्मण अपने काम में छोटी से छोटी बारीकियों पर विशेष ध्यान देते हैं. किसी स्थिति विशेष अथवा पात्रों के उल्लास, निराशा या धैर्य का चित्रण करना हो तो उनके द्वारा उकेरी हुई कुछ घुमावदार रेखायें ही काफ़ी होती हैं. उनके कार्टूनों की सरलता ही उनकी सुंदरता है और उनका हास्य पक्ष भी. उनका सबसे लोकप्रिय पात्र अपने आस-पास की घटनाओं का एक मूक दर्शक है, जिसके हाव-भाव ही उसकी मनो: स्थिति स्पष्ट कर देते हैं.

आर. के. लक्ष्मण को केवल एक कार्टूनिस्ट ही नहीं कहा जा सकता. उन्होंने एक सीधे-सच्चे व्यंग्य के माध्यम से हमें सामाजिक और राजनैतिक रूप से अधिक जागरूक भी बनाया है. यदि उनके कार्टून न होते तो हममें से कई लोग, भ्रष्टाचार और आये दिन होने वाले घोटालों से तंग आकर निराशावादी हो जाते. जो निश्चेष्ट हुए उनको लक्ष्मण के कार्टूनों ने एक मूक दर्शक से सक्रिय किया – कुछ आड़ी-तिरछी रेखाओं, वक्रों और पेंसिल थामे सधे हुये हाथों तथा एक तीक्ष्ण दिमाग़ की चतुराई भर से ही!

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हमारी पहचान – भाग ३

अक्टूबर 17, 2006

यह आलेख मूलत: एक टिप्पणी का जवाब है जो हमारे पिछले आलेख पर आयी थी (हमारे अंग्रेज़ी चिट्ठे में)

टिप्पणी: “विदेशियों के भारतीय लोगों से घृणा करने का कारण है कि अभी तक हमारी परम्परागत छवि बनी हुई है. बहुत से विदेशी भीड़-भाड़ वाले और प्रदूषित शहरों को लेकर शिकायतें करते हैं. बड़े शहरों जैसे मुम्बई, दिल्ली और बंगलौर में भी सबसे पहले आपकी नज़र भिखारियों पर पड़ती है. हम प्रगति तो कर रहे हैं, पर इन सभी कारणों से हमारी छवि जस-की-तस बनी हुई है.”

हमारे आलेख का मुख्य बिन्दु यह नहीं था, पर बात निकली है तो उस पर विचार भी होना चाहिये. इस टिप्पणी में जो कुछ कहा गया, काफ़ी सीमा तक सच भी है और चिंता का विषय भी. सबसे पहले  हमारी परम्परागत छवि आखिर है क्या? गन्दे शहर, गन्दे लोग? उससे भी पहले – हमारी परम्परा क्या है? यदि आप सोच रहे हैं कि प्रदूषित और भीड़-भाड़ वाले इलाके हमारी परम्परा हैं तो यह गलत है. तो आईये बात करें हमारे दो अलग-अलग पहलुओं की – हमारी परम्परा और हमारी परम्परागत छवि.

यदि बाहर के लोग सोचतें हैं कि गन्दगी ही हमारी परम्परा है, तो उनका भी क्या दोष! हां स्वयं अपने बारे में न जानना हमारे दोष अवश्य होगा. मैं एक उदाहरण देता हूं, जो ज़रा कुछ हटकर है. अमरीकी लोगों को देखिये, अंग्रेज़ी का उन्होंने जितना बेड़ा-गर्क किया है उतना किसी और ने नहीं! पर हमारे देश में इस टूटी-फूटी, या कहिये तोड़ी-फोड़ी गयी अमरीकन अंग्रेज़ी को बोलना आधुनिकता की निशानी माना जाता है. यदि नयी दिल्ली स्टेशन पर मैथिली या भोजपुरी में घोषणायें की जायें तो हम कहेंगे “भैया, किस गंवार को अनाउन्सर बना के बिठा दिया है”. ध्यान रहे, मैथिली और भोजपुरी हिन्दी की बोलियां हैं, हिन्दी का विकृत स्वरूप नहीं. क्या लास-एंजिल्स हवाई अड्डे पर विकृत अंग्रेज़ी में होने वाली घोषणाओं पर भी हमारी यही प्रतिक्रिया होगी? कतई नहीं!

