Archive for अगस्त, 2006

h1

पूछे लाल पुछक्कड़ – १

अगस्त 21, 2006

हम वन्दे मातरम् पर एक श्रृंखला शुरु करने जा रहे हैं – पूछे लाल पुछक्कड़! इसके अन्तर्गत आपसे भारत से सम्बन्धित एक प्रश्न पूछा जायेगा. अगले दिन जवाब लेकर हाज़िर होंगें लाल बुझक्कड़. उद्देश्य है भारत से सम्बन्धित कुछ तथ्यों का संकलन एवं प्रचार. साथ ही साथ इन तथ्यों से जुड़े कुछ पहलुओं पर चर्चा.

आज का प्रश्न: नीचे एक मानचित्र दिया जा रहा है. उसमें एक मानदण्ड के अनुसार विश्च के सभी देशों को अलग-अलग रंगों से दर्शाया गया है. प्रश्न है कि यह मानदण्ड आखिर है क्या? ऐसा क्या है जो भारत को एशिया के अधिकांश देशों से अलग-थलग करता है?

map.png

संकेत: आपने अपनी भूगोल की कक्षा में शायद ही यह पढ़ा हो! शायद क्या, नहीं पढ़ा पक्का!

मानचित्र साभार: विकिपीडिया पर फ़्रीडम हाउस का एक सर्वेक्षण 

Advertisements
h1

कुछ यूँ सोचें

अगस्त 20, 2006

बात कुछ ज़्यादा पुरानी नही है, शायद १५ अगस्त २००६ की ही है. ‘आज तक’ चैनल पर एक समाचार दिखाया गया जिसे देखकर मन विचलित हो उठा. हुआ यह था कि ‘आज तक’ वालों ने संसद के बाहर, हमारे देश के कुछ नेताओं से चुनिंदा सवाल पूछे. ये प्रश्न हमारे राष्ट्रीय प्रतीक, हमारे झण्डे, राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत से सम्बन्धित थे. पर यह क्या! हमारे देश के कर्णधारों को यह सामन्य जानकारी भी नहीं! अधिकांश नेताओं ने गलत उत्तर दिये. मीडिया वाले अपनी आदत के अनुसार ऐसा प्रयोग फ़िल्म अभिनेताओं और प्रख्यात मॉडलों के साथ करके जनता का मनोरंजन तो करते आये थे, पर आज नेता भी निशाने पर! हमारी शिक्षा प्रणाली में इससे भी कठिन प्रश्नों के उत्तर ना पता होने पर छात्रों को अयोग्य या अनुत्तीर्ण घोषित कर दिया जाता है. क्या अयोग्य छात्र योग्य नेता बन सकते हैं?

खिन्न मन से इसी विषय पर सोच रहे थे कि हमारे एक जानकार श्रीमान ‘क’ का आगमन हुआ. हमारा चेहरा देखते ही समझ गये कि मौसम ठीक नहीं है. एक हितैषी के धर्म का पालन करते हुए उन्होने बाक़ायदा सहानुभूति भरे लहज़े में वजह पूछ डाली.

“इधर से ग़ुज़र रहा था सोचा आपसे मिलता चलूँ. वैसे भी आज बड़े दिनों बाद फुर्सत में हूँ, पर आप कुछ चिंतित हैं. कुछ परेशानी है क्या?”

वजह जान कर मित्रवर ने वही किया जो ९०% भारतीय करते हैं.

“हाय..बताओ..च्च..च्च…..यह भी नहीं पता. अरे यह तो पहले-दूसरे दर्ज़े में सिखाया जाता है. अब भैया इस देश का बेड़ा गर्क समझो. बताओ देश चलाने वालों को ही देश का आगा-पीछा नहीं मालूम….च्च..च्च..च्च”.

इसके बाद तो जो उन्होने देश की वर्तमान स्थिति की व्याख्या शुरू की तो रोके ना रुके. देश के नेताओं को विशिष्ट उपनामों से नवाज़ा गया. ये ऐसा, वो वैसा….! अब तक हमारी सहनशक्ति जब क्षीण हो चली थी, सो हमने कहा : जी बंधुवर, ठीक कहते हैं. सोचती हूँ इस विषय पर एक पत्र लिख कर किसी समाचारपत्र में छपने हेतु भेज दूँ. आप थोड़ा सहयोग करें तो अतिकृपा होगी. मेरा भाषाज्ञान थोड़ा कमज़ोर है, अत: आप प्रश्नों के उत्तर मुझे परिष्कृत भाषा में लिखवा दें.”

