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चमत्कार कचरे का : ऊर्जा (भाग ३)

सितम्बर 14, 2006

बात है कुछ साल-डेढ़ साल पहले की. हम और हमारी पत्नीजी कोलकाता से मुम्बई आ रहे थे. गीतांजलि एक्सप्रेस का वातानुकूलित डिब्बा, और हमारी सामने वाली सीट पर एक सज्जन और उनकी पत्नीजी आकर विराजमान हुए. महोदय लगभग ४५ से ५० साल की उम्र के होंगे, महोदया विदेशी थीं. थोडी ही देर मे ज्ञात हुआ के महोदय मध्य-पूर्व के किसी देश में अभियन्ता के रूप में कार्यरत हैं, खुशी की बात है! थोड़ी देर मे चायवाला आया. महोदय ने चाय की एक प्याली खरीदी और अपनी पत्नी को देने लगे ज्ञान, “देखो कितनी सहूलियत है, चाय पियो और खाली प्याली फेंक दो. प्लास्टिक जैसी सस्ती चीज़ छोड़कर हमारे रेलवे मंत्री कहते हैं कि मिट्टी के कुल्हड़ इस्तेमाल करो.” अब कुल्हड़ कितने काम की चीज़ है यह विवाद फिर कभी. लेकिन सोचिये यह कि “यूज़ एण्ड थ्रो” वाली आदत हमें किस कदर संकट में डाल सकती है!

सन २००३-०४ में भारत में लगभग ४२ लाख टन प्लास्टिक का इस्तेमाल हुआ. सन २०१० तक यही आंकडा १२५ लाख टन हो जायेगा और भारत दुनियाँ का तीसरा सबसे ज्यादा प्लास्टिक इस्तेमाल करने वाला देश बन जायेगा. और हम लोग इस प्लास्टिक को इस्तेमाल करके, जैसा कि उन सज्जन ने भी कहा, फेंक देंगे. फिर चाहें वह जाकर नदी नालों में अवरोध पैदा करे, गाय भैंसों के पेट में जाकर उन्हें मारता रहे. अब कई राज्य सरकारों ने प्लास्टिक की थैलियों पर पाबंदी लगादी है लेकिन फिर भी प्लास्टिक अलग-अलग रूप में इस्तेमाल तो होगा ही और हमारे भविष्य के लिये खतरा बनेगा. किसी भी प्लास्टिक को प्राकृतिक रूप से विघटित होने के लिये लगभग १० लाख साल तक लग सकते है. यह समस्या सिर्फ़ हमारे देश की ही नहीं है, सारी दुनियाँ इससे परेशान है.

अच्छी खबर ये है कि इस समस्या का समाधान हमारे देश की एक महिला वैज्ञानिक ने ढूंढ निकाला है. नागपुर, महाराष्ट्र के एक इंजीनियरिंग महाविद्यालय की प्राध्यापिका श्रीमती अलका झाडगांवकर ने एक ऐसी प्रणाली की खोज की है जिससे प्लास्टिक को ईंधन मे परिवर्तित किया जा सकता है. वैसे तो प्लास्टिक का निर्माण पेट्रोलियम मतलब खनिज तेल से ही होता है लेकिन उसे फिर से खनिज तेल में परिवर्तित करना बडा़ ही मुश्किल और महंगा काम होता है. लेकिन यह नयी प्रक्रिया दुनियाँ की सबसे पहली प्रक्रिया है जिसमें किसी भी प्रकार की प्लास्टिक बिना किसी साफ़ सफ़ाई के सुरक्षित ढंग से इस्तेमाल की जा सकती है और वह भी व्यावसायिक रुप से! प्रो. झाडगांवकर के अनुसार, औसतन ९.५० रु. की लागत से १ किलोग्राम प्लास्टिक से ०.६ लिटर पेट्रोल, ०.३ लिटर डीज़ल व ०.१ लिटर दूसरे प्रकार के तेल का निर्माण किया जा सकता है जिसकी कीमत लगभग ३१.६५ रु. है.

इन सब चीज़ों से भी महत्वपूर्ण बात ये कि प्रो. झाडगांवकर की यह खोज सिर्फ़ एक तज़ुर्बा बन कर ही नहीं रही, उसके व्यावसयिक रुप से इस्तेमाल का बीड़ा भी उन्हीं ने उठाया है. और इस काम मे उनका साथ दे रहे हैं उनके पति, श्री उमेश झाडगांवकर. भारतीय स्टेट बैंक से ५ करोड़ रुपये कर्ज लेकर २००५ में उन्होंने पहला संयंत्र शुरु किया जो एक दिन मे लगभग ५००० किलोग्राम प्लास्टिक को ईंधन में बदल देता है. इस ईंधन को पास ही के कारखाने खरीदते है. अब इससे भी बडा, २५००० किलोग्राम (२५ टन) प्रति दिन क्षमता वाला संयंत्र बनाया जा रहा है, जिससे बनने वाले ईंधन की पूरी बुकिंग अभी से हो चुकी है! नागपुर शहर प्रतिदिन ३५ टन प्लास्टिक कचरा इकट्ठा करता है. इसका मतलब जल्दी ही झाडगांवकर परिवार को किसी और शहर मे अपने संयंत्र लगाने होंगे.

आशा है कि उनके इन प्रयासों को सफ़लता मिलेगी और सारी दुनियाँ को इस भयावह समस्या से छुटकारा मिलेगा. हमें भी इस प्रक्रिया में उनका हाथ बंटाना है. कैसे? अगर हम सब ध्यान रखें कि प्लास्टिक के सामान को सही तरीके से जमा करके अलग से रखा जाय जिससे कि वह अन्य कचरे में ना मिले और उसका निस्तारण व इस्तेमाल ठीक ढंग से हो.

क्रमशः…..

सम्बंधित कड़ियाँ: प्रो. झाडगांवकर का इस प्रक्रिया के सम्बन्ध में शोधपत्र, गुडन्यूज़ इण्डिया पर एक आलेख, केन्द्रीय प्लास्टिक अभियांत्रिकी तथा तकनीकि संस्थान

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