परम्परायें आसमान से उतरकर नहीं आतीं, उन्हें हम बनाते हैं. हम जो आज करते है, कल वह परम्परा बन जाता है. कल्पना कीजिये, मुम्बई से फ़्रेंकफ़र्ट जाने वाले जहाज में कोई भारतीय नवयुवक धोती पहनकर आता है. यह निश्चित है कि उसको विदेशी लोग तो नहीं, पर हम जरूर जोकर कहेंगे. और कोई विदेशी जो बरमूड़ा पहनकर घुसा वह, उसका क्या? जब हम भारत में ही बड़ी-बड़ी दुकानों – वेस्ट साईड, रीबाक, प्लानेट एम इत्यादि में खरीदारी करने जाते हैं तब हिन्दी या क्षेत्रीय भाषा नहीं बोलते, आखिर  क्यों? ऐसा नहीं है कि हमें हिन्दी या क्षेत्रीय भाषा नहीं आती, घर पर तो दूध वाले और धोबी से हम अंग्रेज़ी में बात नहीं करते ना! हम सोचते हैं कि बड़ी जगहों पर अपनी भाषा बोलने से बाकी लोग हमें पिछड़ा समझेंगें. हमें अपनी छवि की कितनी चिन्ता है, और वह भी अपने ही लोगों के सामने! कैसी विडम्बना है, हम अपने लोग आपस में बात करने के लिये विदेशी भाषा की सहायता लें, और वह भी तब जब सामने वाले को भी अपनी देसी भाषा अच्छी तरह से आती है! हमारा आचरण देखकर ही हमारे बच्चे सीखते हैं, और परम्परायें बस ऐसे ही बनती हैं.

अब बात करते हैं हमारी बाहरी छवि, जैसे शहरों में गन्दगी के ढेर इत्यादि. आप ज़रा पहले भीड़-भाड़ वाले यूरोपीय शहर देखिये – पेरिस, फ़्रेंकफ़र्ट, बर्लिन, ब्रसेल्स आदि. इस दुनियां में ऐसा कौन सा शहर है जिसकी उपनगरीय रेल सेवा एक दिन में ६० लाख यात्रियों को ढोती हो? और वह भी जमीन के नीचे नहीं ऊपर! मुम्बई का कोई मुकाबला नहीं. पेरिस की मेट्रो सेवा ४० लाख यात्रियों को प्रतिदिन ढोती है (जमीन के नीचे!), और उसके स्टेशन कितने साफ़ हैं? आप वहां के स्टेशनों पर लगे टाइल्स न देखिये, असली गन्दगी की बात कीजिये. हमारी परिस्थितियों के हिसाब से हम बहुत अच्छा कर रहे हैं, यह मानना होगा. मैं प्रदूषण की पैरवी नहीं कर रहा, बल्कि यह कह रहा हूं कि प्रदूषण एक कीमत है जिसे आज दुनियां का हर बड़ा शहर चुका रहा है. मुख्य प्रश्न यह है कि हम इस बारे में क्या कर रहे हैं. हमारी प्रवृत्ति यह हो चली है कि हम किसी भी समस्या के ऊपर बैठ जाते हैं और चिल्लाने लगते हैं, समाधान का प्रयास भी नहीं करते. यदि आज सरकार निजी वाहनों पर प्रदूषण कर लगा दे तो कितने ही सरकार विरोधी नारे तैयार हो जायेंगे, सरकार को चूना लगाने के नये तरीके भी इज़ाद हो जायेंगे. कभी सोचिये कि इन विकसित देशों के लोग अपने-अपने देश की सरकारों को कितना सारा कर ईमानदारी से देते हैं. विकास मुफ़्त में नहीं आता, हमें कुछ तो कीमत अदा करनी होती है, प्रदूषण के रूप में हो, या कर के रूप में – पसंद अपनी अपनी!