अब मान्यवर की सूरत देखने लायक थी. महोदय के जिस श्रीमुख से चंद क्षणों पूर्व निंदारस में पगे शब्दों की झड़ी लगी थी, अब उससे एक बोल ना फूट पा रहा था. बोले : मैं ज़रूर मदद करता, पर अभी कहीं जाना है. मुझ अकेली जान को दुनिया भर का काम पड़ा है.”

अपने अज्ञान पर पर्दा डालने की हड़बड़ी में महोदय यह भी भूल गये कि थोड़ी देर पहले ही अपने फुर्सत में होने का एलान कर चुके थे. खैर वह चले गये, मैने रोका भी नहीं. मन सोचने पर विवश हो गया कि ऐसे दोहरे मापदंड रखने वालों को क्या उन नेताओं पर टिप्पणी करने का कोई भी अधिकार है? जब भी ऐसी कोई घटना सामने आती है, आलोचकों की बाढ़ आ जाती है. हर भारतीय उस घटना का विशेलषण, वर्तमान स्थिति की निंदा व देश की लचर हालत पर टिप्पणी करना अपना परम धर्म समझने लगता है. भई आखिर विचारों की अभिव्यक्ति सबका मौलिक अधिकार जो ठहरा.

पर हम क्यूँ हमेशा समस्या का हिस्सा बनते हैं? समाधान की पहल क्यूँ नहीं करते? इसी घटना को सुन कर जितने भारतीयों के मन में यह विचार आया कि हमारे नेता कितने रद्दी हैं उनसे मेरा एक प्रश्न हैं : क्या आप वोट देते हैं?

यदि नहीं, तो अपने अंत:करण से पूछिये कि क्या आपको आलोचना का अधिकार प्राप्त है?

आलोचना या निंदा करना आसान है, पर समस्या का हल नहीं. यदि आप एक अच्छा व जागरूक नागरिक होने का दावा करते हैं तो ऐसी घटना या किसी भी अन्य विसंगति के बारे में जानकर आपको सबसे पहले स्वयं से ही प्रश्न करना होगा कि कहीं मैं भी तो इसका एक हिस्सा नहीं? मैं क्या करूँ कि इस समस्या के अंत की शुरुआत हो सके?

अधिक दूर की नहीं, पर कम से कम घर से तो पहल की जा सकती है ना! क्या नवागत पीढ़ी को इन आधारभूत प्रश्नों के उत्तरों से अवगत कराना हमारा ही कर्तव्य नहीं है? मुझे नहीं लगता कि बीते समय की घटनाओं के ‘पोस्टमॉर्टम’ से हम कुछ हासिल कर सकते हैं, किंतु अतीत की गलतियोँ से शिक्षा ले भविष्य को उज्ज्वल बनाने की पहल अवश्य कर सकते हैं, यह मेरा विचार है.

आइये, आज साथ मिल कर हम सभी भारतवासी यह संकल्प करें कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को हम इस अज्ञान के अँधेरे से बाहर निकालेंगे. हर उस बुराई को, विसंगति को, जिससे हमें शिकायत है, कम से कम अपने घर और आसपास के समाज में फ़ैलने से रोकने का प्रयास करेंगे. माना कि यह कार्य दुष्कर है और रास्ता लंबा, पर लंबे से लंबा सफ़र भी एक छोटे से क़दम से ही तो शुरू होता है.

h1

ताक़त वतन की : ऊर्जा (भाग १)

अगस्त 19, 2006

एक ज़माना था जब राजा हुआ करते थे, किले हुआ करते थे. राजा जब भी कोई खतरा महसूस करता था, अपनी सेना के साथ किले में जाकर बैठ जाता और शत्रु किले को चारों ओर से घेरकर डेरा जमा लेता. फिर शुरु होती थी होड़ कि कौन कितने दिन अपनी जगह डटा रहता है. अगर किला बड़ा है और उसमें पर्याप्त मात्रा में दाना-पानी मौजूद है तो शत्रु कई महीनों तक राजा का कुछ नहीं बिगाड़ पाता और अंतत: धूप, बारिश, बीमारियों से परेशान होकर हार मानकर चला जाता.

