Archive for सितम्बर, 2006

h1

रोशनी के घेरे

सितम्बर 21, 2006

कभी बचपन में स्कूल में श्रीमती सरोजिनी नायडू की एक कविता पढ़ी थी- ‘द बैंगिल सैलर्ज़‘. यह गीतात्मक कविता पढ़ हृदय में कितने ही भाव हिलोरें लेने लगते हैं. चूड़ियाँ मानों भारतीय नारी की चिरसखी हैं, यह बात ये कविता सहज ढंग से कह जाती है. चूड़ियों के इन्द्रधनुषी रंगो से सजा कल्पनालोक, उनकी मधुर खनक, चूड़ी वाले की टेर पर चूड़ी खरीदने घर से बाहर की ओर दौड़ती स्त्रियां, छोटी बच्चियों जैसे उत्साह के साथ रंग पसंद करती और तरह-तरह की चूड़ियों की तुलना करती स्त्रियां – ये सारे चित्र इस कविता के साथ मानो सजीव हो जाते हैं और कानों में गूँज उठते हैं मोलभाव में लगे उत्साहित मधुर स्वर. भारत के शहरों, गाँवों और आस-पड़ोस में यह दृश्य आम है. एक दृश्य, जिसकी कल्पना मात्र से ही मन भाव-विभोर हो उठता है. कितना अद्भुत है न, चूड़ी जैसी साधारण वस्तु कैसी प्रसन्नता का कारण बनती है!

मेरी माँ की चूडि़यों की खनक मात्र एक ध्वनि नहीं थी अपितु मेरी माँ का संपूर्ण अस्तित्व था. मुझे याद आते हैं वे दिन जब मैं उन चूड़ियों की खनक से उठा करती थी. चूड़ियाँ, जो माँ के काम करते, हमारे लिये नाश्ता बनाते, हमें स्कूल के लिये तैयार करते बस यूँ ही बोल उठती थीं. जब कभी माँ कहीं बाहर जातीं तो उनके घर मे आने से पूर्व ही उन चूड़ियों की ध्वनि मुझे उनकी आहट दे जाती. जब कभी माँ मेरी नज़रों से ओझल हो किसी पड़ोसी से बात कर रही होतीं तब मैं इस आवाज़ से उनकी उपस्थिति को महसूस कर लेती. ये माँ की चूडि़याँ ही थीं जिनकी खामोशी ने मुझसे अक्सर वह सब कहा जो माँ कभी किसी से न कह सकीं. काँच के ये घेरे हर उस दौर के प्रतीक हैं जिनसे मेरी माँ कभी गुज़रीं.

चूड़ियाँ हर लड़की को आह्लादित करती हैं. मुझे याद है बचपन में एक बार जब मैनें चमकीली गुलाबी चूड़ियाँ पहनी थी. मैं उन्हें स्कूल भी पहन के गयी थी, दोस्तों को दिखाने के लिये. काँच की चूडियाँ भारत के कई भागों में विवाहित स्त्रियों द्वारा विवाह के पवित्र बंधन के प्रतीक के रूप में पहनी जाती हैं. हाँ, क्षेत्रों के अनुसार रंगों में विविधता पायी जाती है. प्रत्येक क्षेत्र की अलग परम्परा है और चूड़ियों का रंग व प्रकार उसी पर निर्भर करता है. उदाहरण के लिये महाराष्ट्र में विवाहित स्त्रियाँ हरे रंग की चूड़ियाँ पहनती हैं तो बंगाल व उड़ीसा में सीप की बनी सफ़ेद चूड़ियों को चटख़ लाल चूड़ियों के साथ मिलाकर पहना जाता है.

भारत में काँच का सर्वाधिक सामान आगरा के निकट फ़िरोज़ाबाद नामक छोटे से शहर में बनाया जाता है. इस शहर के अधिकांश लोग काँच के किसी न किसी सामान के निर्माण से जुड़े उद्यम में लगे हैं. सबसे अधिक काँच की चूड़ियों का निर्माण इसी शहर में होता है. रंगीन काँच को गलाने के बाद उसे खींच कर तार के समान बनाया जाता है और एक बेलनाकार ढाँचे पर कुंडली के आकार में लपेटा जाता है. स्प्रिंग के समान दिखने वाली इस संरचना को काट कर खुले सिरों वाली चूड़ियाँ तैयार कर ली जातीं हैं. अब इन खुले सिरों वाली चूड़ियों के विधिपूर्वक न सिर्फ़ ये सिरे जोड़े जाते हैं बल्कि चूड़ियाँ एकरूप भी की जाती हैं ताकि जुड़े सिरों पर काँच का कोई टुकड़ा निकला न रह जाये. यह एक धीमी प्रक्रिया है जिसमें काँच को गर्म व ठण्डा करना पड़ता है. कितनी विस्मयकारी बात है न कि किसी नारी की कलाइयों की शोभा बनने से पहले ये चूड़ियाँ कितने हाथों से गुज़रती हैं!