पूरे १५० साल के शोषण के बाद हमें स्वतंत्रता मिली. पिछले ६० सालों में विभाजन की विभीषिका के बाद घुली धार्मिक कड़वाहट, गरीबी, जनसंख्या और नौकरशाही जैसी समस्याओं से जूझने के बाद भी तेज़ी से विकास की राह पर अग्रसर है, क्या यह मायने नहीं रखता? अभी इस वर्ष के शान्ति के नोबेल पुरस्कार विजेता श्री मुहम्मद यूनुस का नाम याद आ रहा है जिन्होंने अपने घर सोफ़े पर बैठे हुए टी.वी. पर गरीबी देखने और सरकार की बुराई करने की अपेक्षा समस्या से लड़ने का रास्ता चुना. उम्मीद है कि भारत के लोगों को भी इससे सीख मिलेगी. और जैसा कि हमारे राष्ट्रपति जी कहते हैं, हमारे में समस्याओं से लड़ने की क्षमता है, और हम जीतकर भी दिखायेंगे.

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हमारी पहचान – भाग २

अक्टूबर 15, 2006

गतांक से आगे…

अब आप पूछेंगे, कि अगर इतना सब हो रहा है तो फिर आप ”वंदे मातरम्” पर ये पुराना ढोल काहे बजाते रहते हो, कि हमारे पूर्वजों ने ये किया, वो किया? नये ज़माने की बात करो. इस सवाल का जवाब भी एक और सवाल में है. एक बात बताईये, कोई इन्सान भारतीय कब कहलाया जा सकता है? बताईये, जवाब इतना मुश्किल भी नहीं है. एक आदमी, नाम ”फ़कीरचंद” कोलकता में साइकिल रिक्शा चलाता है आप कैसे बतायेंगे कि वो भारतीय है कि नहीं? उसका जन्म भारत में हुआ के नहीं यह देख कर, या उसका पासपोर्ट (जो उसके पास है ही नहीं!) देख कर. नहीं, भारतीयता, खून में, दिल-ओ-दिमाग़ में होती है. आज हमारा हीरो फ़कीरचंद, रोटी खाता, बंगाली भाषा में बात करता है, जरूरत पडे तो हिन्दी बोल लेता है. बहुत मेहनत कर के अपना और अपने बच्चों का पेट पालता है. हर दुर्गा पूजा के लिये अपना पेट काट कर सालभर पैसा जमा करता है, माँ की मूर्ति खुद अपने हाथ से बनाता है. ”मछेर झोल और भात” उसे अच्छा लगता है. अब सोचिये यही फ़कीरचंद अब एक बहुत बड़ी सोफ्टवेअर कंपनी में काम करता है. कोलकता में ही रहता है. साल में छह महीने देश के बाहर गुज़ारता है. बीवी और बच्चों को हर शनिवार घुमाने ले जाता है, खाना पिज़्ज़ा हट या मैकडोनाल्ड में खाता है. ”क्या करें, आज काल बच्चे इन सब चीजों के बिना रह ही नहीं सकते” दुर्गापूजा, कालीपूजा इन सब बातों के लिये उसके पास वक्त नहीं है. घर में सब अंग्रेज़ी में बात करते है. बच्चों को बंगाली आती है, बस ”किच्छु किच्छु” (उतनी ही आती है!), पेप्सी या कोक के बिना उन्हें खाना हज़म नहीं होता. और कहानी ऐसे ही आगे बढ़ती रही. अब बताईये कौन सा फ़कीरचंद आपको ज़्यादा भारतीय लगता है?

अब इसमे किसी भी फ़कीरचंद या उसके बच्चों का कोई दोष नहीं. पानी वहीं बहता है जहां ढलान हो. भारत की प्रगति के साथ साथ भारतीयता भी बढ़नी जरुरी है. विदेशों से आनेवाली हर चीज़ बुरी नहीं. परंतु, हमें क्या लेना है क्या नहीं, यह निर्णय हमारा होना चाहिये. मुझे भी पिज़्ज़ा पसंद है पर मेरी माँ की बनायी हुई मूँग की दाल की खिचड़ी और मेथी का साग (देसी घी के साथ!), कोई तुलना नहीं.