अब यह तो रही पुरानी बात. अब युद्ध अलग तरीके से लड़े जाते हैं, मैदान बदल गये हैं, राजा और किले पुराने हो गये हैं. बंदूकें और तोप भी कल की बात हुईं. आजकल देश एक-दूसरे से कई अलग-अलग मैदानों में लड़ते हैं. उनमें से एक महत्वपूर्ण मैदान है ऊर्जा संसाधन. बिजली, तेल, कोयला, आणविक ऊर्जा से सम्बन्धित तकनीकि और उससे जुड़े हुए साज़ो-सामान. ज़ाहिर सी बात है कि अब ऊर्जा के संसाधन रोटी, कपड़ा और मकान जितने ही जरूरी हो चले हैं. कोई भी देश पर्याप्त ऊर्जा संसाधनों के बिना प्रगति नहीं कर सकता. और शायद यही संसाधन आज के सबसे महत्वपूर्ण हथियार हैं. एटम बमों से अधिक खामोश पर बेहद खतरनाक. यह ‘बम’ हर रोज़ किसी देश की जनता को आगे बढ़ाते हैं या पीछे खींचते हैं. आजकल किसी भी देश की ताक़त का अंदाज़ा सिर्फ़ उसकी सामरिक शक्ति से ही नहीं लगाया जाता बल्कि उसके साथ-साथ युद्ध की स्थिति में ऊर्जा की आवश्यकताओं की पूर्ति करने की क्षमताओं का भी आंकलन किया जाता है. पेट्रोलियम तेल से जुड़ी हुई राजनीति को लेकर दुनियां में जो तबाही मची हुई है, उससे हर कोई परिचित है.

आज हमारा देश प्रगति के पथ पर है. विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और करीब १ अरब १० करोड़ लोगों का घर. इतनी बड़ी जनसंख्या की जरूरतें भी उतनी ही बड़ी हैं. आज हमारे देश को हर तरह के ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता है – आगे बढ़ने के लिये और आगे रहने के लिये. पिछले कई वर्षों से भारत सरकार रचनात्मक रूप से ऊर्जा के स्रोतों को एकत्रित करने का प्रयास कर रही है. चाहे वह पेट्रोलियम तेल हो, कोयला हो, वायु हो, नाभिकीय ऊर्जा, या कुछ और. हर क्षेत्र में एक होड़ सी लगी है और सिर्फ़ भारत में ही नहीं विदेशों में भी.

स्वाभाविक सी बात जो आप पूछेंगे – “भैया, मुझे इन सबसे क्या लेना-देना? मैं तो अपना बिजली का बिल हर महीने भरता हूँ, मेरे घर में हर महीने १ या २ गैस सिलेण्डर लगते हैं जो मुझे आराम से मिल जाते हैं, आजकल ज़रा मंहगे हो गये हैं पर फिर भी. और वैसे भी मेरे इस विषय पर सर फोड़ने से क्या हो जायेगा? न ही ईरान से भारत तक तेल की नहर खुदने वाली और न ही गंगा मैया बाकी सारी नदियों के साथ मिलके ज्यादा बिजली पैदा करने के लिये आंदोलन करने वालीं. तो मेरे जैसे शरीफ़ आदमी का इन सबसे क्या लेना-देना? वैसे भी सरकार में इतने नेता हैं, उनको इन सब चीज़ों के बारे में सोचना चाहिये”. लेकिन जब मई या जून के महीने में दोपहर १ बजे बिजली गुल हो जाती है, तब आपको भगवान याद आ जाते हैं. पर क्या आप जानते हैं कि भारत में घरेलू इस्तेमाल की बिजली की प्रति यूनिट कीमत दुनियाँ में सबसे कम है!

इस श्रृंखला को शुरु करने का उद्देश्य है हमारे देश के ऊर्जा सम्बन्धित तथ्यों को एकत्रित करना और उन्हें समझने की कोशिश करना. इस श्रृंखला में पारम्परिक और गैर-पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों के अलग-अलग पक्षों पर चर्चा होगी. साथ ही साथ विषय के अन्य पहलुओं जैसे सामाजिक, राजनैतिक, औद्योगिक और वैज्ञानिक पक्षों पर भी विचार होगा. उद्देश्य है कि सामान्य भारतीय नागरिक देश की ऊर्जा सम्बन्धित समस्याओं और उनके समाधान के बारे में कुछ और जागरूक हों, हमारे इन मौलिक संसाधनों का उपयोग भली प्रकार से कम से कम अपव्यय के साथ करने के तरीकों के बारे में जानें, समझें व सोचें और उन पर अमल करें. आइये बात करें एक उभरते हुए देश की, उसकी जरूरतों की, उसकी समस्याओं की और उसकी सरकार द्वारा इस सम्बन्ध में लाई जा रही नीतियों की.

