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लौटकर आगे बढ़ें

अगस्त 31, 2006

ज्ञान की प्राप्ति का सही मार्ग क्या है? वह कौन सी दिशा है जिसका अनुकरण करने पर ज्ञान के साथ साक्षात्कार संभव है? सदियों से मानव इसी भूल-भुलैया में उलझा हुआ है. ऐसे बहुत से संदेहों का निराकरण सदियों पहले हमारे गुरु, हमारे ऋषि कर गये हैं. स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने कहा था वेदों की ओर जाओ. सचमुच हमारे वेद, उपनिषद इत्यादि ज्ञान का अनुपम भण्डार हैं. उपनिषदों में गुरु-शिष्य वार्तालाप के माध्यम से मानव मन में यदा-कदा उठने वाली शंकाओं को सामान्य, परन्तु बहुत गहरे ढंग से सुलझाया गया है. हर प्रश्न का उत्तर देने के बाद गुरु कहता है, “नेति नेति – यही इति नहीं है, और भी दिशायें हैं, संभावनायें हैं. अत: हे शिष्य, स्वविवेक का प्रयोग करो”. ऐसी खुली सोच अन्यत्र विरले ही देखने को मिलती है.

ऋग्वेद का यह श्लोक देखिये:

नासदासीन् नो सदासीत् तदानीं नासीद् रजो नो व्योमापरो यत्
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद् गहनं गभीरम्

अर्थात् जब होने, न होने का कुछ अर्थ ही नहीं था, तब क्या था? यह सोच बड़ी गहरी है, दार्शनिक है, वैज्ञानिक है. समय की गूढ़ संकल्पना का मूल है यह सोच. आज का विज्ञान तथ्य खोजता है. जो भौतिक है उसे खोजता है, पर हमारे प्राचीन विज्ञान में भी दर्शन छिपा था और दर्शन में विज्ञान. एक दृष्टि से कहें तो किसी भी प्रकार के ज्ञान की खोज का मार्ग एक ही है, जिसे संक्षेप में ईश्वर की खोज भी कहा जा सकता है. अत: ईश्वर को विज्ञान से भिन्न समझना ठीक नहीं है.

नानक साहब ईश्वर के बारे में अपने मूल मन्तर में बहुत कुछ कह गये:

इक ॐकार, सतनाम, कर्ता-पुरख, निरभौ-निर्वैर, अकाल मूरत, अजुनि सैभंग, गुरपरसाद जप
आद सच, जुगाद सच, है भी सच, नानक होसी भी सच

यहाँ ‘जुगाद’ शब्द सृष्टि के आरम्भ से पहले समय की अवधारणा की ओर इंगित करता है.

समय के साथ-साथ दर्शन, विज्ञान और धर्म अलग हुए. परिणामस्वरूप विज्ञान और धर्म दोनों की ही परिभाषायें क्षीण हुयीं. यदि आधुनिक विज्ञान का विकास हमारी मूल सोच के साथ हुआ होता तो शायद बम न बनते. यदि आधुनिक धर्मों का विकास हमारी मूल सोच के साथ हुआ होता तो शायद बमों की आवश्यकता न होती.

(मूल मन्तर का शाब्दिक अनुवाद: एक ही सृष्टिकर्ता है. जिसका नाम, जिसका अस्तित्व अनंत काल से सत्य है. वही एकमात्र रचयिता है. वह भयहीन है, वह सबसे समान रुप से प्रेम करता है. वह सनातन है, समय की सीमाओं से परे है. वह जीवन-मॄत्यु के चक्र से अलग है, वह स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित है. उसके दर्शन गुरु के प्रताप से ही संभव हैं. ऐसे अनादि ईश्वर का ध्यान करना चाहिये. ईश्वर आरम्भ में भी सत्य था और समय के आरम्भ के पहले भी सत्य था. वह अभी भी सत्य है और सतगुरु नानक कहते हैं कि वह सदा सत्य रहेगा.)

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