आज कल कुछ लोग ”ब्राण्ड इण्डिया” की बात करते है. मुझे बहुत दुख होता है यह सुनकर. यह देश हमारी माँ है, हमें इसे बेचने के लिये नहीं सजाना है. हमे उसे उसी भक्तिभाव से सजाना है जैसे माँ दुर्गा को सजाते है. इसलिये नहीं कि दूसरे देश उसे देख कर उसका सम्मान करें. इसलिये हम उसके बच्चे है. भारत महान था, है, और रहेगा. उसके लिये इश्तेहार लगाने कि ज़रूरत नहीं. कल आज और कल के इस खेल में अगर हमें जीतना है तो हमें जानना होगा की हम कल क्या थे और आज क्या हैं. सबसे ज़्यादा ज़रूरी यह है की आज हम जो भी हैं, वो हम कैसे बने? अगर हमारा कल समृद्ध था तो आज हम समृद्ध क्यों नहीं? ऐसी हमने कौन सी ग़लतियां कीं जिसका यह परिणाम है. हमें हमारी पहचान नहीं भूलनी है, नहीं तो हम जीत कर भी हार जायेंगे. हो सकता है कि एक दिन मैकडोनाल्ड को भी एक भारतीय कंपनी द्वारा खरीद लिया जाय, लेकिन वो तब तक भारतीय नहीं होगा जब तक उसमे, बर्गर के साथ साथ ”सरसों दा साग ते मक्के दी रोटी” ना मिले. जिस दिन ऐसा होगा, मित्रों, उस दिन मै गंगा में डुबकी लगाऊंगा. और अगर ऐसा न हुआ तो कमबख्त ”चाय” पीना छोड़ दूँगा!

क्रमश:… हमारे हिन्दी और अंग्रेजी चिट्ठों पर आयी टिप्पणियों से प्रेरित विचारों के साथ

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हमारी पहचान – भाग १

अक्टूबर 13, 2006

हमें शिकायत है, सारे जहां से शिकायत है. क्या कहा? क्यों? कभी भारत देश के बाहर किसी विकसित देश में निकले हो? नहीं? तो फिर कई तरह की बदनामी से बच गये भैया! ये विकसित देश वही देश हैं जहाँ, बच्चों को एक उम्र के बाद माँ-बाप से मिलने के लिये अपोइन्ट्मेन्ट लेना पड़ता है, मतलब अगर बच्चे मिलना चाहें तो! हाँ, कोई जबरदस्ती नहीं. जहाँ इतनी आज़ादी है के बच्चे अपने माता-पिता पर मुकदमा चला सकते है अगर उन्हे डाँटा गया तो. हाँ, तो मै क्या कह रहा था? हाँ, शिकायत है. शिकायत यह है की इन देशों के बहुत से लोग हमारे देश को इज्जत नहीं देते. कहने को मुँह खोल के भारत को “अनोखा देश, रंगबिरंगा देश, अनगिनत भाषाओं का देश कहेंगे” लेकिन चार दिन इन लोगों के साथ गुज़ारिये पता चल जायेगा कि ये लोग हमारे बारे में क्या सोचते है. अब इस जगह मैं वाचकों को दो हिस्सों में बाँटना चाहूँगा. एक जो इस विचारधारा के हैं, कि भैया वो लोग कुछ भी सोचें, हमें तो अपने रस्ते चलते रहना है. मैं ऐसे साधु पुरुषों को और स्त्रियों को सादर विनती करूँगा कि अभी इस लेख को पढ़ना बन्द कर दें. दूसरा गुट है ऐसे लोगों का जिन्हें ऐसी ही शिकायत है. तो मेरे शिकायत प्रधान बन्धुओं और भगिनिओं आओ, सोचें कि यह सब क्या है और क्यूँ है? हम बात करेंगे कुछ सवालों की और उनके जवाबों की. शुरु करें?