क्रमश:….

h1

ये तारा वो तारा

अगस्त 18, 2006

मेरी एकाग्रमुद्रा को भंग करती हुई एक आवाज़. पत्तियों की खड़खड़ाहट में गुंथी हुई एक आवाज़ ! अद्भुत दृश्य है. मैं मकड़ी के जाले जैसे एक सघन जालतंत्र के झरोखे से आकाश में झाँकती हूँ. एक विशालकाय तश्तरीनुमा एण्टेना चौकसी करते हुये पहरेदार की तरह अपनी गर्दन घुमा रहा है. एक विलक्षण अनुभव है. मुझे दूर क्षितिज तक बस ऐसे ही एण्टेने दिखायी दे रहे हैं – किसी को ढ़ूँढ़ते हुए, कहीं से कुछ बटोरते हुए ये एण्टेने! यह है पुणे का एक सुदूरवर्ती गाँव खोडद, नारायणगाँव के निकट.

ये एण्टेने वास्तव में विश्व की सबसे बड़ी रेडियो दूरबीन हैं! तकनीकि रूप से कहें तो विशालकाय मीटरवेव रेडियो दूरबीन (Giant Metrewave Radio Telescope) या GMRT. करीब २५ किलोमीटर के क्षेत्र में ऐसे कुल ३० एण्टेने अंग्रेज़ी के अक्षर ‘Y’ की आकृति में लगे हुए हैं. हर एण्टेने का वजन लगभग ११० टन है (अर्थात् धान से लदे हुए ११ ट्रक!) और इन्हें घुमाकर आकाश में एक दिशा में स्थापित कर पाना अपने आप में भारतीय अभियांत्रिकी की बहुत बड़ी उपलब्धि है. इस रेडियो दूरबीन का कार्य १९८९ के आस-पास प्रख्यात भारतीय खगोल वैज्ञानिक प्रो. गोविंद स्वरूप के नेतृत्व में आरंभ हुआ था और १९९९ तक सभी एण्टेनों ने खगोलीय प्रेक्षण करना शुरु कर दिया था. रेडियो तरंगें उत्सर्जित करने वाले सभी खगोलीय पिण्डों के अध्ययन के लिये GMRT का प्रयोग विश्व के अनेक वैज्ञानिकों द्वारा किया जाता है. कुल प्रेक्षण समय के लगभग ४० प्रतिशत समय का उपयोग विदेशों, जिनमें बहुत बड़ा भाग विकसित देशों का है, के खगोलशास्त्री करते हैं

 

gmrt2.JPG

 

GMRT का एक लक्ष्य सुदूरवर्ती दीर्घिकाओं (Galaxies) में उपस्थित हाइड्रोजन का पता लगाना है (धरती पर बैठे बैठे!). हमारे ब्रह्माण्ड का बहुत बड़ा हिस्सा हाइड्रोजन का है जिससे दीर्घिकाओं की भी रचना हुई है. ऐसा माना जाता है कि हर क्षण ब्रह्माण्ड फैल रहा है और दूर स्थित दीर्घिकाएं और भी दूर होती जा रही हैं. दूर जाते हुए पिण्डों से उत्सर्जित प्रकाश की प्रेक्षित तरंग द्धैर्य (Wave Length) बढ़ती जाती है. इसे डॉप्लर का सिद्धान्त कहा जाता है. अब दूरस्थ दीर्घिकाओं में हाइड्रोजन से हुए रेडियो उत्सर्जन का प्रेक्षण GMRT के माध्यम से संभव हो सकेगा.

आज प्रौद्योगिकी क्रान्ति के इस दौर में भारत को मूलभूत विज्ञान में निवेश करते देखना एक सुखद अनुभव है. भारतीय वैज्ञानिकों और अभियंताओं के सतत परिश्रम से ही यह चुनौतीपूर्ण कार्य संभव हो सका है.

अब एण्टेना रुक गया है, शायद उसकी तलाश पूरी हुई. मैं वापस अपने कार्यालय भवन जा रही हूँ. मुझे आगे बढ़ते हुए हर कदम में गौरव की अनुभूति हो रही है – अपने लिये और अपने देश के लिये!