आन्ध्रप्रदेश का हैदराबाद शहर भी अपनी चूड़ियों के लिये विख्यात है. चारमीनार के चारों ओर कतारों में लगी अनेक दुकानें चूड़ियों की चकाचौंध से जगमगाती रहती हैं. यहाँ काँच की चूड़ियों के विविध प्रकार मिलते तो मिलते ही हैं, साथ ही मिलती हैं रत्न-जड़ित चूड़ियाँ, धातु से बनी चूड़ियाँ, सर्पाकार चूड़ियाँ, शीशा-जड़ित चूड़ियाँ, सादी चूड़ियाँ, विभूषित चूड़ियाँ, पतली नाज़ुक चूड़ियाँ और चौकोर तथा तिकोने जैसे अनोखे आकार की चूड़ियाँ. दूर-दराज़ और आस-पास दोनों ही जगहों से इन चूड़ियों की ख़रीदारी के लिये लोगों की भारी भीड़ जुटती है.

भारतीय नारियों के द्वारा चूड़ियों का पहना जाना एक लम्बे अरसे से चला आ रहा है. मोहनजोदड़ो से मिले अवशेष इस प्राचीन परम्परा की पुष्टि करते हैं. विशेष ध्यान देने योग्य है कि हालांकि अन्य सभ्यताओं में भी चूड़ियाँ पहनी जाती रही हैं किन्तु भारत में मुख्यत: विवाह के अवसर से जुड़ी यह एक महत्वपूर्ण परम्‍परा बन गई है. आज भी चूड़ियों को उसी उल्लास और ललक के साथ पहना जाता है जैसा कि पहले. यह अलग बात है कि शहरों, विशेषत: महानगरों में इस परम्परा के ह्रास के चिह्न देखे जा सकते हैं. नारियों की कलाइयों की शोभा बढ़ाते ये चमकीले घेरे एक आभूषण मात्र नहीं हैं. इनकी छोटी सी परिधि में भारतीय स्त्री के सुख-दु:ख तथा धैर्य सिमटे हैं, उसकी आशायें बंधी हैं.

सम्बन्धित कड़ी: सर्फ़-इण्डिया पर विभिन्न प्रकार की चूड़ियों की जानकारी

Advertisements
h1

बूझे लाल बुझक्कड़ – ६

सितम्बर 19, 2006

भई वाह! इस बार तो आप लोगों ने १००% सही जवाब दिया. बुझक्कड़ चाचा खुश हुए. इनाम में आप सबको मिलती है- उनकी शाबाशी! जी हाँ, यह भारतीय युद्ध कला कलरिप्पयट् ही है जो अपनी तरह की विश्व की सबसे पुरानी विद्या है.

इस विद्या का अभ्यास केरल तथा उससे लगे तमिलनाडु और कर्नाटक में प्रचलित है. इसके अंतर्गत पटकना, पद-प्रहार, कुश्ती तथा हथियार बनाने के प्रशिक्षण के साथ उपचार की विधियाँ भी सिखाई जाती हैं. कलरिप्पयट् शब्द कलरि अर्थात विद्यालय तथा पयट्ट (जो पयट्टुका से बना है) अर्थात ‘युद्ध करना’ से मिल कर बना है. तमिल में इन दोनों शब्दों को मिलाने से जो अर्थ निकलता है वह है-‘सामरिक कलाओं का अभ्यास’.

कलरिप्पयट् का उद्भव बारहवीं शताब्दी ई.पू. का माना जाता है परंतु यह कला उससे पूर्व या बाद की भी हो सकती है. इसका जन्म केरल या आसपास के क्षेत्रों में हुआ था. इतिहासकार श्री एलमकुलम कुंजन पिल्लई के अनुसार इस कला का विकास ग्यारहवीं शताब्दी ई.पू. में चेर और चोल राजाओं के शासनकाल में युद्ध के अधिक महत्व के कारण हुआ होगा. कुछ शताब्दियों से इसके दक्षिण भारतीय स्वरूप (जो खुले हाथों से युद्ध पर अधिक बल देता है) का अभ्यास मुख्यतः तमिलभाषी क्षेत्रों में होता है.