हाँ तो सबसे पहला सवाल, क्यूँ भाई भारत के लोग सर के बल चलते हैं या चाँदी सोना उगाते है जो सारी दुनियाँ उनका सम्मान करे? कुछ लोग कहेंगे, क्या बात करते हो? हमारे देश कि सांस्कृतिक धरोहर देखो, मंदिर देखो, हमारी विविधता में एकता देखो. जानते हो, शून्य की खोज हमारे देश में हुई, तुम जिसे पाइथागोरस थ्योरम के नाम से जानते हो उसे पाइथागोरस के २५० साल पहले बौधायन ने खोजा था. दिल्ली का लौह स्तंभ जानते हो १२०० साल तक खुली हवा, धूप, बारिश झेलते हुए खडा है, आज तक कोई माई का लाल वैसा लोहा तैयार नहीं कर सका है. दुनियाँ भर के वैज्ञानिक थक गये. भास्कर, आर्यभट्ट, पाणिनी, सुश्रुत नाम भी सुने है? दुनियाँ की सबसे पहली प्लास्टिक सर्जरी सुश्रुत ने की थी सदियों पहले. अणु कि खोज महर्षि कणाद ने इन फिरंगो से हजारों साल पहले की थी. वेद, गीता जैसे ग्रन्थ यहाँ लिखे गये. दुनियाँ का सबसे पहला विश्वविद्यालय हमारे यहाँ बना. अरे, जब यह आज के विकसित देश के लोग जानवरों की तरह जंगलों मे घूमते थे और कपडे़ पहनना सीख रहे थे, तब मेरे देश मे लोग सोने के तारों से भी वस्त्र बुना करते थे! शान्ति, शान्ति, शान्ति! मानते हैं आपकी बात. लेकिन यह तो हुई पुरानी बात. अब क्या हो रहा है? आज हम क्या हैं? अब हम फिर से बचे हुए वाचकों को दो हिस्सों में बांटते है. एक जो कहेंगे हाँ भाई सच है, इन लालची नेताओं ने हमें कहीं का नहीं छोडा. इसीलिये तो हम भारत छोड़कर यहाँ आकर बस गये. या फिर, इसी लिये हम कोशिश कर रहे है कि हमारा बेटा अमरीका मे बस जाये और हमें भी एक दिन इस नरक से छुटकारा दिला दे. वैसे हम वहाँ पर जाकर एक ब्लॉग शुरु करेंगे जिसमें अपने देश के बारे में उसकी महानता के बारे मे लिखेंगे. ऐसे लोग इस लेख को आगे पढकर अपना वक्त ज़ाया न करें, अमरीकी दूतावास कि क़तार बहुत लम्बी होती है, अभी जाकर नम्बर लगायेंगे तो शायद वीज़ा मिल जाये. जय रामजी की. हाँ भई, दूसरे हिस्से मे कोई बचा है? हाँ बिल्कुल हैं, धन्यवाद. आप ही देश कि आशा हैं. चलिये अब बात को आगे बढाते है. और आज की बात करते है.

एक वक्त हम भी काफ़ी निराश थे अपने देश से, लेकिन अब सूरत बदलती नजर आ रही है. बात है १९९१ की, जब प्रधान मंत्री पी.वी. नरसिम्हाराव के नेतृत्व में वित्त मंत्री डा. मनमोहन सिंह ने भारत की अर्थव्यवस्था का वैश्वीकरण शुरु किया. अब तो लोगों को विश्वास हो गया कि हम फिर से गुलामी की ओर जा रहे हैं. अब हर भारतीय कंपनी को विदेशी कंपनियाँ खरीद लेंगी. और ऐस कई मामलों में हुआ भी, केल्विनेटेर, लिम्का, गोल्ड स्पोट, जैसे कई उदाहरण दिये जा सकते है. लेकिन आज क्या हो रहा है १५ साल बाद? बात ज्यादा पुरानी नहीं है, ५ सितंम्बर २००६, एक सर्वेक्षण के अनुसार, १ जनवरी २००६ से ३० जून २००६ तक के छ्ह महीनों में, भारतीय कंपनियों ने २५५ विदेशी कंपनियों पर कब्जा कर लिया है या बहुत बड़ा हिस्सा खरीद लिया है. और इनमें से लगभग सारी कंपनियां विकसित देशों की ही है. इस सारी ”शोपिंग” की कीमत है लगभग १७ अरब अमरीकी डालर. पिछले साल इसी दौरान भारतीय कंपनियों ने ६ अरब अमरीकी डालर की खरीदारी की. मतलब १७५ प्रतिशत कि बढ़ोत्तरी एक साल के अन्दर. भारत आज तीसरा सबसे ज्यादा तेजी से विदेशी कंपनियाँ खरीदने वाला देश बन गया है. इसका मतलब ये कि जिस तरह से जब हम भारत में बने हुए शीतल पेय खरीदते है तब उस से होने वाला मुनाफ़ा भारत में नहीं भारत के बाहर बैठे उस कंपनी के मलिक के जेब में जाता है. वैसे ही अब भारतीय कंपनियाँ विदेशों से पैसा कमाकर हमारे देश को समृद्ध बनाने में मदद करेंगी. भारत की कई बड़ी समस्यायें भारत के लिये फायदेमंद साबित हो रही है. पहली समस्या – जनसंख्या. आज भारतीय नागरिक की औसत उम्र बहुत से देशों से कम है. मतलब, आने वाले २०-२५ सालों भारत में तुलनात्मक रुप से सबसे ज़्यादा जवान हाथ होंगे जब बाकी देशों में बूढ़ों की संख्या जवानों से ज्यादा होगी. दूसरी समस्या, भारत में व्यापार करना आग में चलने के बराबर है, जिसकी वजह से भारतीय व्यापारी, विदेशी व्यापरियों से ज्यादा आसानी से चुनौतियों का सामना कर पाते है. उदाहरणार्थ, फ़्रांस में आज व्यापार प्रबंधन के क्षेत्र में, किसी अभ्यर्थी के पास भारत में काम करने का अनुभव होना विशेष योग्यता माना जाता है. कई बड़ी-बड़ी विदेशी कंपनियों का प्रबंधन भारतीयों के हाथ है. भारत की अर्थव्यवस्था आज ८% की गति से बढ़ रही है. टाटा, रिलायंस, वीडियोकोन ही नहीं छोटी छोटी कंपनियाँ भी अब बहुराष्ट्रीय बन रही हैं. सिर्फ़ निजी कंपनियाँ ही नहीं, ओ.एन.जी.सी. जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम भी दुनियाँ भर में अपने हाथ-पाँव फैला रहे हैं. सूचना प्रौद्यौगिकी और दवा के क्षेत्र में भारत विश्वस्तर पर प्रसिद्ध है ही.

