Archive for सितम्बर 19th, 2006

h1

बूझे लाल बुझक्कड़ – ६

सितम्बर 19, 2006

भई वाह! इस बार तो आप लोगों ने १००% सही जवाब दिया. बुझक्कड़ चाचा खुश हुए. इनाम में आप सबको मिलती है- उनकी शाबाशी! जी हाँ, यह भारतीय युद्ध कला कलरिप्पयट् ही है जो अपनी तरह की विश्व की सबसे पुरानी विद्या है.

इस विद्या का अभ्यास केरल तथा उससे लगे तमिलनाडु और कर्नाटक में प्रचलित है. इसके अंतर्गत पटकना, पद-प्रहार, कुश्ती तथा हथियार बनाने के प्रशिक्षण के साथ उपचार की विधियाँ भी सिखाई जाती हैं. कलरिप्पयट् शब्द कलरि अर्थात विद्यालय तथा पयट्ट (जो पयट्टुका से बना है) अर्थात ‘युद्ध करना’ से मिल कर बना है. तमिल में इन दोनों शब्दों को मिलाने से जो अर्थ निकलता है वह है-‘सामरिक कलाओं का अभ्यास’.

कलरिप्पयट् का उद्भव बारहवीं शताब्दी ई.पू. का माना जाता है परंतु यह कला उससे पूर्व या बाद की भी हो सकती है. इसका जन्म केरल या आसपास के क्षेत्रों में हुआ था. इतिहासकार श्री एलमकुलम कुंजन पिल्लई के अनुसार इस कला का विकास ग्यारहवीं शताब्दी ई.पू. में चेर और चोल राजाओं के शासनकाल में युद्ध के अधिक महत्व के कारण हुआ होगा. कुछ शताब्दियों से इसके दक्षिण भारतीय स्वरूप (जो खुले हाथों से युद्ध पर अधिक बल देता है) का अभ्यास मुख्यतः तमिलभाषी क्षेत्रों में होता है.

कहते हैं कि चीनी और जापानी सामरिक कलाओं का जन्म भारतीय सामरिक कलाओं से ही हुआ जो बोधिसत्वों के द्वारा प्रचलित की गयीं. यह भी माना जाता है कि ये भारतीय कलायें कलरिप्पयट् ही थीं, किंतु यह एक विवादित विषय है. कुछ लोग इसके पक्ष में है तो कुछ विरोध में. १९वीं सदी में ब्रितानी साम्राज्य की स्थापना के बाद यह कला धीरे धीरे गुम होने लगी. किंतु सन १९२० में पूरे दक्षिण भारत में पारंपरिक कलाओं को जीवंत करने की एक लहर उठी जिसके चलते तेल्लीचेरी में कलरिप्पयट् को पुनर्जीवन मिला. उसके बाद सन् १९७० तक विश्व स्तर पर सामरिक कलाओं के प्रति रुझान देखा गया और यही रुझान इस कला के विकास का कारण रहा. आधुनिक समय में कुछ अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्मों के ज़रिये इसका प्रसार करने का प्रयास किया जाता रहा है. साथ ही कुछ नृत्य प्रशिक्षण केन्द्र व्यायाम के तौर पर इसका अभ्यास करते हैं

कलरिप्पयट् के तीन स्वरूप हैं- दक्षिण भारतीय, उत्तर भारतीय और मध्य भारतीय. लगभग सात वर्ष की छोटी उम्र से ही इच्छुक विद्यार्थी को गुरुकुल में प्रशिक्षित करना शुरू कर देते हैं. यथावत विधि-विधान के साथ शिष्य गुरु से दीक्षा लेता है. इस प्रशिक्षण के चार मुख्य अंग हैं- मीतरी, कोलतरी, अनकतरी, और वेरमकई. इनके साथ मर्म तथा मालिश का ज्ञान भी दिया जाता है. मर्म के ज्ञाता अपने शत्रुओं के मर्म के स्पर्श मात्र से उनके प्राण ले सकते हैं अत: यह कला धैर्यवान तथा समझदार लोगों को ही सिखाई जाती है.

कलरिप्पयट् का प्रभाव केरल की सांस्कृतिक कलाओं पर भी साफ़ दिखता है जिनमें कथकली मुख्य है. कई कलाओं तथा नृत्यों जैसे कथकली, कोलकली एवं वेलकली आदि ने अपने विकास के दौरान कलरिप्पयट्ट से ही प्रेरणा ली है. कितना अद्भुत है ना… कहाँ युद्ध विद्या और कहाँ नृत्य कला. किंतु ऐसी विविधता में एकता ही तो है हमारे भारत की पहचान!

सम्बन्धित कड़ियाँ: विकिपीडिया पर कलरिप्पयट् का पॄष्, कलरिप्पयट् सीखनी है? – अवश्य, यह लीजिये!

Advertisements