कहते हैं कि चीनी और जापानी सामरिक कलाओं का जन्म भारतीय सामरिक कलाओं से ही हुआ जो बोधिसत्वों के द्वारा प्रचलित की गयीं. यह भी माना जाता है कि ये भारतीय कलायें कलरिप्पयट् ही थीं, किंतु यह एक विवादित विषय है. कुछ लोग इसके पक्ष में है तो कुछ विरोध में. १९वीं सदी में ब्रितानी साम्राज्य की स्थापना के बाद यह कला धीरे धीरे गुम होने लगी. किंतु सन १९२० में पूरे दक्षिण भारत में पारंपरिक कलाओं को जीवंत करने की एक लहर उठी जिसके चलते तेल्लीचेरी में कलरिप्पयट् को पुनर्जीवन मिला. उसके बाद सन् १९७० तक विश्व स्तर पर सामरिक कलाओं के प्रति रुझान देखा गया और यही रुझान इस कला के विकास का कारण रहा. आधुनिक समय में कुछ अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्मों के ज़रिये इसका प्रसार करने का प्रयास किया जाता रहा है. साथ ही कुछ नृत्य प्रशिक्षण केन्द्र व्यायाम के तौर पर इसका अभ्यास करते हैं

कलरिप्पयट् के तीन स्वरूप हैं- दक्षिण भारतीय, उत्तर भारतीय और मध्य भारतीय. लगभग सात वर्ष की छोटी उम्र से ही इच्छुक विद्यार्थी को गुरुकुल में प्रशिक्षित करना शुरू कर देते हैं. यथावत विधि-विधान के साथ शिष्य गुरु से दीक्षा लेता है. इस प्रशिक्षण के चार मुख्य अंग हैं- मीतरी, कोलतरी, अनकतरी, और वेरमकई. इनके साथ मर्म तथा मालिश का ज्ञान भी दिया जाता है. मर्म के ज्ञाता अपने शत्रुओं के मर्म के स्पर्श मात्र से उनके प्राण ले सकते हैं अत: यह कला धैर्यवान तथा समझदार लोगों को ही सिखाई जाती है.

कलरिप्पयट् का प्रभाव केरल की सांस्कृतिक कलाओं पर भी साफ़ दिखता है जिनमें कथकली मुख्य है. कई कलाओं तथा नृत्यों जैसे कथकली, कोलकली एवं वेलकली आदि ने अपने विकास के दौरान कलरिप्पयट्ट से ही प्रेरणा ली है. कितना अद्भुत है ना… कहाँ युद्ध विद्या और कहाँ नृत्य कला. किंतु ऐसी विविधता में एकता ही तो है हमारे भारत की पहचान!

सम्बन्धित कड़ियाँ: विकिपीडिया पर कलरिप्पयट् का पॄष्, कलरिप्पयट् सीखनी है? – अवश्य, यह लीजिये!

h1

पूछे लाल पुछक्कड़ – ६

सितम्बर 17, 2006

तो हाज़िर हैं पुछक्कड़ चाचा अपने एक नये सवाल के साथ. आज आपको बूझना है कि नीचे दी गयी तस्वीर में क्या चल रहा है.

दो लोग तलवार लेकर युद्ध कर रहे है, यह तो सबको दिख ही रहा है. कुछ और हो तो जरूर बताइये. आखिर ऐसा क्या है इस तस्वीर में जो पुछक्कड़ चाचा आपको दिखा रहे हैं? तलवार लेकर कोई इतनी ऊँची छलांग लगा जाये तो उसको तो हम कलाकारी ही कहेंगे, पर आपका क्या कहना है?

h1

चमत्कार कचरे का : ऊर्जा (भाग ३)