क्रमश:

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इन्दौर के बढ़ते कदम

अक्टूबर 11, 2006

इन्दौर – विकास की राह पर तेज़ी से अपने कदम बढ़ाता एक शहर. यह शहर मुझे हमेशा से ही अपने घर की तरह प्रिय रहा है. यह बात अलग है कि यहाँ न तो मेरा घर है और न ही कोई रिश्तेदार! जो भी हो, मुझे इस शहर से बेहद लगाव है. चाहे कोई अमीर हो या ग़रीब, इस शहर ने हर एक को अपनाया है.

क्या नहीं है यहाँ? मराठों का इतिहास, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय और उससे जुड़े कई शिक्षण संस्थान. और हाँ, मैं शब-ए-मालवा को कैसे भूल सकता हूँ, गर्मियों की वो सुहानी शामें और वो ठण्डी हवायें, आह! “जैसे सहराओं में हौले से चले बाद-ए-नसीम!”

भारत के कोने-कोने से आकर यहाँ कितनी ही पीढ़ियों से लोग बसे हैं. मराठी, सिंधी, दक्षिण भारतीय, पंजाबी, मारवाड़ी, राजस्थानी और मालवा के मूल निवासी तो हैं हीं. खान-पान भी सभी प्रकार का, सभी प्रकार के भारतीय व्यंजन. इतनी विविधता है, इसीलिये तो इसको अक्सर मिनी-मुंबई कह दिया जाता है.

इन्दौर से एक घण्टे की दूरी पर हैं सतपुड़ा की पहाड़ियाँ, नर्मदा की घाटी तथा ओंकारेश्वर और महाकाल के मन्दिर. ओंकारेश्वर का धार्मिक महत्व तो है ही, साथ ही यहां की प्राकृतिक भी छटा देखते ही बनती है. यहाँ नर्मदा नदी ॐ की आकृति बनाती है.

इन्दौर को मध्य भारत की वाणिज्यिक राजधानी भी कहा जाता है और यहाँ सबकी पसंद और जेब के हिसाब से बहुत से बाज़ार हैं. ग्लोबस और रेडियो मिर्ची सबसे पहले यहीं आरम्भ हुये थे, और अब सेज़ और कई अन्य सूचना प्रौद्योगिकी पार्क भी शहर का मुख्य हिस्सा हो गये हैं.