कुछ कड़ियाँ: GMRT का आधिकारिक जालघर, राष्ट्रीय रेडियो खगोलिकी केन्द्र (NCRA), टाटा मूलभूत शोध संस्थान

(लेखिका स्वयं एक खगोलशास्त्री हैं और यह आलेख उनका अनुभव है.)

h1

भारतीय अंक प्रणाली

अगस्त 16, 2006

सुबह सुबह सेठ लक्खीमल मिल गये, जिनसे पिछले महीने मैंने DCCCLXXXVIII रुपये उधार लिये थे. अपना रास्ता बदलता कि उससे पहले ही सेठजी की आवाज़ आयी, “क्यों उधारचंद, कब वापस कर रहे हो”? मैंने कहा “बस पहली तारीख को पगार मिलते ही सब चुकता कर दूंगा. सेठजी बोले वो छोड़ो, XIV रुपया टक्का के हिसाब से जो सूद बनता है, सो दे दो अभी. मैंने पूछा “कितना हुआ”? सेठजी ने हिसाब तो शुरु कर दिया, पर पूरा नहीं कर पाये! भला हो उनका जो रोमन पद्धिति से हिसाब करते हैं!

अरब के व्यापारी इस मामले में बहुत होशियार निकले. उन्होंने 0 से 9 तक के सभी अंक भारतीयों से सीख लिये. जोड़-घटाना-गुणा-भाग भी सीख लिया. और तो और सारे विश्व में हमारी संख्या पद्धिति का प्रचार भी कर दिया. सो सारी दुनियां के लिये 0-9 कहलाये ‘अरेबिक नम्बर्स’ और अरब लोगों के लिये कहलाये ‘हिंदसा’, हिंदुस्तान से जो सीखे थे उन्होंने.

अब चमत्कार देखिये, जोड़-घटाना-गुणा-भाग में तो सहूलियत है ही (सो तो सेठ लक्खीमल जी ने आपको समझा ही दिया है!) पर और भी लाभ हैं. अब सीधा सा सवाल है – 1,2,3,4,….. कुल कितनी संख्यायें है? असीम, अगणित, अनंत! और रोमन पद्धिति में ज्यों-ज्यों संख्या बड़ी हुई, एक और नये चिन्ह (I, V, X, L, C, D, M इत्यादि) की आवश्यकता हुई. अत: रोमन पद्धिति अक्षम है सभी संख्याओं के निरूपण में! तो ऐसी पद्धिति तो स्वयं में अपूर्ण है, तो उससे और क्या अपेक्षा रखनी! दूसरी ओर भारतीय पद्धिति में 0 से लेकर 9, ये 10 चिन्ह ही पर्याप्त हैं किसी भी बड़ी से बड़ी संख्या को निरूपित करने के लिये!

जब भारतीय पद्धिति तेरहवीं शताब्दी में यूरोप पहुची तो रोमन कैथोलिक चर्च ने जमकर इसका विरोध किया और भारतीय पद्धिति को ‘शैतान का काम’ कहा! परन्तु सही बात कब तक दबायी जा सकती थी, सो अब परिणाम सबके सामने है.

और तो और, भारतीयों ने यह भी सिद्ध किया कि किसी भी संख्या का निरूपण मात्र दो चिन्हों (0 और 1) के माध्यम से ही संभव है. जी हाँ, यहाँ वर्तमान बाइनरी सिस्टम (द्विअंकीय प्रणाली) की ही बात की जा रही है, जो आज समूचे कम्प्यूटर विज्ञान का आधार है. पिंगला ने पांचवीं शताब्दी ई.पू. में ही यह द्विअंकीय प्रणाली खोज निकाली था, और वह भी साहित्य के माध्यम से! उनके छंद सूत्रों में, जो मूलत: संस्कृत श्लोकों के विन्यास और उनकी लंबाई को मापने के लिये प्रयोग किये गये थे, पूरी द्विअंकीय प्रणाली छिपी हुई है! सोचिये जो काम यूरोपीय लोग तेरहवीं शताब्दी तक अनगिनत चिन्हों के साथ करते थे (सो भी अधूरा!), वह पिंगला ने मात्र दो चिन्हों में कर दिखाया था ईसा से 500 साल पहले! यहां यह भी इंगित करना उचित होगा कि उस समय शून्य की संकल्पना करना कितनी बड़ी उपलब्धि रही होगी. आज का कम्प्यूटर विज्ञान उसी भारतीय प्रणाली, उसी गहरी सोच पर आधारित है.

कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है… कि भारत इस सबका पेटेण्ट ले ही लेना चाहिये, इससे पहले कि यह भी पराया हो चले!

h1

अर्पण

अगस्त 15, 2006

वन्दे मातरम् – सन् १८७५ की अक्षय नवमी को कंतलपाड़ा कस्बे के एक घर में बैठे ३७ बर्षीय युवक बंकिम की कलम पर माँ सरस्वती का डेरा जमा और उस कलम से निकला यह कालजयी क्रान्तिकारी गीत. हर दिल को छू गये ये शब्द. कितने सहज, कितने सरस, कितने कोमल, कितने पावन! और यदि लहू में दौड़ जायें तो इतने प्रचंड कि झंझावात बनकर शत्रु को अंतिम सीमा तक खदेड़ दें. गली में रणभेरी सी होती – वन्दे मातरम्, और निकल पड़ती सहस्रों नवयुवकों और बालकों की टोली ब्रिटिश सरकार के परखच्चे उड़ाने.

इतने सुंदर शब्द कि जिस सुर में गाओ, अपने से लगें. कभी राग काफ़ी, कभी झिंझोटी, कभी सारंग, कभी देस – जिसने जो चाहा उस सरगम में इन्हें महसूस किया. नेताजी की आज़ाद हिन्द फ़ौज में ‘कदम कदम बढ़ाये जा’ जैसे गीत को जामा पहनाने वाले कैप्टन राम सिंह ने तो वन्दे मातरम् की एक धुन प्रयाण गीत की तरह रच दी! बैण्ड की थाप पर सैनिकों के थिरकते कदम और इस धुन में बजता हुआ वन्दे मातरम्! आह, क्या मनोरम दृश्य रहा होगा!

दूरदर्शन पर कितनी ही बार सुबह-सुबह वन्दे मातरम् की धुन सुनकर जागते थे हम सब, ठीक वैसे ही जैसे कि हमारा देश जागा था बरसों पहले इस पुण्य श्लोक की गूंज सुनकर! आज उस जागरण के साठवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं हम, और इस पावन अवसर पर माँ भारती के चरणों में अर्पित कर रहे हैं अपना एक प्रयास, इस चिट्ठे के माध्यम से.

अपने इस चिट्ठे पर भारत, इसके भूत, वर्तमान और भविष्य से जुडे़ सभी पहलुओं, साहित्य, राजनीति, विज्ञान, संगीत आदि पर चर्चा होगी. और बालक को तो अधिकार है ही अपनी माँ से रूठ जाने का, सो कभी-कभी ऐसे विषय भी चर्चा में होंगे जिनमें यह बालक अपनी माँ की किसी बात से अप्रसन्न होकर रूठा हुआ है.

 

वन्दे मातरम्: कुछ झलकियाँ

 

हमारा परिचय: हम कुछ भारतीय चिट्ठाकार हैं जो अपने इस चिट्ठे ‘वन्दे मातरम्’ में एक संयुक्त छद्मनाम ‘स्वाधीन’ के परचम तले अपने विचार प्रकट करेंगे. हमारा उद्देश्य है सर्वप्रथम हिन्दी चिट्ठाजगत, और तत्पश्चात् जन-जन को भारत के गौरवशाली इतिहास, विज्ञान आदि का बोध ठोस तथ्यों के माध्यम से कराना और इस प्रकार भारतमाता की सेवा करते हुए एक स्वर्णिम भविष्य की नींव रखना. निश्चित ही इस प्रक्रिया में हमें बहुत कुछ सीखने को मिलेगा, स्वाध्याय से और आप सब से.

आप सबको स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें!

वन्दे मातरम्!

आपके,
स्वाधीन

(निधि श्रीवास्तव, नोयडा, भारत
अमित कुलश्रेष्ठ, लूवां, बेल्जियम
परेश मिश्रा, कोपनहेगन, डेनमार्क
दिव्या श्रीवास्तव, कोपनहेगन, डेनमार्क
कनव अरोड़ा, कोपनहेगन, डेनमार्क
उमेश कढ़णे, आरहुस, डेनमार्क
सरिता विग, फ़्लोरेंस, इटली
नूतन गौतम, कानपुर, भारत
कैलाशचन्द्र पंत, पुणे, भारत
विवेक वर्मा, वेल्स, यू.के.
अभिजीत सिंह, इंदौर, भारत)