सितम्बर 14, 2006

बात है कुछ साल-डेढ़ साल पहले की. हम और हमारी पत्नीजी कोलकाता से मुम्बई आ रहे थे. गीतांजलि एक्सप्रेस का वातानुकूलित डिब्बा, और हमारी सामने वाली सीट पर एक सज्जन और उनकी पत्नीजी आकर विराजमान हुए. महोदय लगभग ४५ से ५० साल की उम्र के होंगे, महोदया विदेशी थीं. थोडी ही देर मे ज्ञात हुआ के महोदय मध्य-पूर्व के किसी देश में अभियन्ता के रूप में कार्यरत हैं, खुशी की बात है! थोड़ी देर मे चायवाला आया. महोदय ने चाय की एक प्याली खरीदी और अपनी पत्नी को देने लगे ज्ञान, “देखो कितनी सहूलियत है, चाय पियो और खाली प्याली फेंक दो. प्लास्टिक जैसी सस्ती चीज़ छोड़कर हमारे रेलवे मंत्री कहते हैं कि मिट्टी के कुल्हड़ इस्तेमाल करो.” अब कुल्हड़ कितने काम की चीज़ है यह विवाद फिर कभी. लेकिन सोचिये यह कि “यूज़ एण्ड थ्रो” वाली आदत हमें किस कदर संकट में डाल सकती है!

सन २००३-०४ में भारत में लगभग ४२ लाख टन प्लास्टिक का इस्तेमाल हुआ. सन २०१० तक यही आंकडा १२५ लाख टन हो जायेगा और भारत दुनियाँ का तीसरा सबसे ज्यादा प्लास्टिक इस्तेमाल करने वाला देश बन जायेगा. और हम लोग इस प्लास्टिक को इस्तेमाल करके, जैसा कि उन सज्जन ने भी कहा, फेंक देंगे. फिर चाहें वह जाकर नदी नालों में अवरोध पैदा करे, गाय भैंसों के पेट में जाकर उन्हें मारता रहे. अब कई राज्य सरकारों ने प्लास्टिक की थैलियों पर पाबंदी लगादी है लेकिन फिर भी प्लास्टिक अलग-अलग रूप में इस्तेमाल तो होगा ही और हमारे भविष्य के लिये खतरा बनेगा. किसी भी प्लास्टिक को प्राकृतिक रूप से विघटित होने के लिये लगभग १० लाख साल तक लग सकते है. यह समस्या सिर्फ़ हमारे देश की ही नहीं है, सारी दुनियाँ इससे परेशान है.

अच्छी खबर ये है कि इस समस्या का समाधान हमारे देश की एक महिला वैज्ञानिक ने ढूंढ निकाला है. नागपुर, महाराष्ट्र के एक इंजीनियरिंग महाविद्यालय की प्राध्यापिका श्रीमती अलका झाडगांवकर ने एक ऐसी प्रणाली की खोज की है जिससे प्लास्टिक को ईंधन मे परिवर्तित किया जा सकता है. वैसे तो प्लास्टिक का निर्माण पेट्रोलियम मतलब खनिज तेल से ही होता है लेकिन उसे फिर से खनिज तेल में परिवर्तित करना बडा़ ही मुश्किल और महंगा काम होता है. लेकिन यह नयी प्रक्रिया दुनियाँ की सबसे पहली प्रक्रिया है जिसमें किसी भी प्रकार की प्लास्टिक बिना किसी साफ़ सफ़ाई के सुरक्षित ढंग से इस्तेमाल की जा सकती है और वह भी व्यावसायिक रुप से! प्रो. झाडगांवकर के अनुसार, औसतन ९.५० रु. की लागत से १ किलोग्राम प्लास्टिक से ०.६ लिटर पेट्रोल, ०.३ लिटर डीज़ल व ०.१ लिटर दूसरे प्रकार के तेल का निर्माण किया जा सकता है जिसकी कीमत लगभग ३१.६५ रु. है.

इन सब चीज़ों से भी महत्वपूर्ण बात ये कि प्रो. झाडगांवकर की यह खोज सिर्फ़ एक तज़ुर्बा बन कर ही नहीं रही, उसके व्यावसयिक रुप से इस्तेमाल का बीड़ा भी उन्हीं ने उठाया है. और इस काम मे उनका साथ दे रहे हैं उनके पति, श्री उमेश झाडगांवकर. भारतीय स्टेट बैंक से ५ करोड़ रुपये कर्ज लेकर २००५ में उन्होंने पहला संयंत्र शुरु किया जो एक दिन मे लगभग ५००० किलोग्राम प्लास्टिक को ईंधन में बदल देता है. इस ईंधन को पास ही के कारखाने खरीदते है. अब इससे भी बडा, २५००० किलोग्राम (२५ टन) प्रति दिन क्षमता वाला संयंत्र बनाया जा रहा है, जिससे बनने वाले ईंधन की पूरी बुकिंग अभी से हो चुकी है! नागपुर शहर प्रतिदिन ३५ टन प्लास्टिक कचरा इकट्ठा करता है. इसका मतलब जल्दी ही झाडगांवकर परिवार को किसी और शहर मे अपने संयंत्र लगाने होंगे.