अब मैं घूम-फिरकर उस बात पर आता हूँ जिसने मुझे इस लेख को लिखने को प्रेरित किया, और वह है इन्दौर का सड़क परिवहन तंत्र. इन्दौर का आधुनिक सड़क परिवहन तंत्र किसी भी विकसित देश को टक्कर देता है. अन्य सुविधाओं के अलावा इन्दौर के पास अभी ५० टाटा स्टार बसें हैं, जिनमें उपग्रहों से संचालित जी.पी.एस. के अलावा कम्प्यूटरीकृत टिकट मशीनें भी हैं! बस स्थानकों पर भी इलेक्ट्रानिक सूचना पट लगे हैं जिन पर यह देखा जा सकता है कि कौन सी बस कहां है, और कितनी देर में अमुक स्थानक तक पहुंचेगी. और इतनी सारी सुविधायें पुरानी नगर बस सेवा के किराये पर ही! इसके बावजूद भी इन्दौर नगर निगम ३-४ महीनों में ही इस सेवा से १ करोड़ रुपये का लाभ उठा चुका है. ये बसें समय पर आती हैं और विभिन्न मार्गों के हिसाब से अलग-अलग रंगों की हैं. बसों के कर्मचारियों को जनता के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये, इस बारे में भी एक प्रबंधन संस्था कर्मचारियों को प्रशिक्षण दे रही है. बसों के रख-रखाव पर तो विशेष ध्यान दिया ही जा रहा है.

इन्दौर के जिला कलक्टर श्री विवेक अग्रवाल के प्रयासों से ही यह सब संभव हो सका है. अभी फोन करके टैक्सी बुलाने की सार्वजनिक सेवा भी जल्दी ही शुरु होगी, और सड़कों पर पुराने टैम्पुओं का बोझ कुछ हल्का होगा.

दिल्ली को इन्दौर से इस बारे में कुछ सीखना चाहिये. दिल्ली चार साल में इस प्रकार की केवल ६ बसें ही सड़कों पर उतार पाया है. अभी अहमदाबाद ने भी इन्दौर के नक़्शे-क़दम पर चलने का निर्णय लिया है. बाकी बड़े शहरों को भी श्री अग्रवाल के इन्दौर से कुछ सबक लेना होगा. भारत ऐसे ही धीरे-धीरे विकास के मार्ग पर बढ़ता रहे, शुभकामनायें!

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आकाश छू लो वायु सैनिकों !

अक्टूबर 8, 2006

आज भारतीय वायु सेना का पिचहत्तरवां जन्मदिवस है. हमारी वायु सेना विश्व की चार सबसे बड़ी वायु सेनाओं में से एक है. समय चाहे युद्ध का हो या शान्ति का, हमारी सेनायें सदैव अपना शौर्य और पराक्रम प्रदर्शित करती रही हैं. आज हमारे पास विश्व के सर्वश्रष्ठ लड़ाकू यान हैं – जागुआर, सुखोई और मिग के कई स्वरूप, और कुछ समय बाद हमारा अपना तेजस भी वायु सेना की शोभा बढ़ायेगा.

इस बार वायु सेना दिवस के आयोजन का प्रमुख स्थल था हिन्डन, ग़ाज़ियाबाद स्थित वायु सेना का अड्डा. इस समारोह ऐसा में बहुत कुछ था जो पहली बार हुआ. यह विश्व में पहला मौका था जब किसी देश की वायु सेना के प्रमुख सीधे वायु मार्ग से ही किसी समारोह में उतरे हों. जी हाँ, ६१ वर्षीय एयर चीफ़ मार्शल शशीन्द्र पाल त्यागी कोई कार या जीप नहीं, बल्कि एक पैराशूट लेकर समारोह में उपस्थित हुए!

परेड तो होनी ही थी, उसके बाद अपनी ही तरह की पहली (संगीतमय) ड्रिल परेड भी हुई. इसमें वायु सेना के जवानों का अद्भुत सामंजस्य देखते ही बनता था. सुखोई और मिग विमानों की कलाबाज़ियाँ दिखाकर हमारे विश्वस्तरीय चालकों ने सबका मन मोह लिया. इस समारोह में पहली बार सारंग दल के चार हेलीकाप्टरों ने एक साथ हवा में करतब दिखाये. ध्यान देने योग्य बात यह है कि हेलीकाप्टरों से इस प्रकार के करतब दिखाना बहुत कठिन कार्य होता है और इसके लिये कड़ी मेहनत और योग्यता की आवश्यकता होती है. विश्व में सारंग के अलावा केवल दो ही ऐसे दल हैं जो इस प्रकार का प्रदर्शन करने में सक्षम हैं! कार्यक्रम में इसके अलावा युद्ध में घायल सैनिकों को तत्परता के साथ सुरक्षित स्थान तक ले जाने की कार्यवाही का भी प्रदर्शन किया गया.