आशा है कि उनके इन प्रयासों को सफ़लता मिलेगी और सारी दुनियाँ को इस भयावह समस्या से छुटकारा मिलेगा. हमें भी इस प्रक्रिया में उनका हाथ बंटाना है. कैसे? अगर हम सब ध्यान रखें कि प्लास्टिक के सामान को सही तरीके से जमा करके अलग से रखा जाय जिससे कि वह अन्य कचरे में ना मिले और उसका निस्तारण व इस्तेमाल ठीक ढंग से हो.

क्रमशः…..

सम्बंधित कड़ियाँ: प्रो. झाडगांवकर का इस प्रक्रिया के सम्बन्ध में शोधपत्र, गुडन्यूज़ इण्डिया पर एक आलेख, केन्द्रीय प्लास्टिक अभियांत्रिकी तथा तकनीकि संस्थान

h1

बूझे लाल बुझक्कड़ – ५

सितम्बर 13, 2006

वाह, बहुत खूब! बहुत सही दिमाग लगाया आप सब लोगों ने. और पंकज भाई के उत्तर से इतना भी पता चल गया कि लाल पुछक्कड़ चाचा जवाब की ओर संकेत देने में उतने बुरे भी नहीं है. आप सबको बधाई.

इस बर्ष ११ सितम्बर को गाँधीजी के सत्याग्रह आन्दोलन की नींव डले पूरे १०० साल हो गये. बात है दक्षिण अफ़्रीका की. ट्रांसवाल प्रान्त की सरकार ने कानून बनाया गया कि वहाँ रहने वाले ८ वर्ष की उम्र से बड़े सभी भारतीय लोगों को अपनी अंगुलियों के निशान पुलिस में जमा कराने होंगे. कानून न माने जाने पर जेल में सज़ा का प्रावधान रखा गया. ऐसा कतई नहीं था कि भारतीय लोग चोर उचक्के थे, और ऐसा कानून सुरक्षा की दृष्टि से लाया गया हो. कानून में स्पष्ट रूप से भेदभाव की नीति अपनाई गयी थी. गाँधीजी ने उस समय स्थिति को समझा और उनके नेतृत्व में ११ सितम्बर १९०६ को भारतीय लोगों ने सत्याग्रह के द्वारा सरकार का विरोध करने की शपथ ली. यह विश्व में अपनी तरह का पहला प्रयोग था.

इस घटना से ठीक १३ वर्ष पूर्व, अर्थात् ११ सितम्बर १८९३ को शिकागो में गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए एक संन्यासी ने विश्व धर्म सम्मेलन में जो व्याख्यान दिया, उसने सारी दुनियाँ को हिलाकर रख दिया. एक अजनबी के मुँह से बहन या भाई सुनने की आदत नहीं थी अमेरिकावासियों को. स्वामी विवेकानन्द जी के इस व्याख्यान और बाकी के व्याख्यानों में भी बहुत भीड़ जुटी रही. उनका एक-एक शब्द अपने कानों में बटोरने के लिये लोगों में मानो होड़ सी लग गयी. उनके विचारो में सत्य भी है और तर्क भी, पर आश्चर्य की बात यह है कि उनके तर्क की वजह से सत्य धुंधला नहीं हुआ है!

धन्य है वह भारतभूमि जिसने ऐसे महापुरुषों को जन्म दिया.

सम्बंधित कडियाँ: सत्याग्रह, स्वामी विवेकानन्द जी का शिकागो व्याख्यान (स्वयं स्वामीजी के श्रीमुख से!?)

h1

पूछे लाल पुछक्कड़ – ५

सितम्बर 11, 2006

सारी दुनियाँ में ११ सितम्बर का दिन मानवता के इतिहास में काली स्याही से लिखा जाता है, क्यों? ना, ना सवाल यह नहीं है. लाल पुछक्कड़ चाचा को पता चला है कि जिस दिन को सारी दुनियाँ आतंकवादी कार्यवाही के लिये जानती है, उसी दिन अर्थात् ११ सितम्बर को बरसों पहले भारतमाता के दो महान सपूतों ने अलग-अलग समय विश्व को प्रेम का संदेश दिया था, अहिंसा का संदेश दिया था, आध्यात्म का संदेश दिया था. आपको बताना है कि यहाँ किन दो सपूतों की बात की जा रही है, और किस परिप्रेक्ष्य में?

आपको कोई संकेत चाहिये प्यारे भाईयों और बहनों? सोचिये और बताइये.

h1

नवीन भारत, नवीन विचार

सितम्बर 9, 2006

अपने बेटे की प्रतीक्षा में पलक-पाँवड़े बिछाये एक माँ, एक पिता के कदमों में वह उमंग, वह उत्सुकता; और दूर देस से उड़कर आने वाले बेटे के मन में ढेर सारी कल्पनायें. ऐसा ही कुछ होता है जब एक अप्रवासी भारतीय अपने घर जाता है, बिल्कुल अपनों के बीच! बसेरे से दूर बैठे-बैठे न जाने वह कौन सी डोर है जो खींचती रहती है बार-बार अपनी ओर? मुझे अपनी हाल की भारत यात्रा में ऐसा ही कुछ अनुभव हुआ.

वतन की मिट्टी की सोंधी खुशबू और घरवालों का उमड़ते हुए सागर सा आगाध प्रेम धरती के और किस कोने में मिलेगा? जब मैं ६ महीने बाद अपनी माँ से दिल्ली हवाई अड्डे पर मिला तब एक विदेशी का वीडियो कैमरा हमारी ओर खुद-ब-खुद मुड़ गया. पिछले डेढ़ साल में मैं तीसरी बार घर गया था.

इंदिरा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के आगमन कक्ष में कदम रखते ही मुझे मुझ जैसे और भी कई प्रसन्न चेहरे दिखे. गुड़गांव जाने के लिये राष्ट्रीय राजमार्ग-८ लिया और गाड़ी से बाहर झाँका तो पाया कि इन ६ महीनों में ही बहुत कुछ बदल गया है. विकास की एक साफ़ झलक दिखायी दे रही थी. मुझे भरोसा हुआ कि ऐसे ही छोटे-छोटे परिवर्तन जल्द ही भारत को विकसित देशों की क़तार में ला खड़ा करेंगे.

अगले कुछ दिनों में मैं कई बड़े-बड़े बाज़ारों, व्यावसायिक केन्द्रों पर गया और मुझे पहली बार आभास हुआ कि किसी भी मामले में ये यूरोप के किसी भी बाज़ार को टक्कर देते हैं. एक आम आदमी को यह विश्वास हो रहा है कि हम सभी प्रकार के उत्पाद बनाने में सक्षम हैं और किसी भी दृष्टिकोण से हमारे उत्पाद सर्वश्रेष्ठ हैं. यह आत्म-सम्मान और आत्म-निर्भरता एक बड़ी चीज़ है. मैंने मैकडोनाल्ड्स और पीज़ा हट में भीड़ देखी, तो उससे भी बड़ा जनसमूह चोर बाज़ार, सागर रत्न और मोती महल में था. मैंने पाया कि भारतीयों में विदेशी वस्तुओं को लेकर जो पागलपन था, वह काफ़ी हद तक दूर हुआ है. सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों की सेवाओं की गुणवत्ता में वृद्धि हुई है और लोगों का “चलता है” वाला रवैया कम हो रहा है. वे आज-कल सेवाओं की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दे रहे हैं.

हमारी अगली पीढ़ी देश के तकनीकि विकास और उससे जुड़े पहलुओं पर कहीं अधिक जागरूक हुई है. मैंने देखा कि कुछ किशोर एक समाचार चैनल को यातायात की ताज़ा जानकारी देने के लिये अपने मोबाइल से मल्टीमीडिया संदेश भेज रहे थे. यह जागरूकता ही देश का भविष्य है.

ऐसे बहुत सारे दृश्य अपनी आंखों में समेटकर, अपनों का ढेर सारा प्यार संजोकर और अपने देश के लिये गर्व की अनुभूति लेकर मैं वापस कोपनहेगन आ गया हूँ – इस आशा के साथ कि जल्द ही देश के विकास की जगमगाती हुई राह में एक छोटा सा दीप मेरा भी होगा.