अंत में सूर्य-किरण दल ने भी आकाश में गोते लगाते हुए अलग अलग आकारों में तिरंगे को उकेरा.

इन सब से हमें न केवल गर्व की अनुभूति होती है, बल्कि देशवासियों में सुरक्षा की भावना भी आती है. हम कामना करते है कि हमारी वायु सेना सारी सीमायें लांघकर आकाश को छू ले, जैसा कि वायु सेना का आदर्श वाक्य है, और भगवद् गीता के ग्यारहवें अध्याय के चौबीसवें श्लोक की आरम्भिक पंक्तियाँ भी – नभ: स्पर्शं दीप्तम्.

अगर आप दूरदर्शन पर इस कार्यक्रम को न देख पाये हों तो यहाँ अवश्य देखिये, पूरे दो घण्टे तक मंत्रमुग्ध कर देने वाला एक जादू!

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बूझे लाल बुझक्कड़ – ७

अक्टूबर 7, 2006

लगता है पुछक्कड़ चाचा को अब कठिन सवाल पूछने होंगे. विनय भाई ने शुरुआत की तो फिर आशीष भाई हों, बेंगाणी बन्धु हों या शुएब भाई, सबने उनका समर्थन कर दिया. पुछक्कड़ चाचा को लग रहा होगा कि किसी को तो सिर खुजाना पड़ेगा, पर नहीं. सो आप सबको बधाई. मैं अभी जाकर पुछक्कड़ की भी खबर लेता हूँ.

जैसा कि आप लोगों ने बताया – सौराष्ट्र, हैदराबाद, मैसूर, पटियाला, ट्रावनकोर, इन्दौर, बीकानेर और जयपुर, ये सब भारत के वे इलाके हैं जिनके नाम पर भारतीय स्टेट बैंक से संबद्ध बैंकें हैं, जैसे स्टेट बैंक ऑफ़ सौराष्ट्र, स्टेट बैंक ऑफ़ इन्दौर इत्यादि. आजादी से पहले ये सब इलाके रियासत हुआ करते थे, और यहाँ अपनी-अपनी बैंकें थी. इन छोटी-छोटी बैंकों की पहुँच रियासतों की क्षेत्रीय जनता में बहुत थी. प्रथम पंचवर्षीय योजना में ग्रामीण विकास को ध्यान में रखते हुए इन सभी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर इन्हें स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया से संबद्ध किया गया. हालांकि इन सब बैंकों का प्रतीक-चिह्न स्टेट बैंक जैसा ही है, पर इनकी अपनी-अपनी अलग पहचान भी है.

स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया के इतिहास में झाँके तो इसकी शुरुआत हुई थी ठीक २०० साल पहले यानि सन् १८०६ में बैंक ऑफ़ कलकत्ता के रूप में. बाद में बैंक ऑफ़ मद्रास और बैंक ऑफ़ बौम्बे भी बनीं और बहुत बाद में जाकर इन तीनों को मिलाकर एक बड़ी बैंक बनायी गयी जिसको नाम दिया गया – इम्पीरियल बैंक ऑफ़ इण्डिया. इम्पीरियल बैंक को आज़ादी से पहले मुद्रा छापने का अधिकार होता था. आज़ादी के बाद भी सन् १९५५ तक यह अधिकार इम्पीरियल बैंक के पास सुरक्षित रहा. उसके बाद भारतीय रिज़र्व बैंक को यह अधिकार दिया गया और इम्पीरियल बैंक बन गयी स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया या भारतीय स्टेट बैंक.

शाखाओं की संख्या की दृष्टि से देखें या कर्मचारियों संख्या की दृष्टि से, आज भारतीय स्टेट बैंक दुनियाँ की सबसे बड़ी बैंक है, जिसका पिछले वर्ष कुल राजस्व था ६०० अरब रुपये से भी अधिक! अब पैसे इतने खनक ही रहे हैं तो याद दिला दिया जाय कि सिक्कों के प्रचलन में भी भारत सदियों से अग्रणी रहा है. हमारे यहाँ ६५० ई.पू. में ही सोने और चाँदी के सिक्के बनना शुरु हो गये थे! खैर, यह चर्चा फिर कभी.