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बूझे लाल बुझक्कड़ – ३

अगस्त 29, 2006

लीजिये आ गये लाल बुझक्कड़ चाचा। दोपहर होते होते लाल पुछक्क्ड़ चाचा मायूस हो चले थे कि इस बार कोई बूझ ही नहीं पा रहा पहेली. हम दोनों को लगा कि प्रश्न अधिक कठिन हो गया शायद. किंतु विजय जी एक बार पुनश्च: साधुवाद के अधिकारी हैं कि उन्होंने हल खोज लिया। संजय जी तथा अनूप जी ने भी उनका समर्थन किया है. इस तरह के प्रश्नों के पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ़ इतना होता है कि हम अपने पाठकों के मन में अनुकरणीय व्यक्तियों के जीवन के प्रति उत्सुकता जगा सकें. उनको देश के ऐसे महान लोगों से परिचित करा सकें जो धीरे-धीरे इतिहास में गुम हो रहे हैं.

अब यह कहने की अवश्यकता तो रह नहीं गयी कि आपका जवाब सही है. जी हाँ, चित्र आचार्य प्रफ़ुल्ल चंद्र राय का ही है. इनका जन्म २ अगस्त, १८६१ को जैसोर जिले (वर्तमान में ‘खुलना’) के ररूली नामक गाँव में हुआ था. यह जगह अब बांग्लादेश में है। आचार्य प्रफ़ुल्ल चन्द्र रसायन शास्त्र के प्रोफ़ेसर थे. आज से ८० वर्ष पूर्व भारत में एलोपैथी की औषधियों का निर्माण नहीं होता था. यह दवाइयाँ विदेश से आयात की जाती थी. भारत के रोग-ग्रस्त लोगों को उचित दामों पर दवाई उपलब्ध भी नहीं हो पाती थी. प्रफ़ुल्ल चंद्र को यह बात स्वीकार्य नहीं थी कि विदेशी कंपनियाँ भारतीय जनता की मजबूरी पर फलें-फूलें. इसी विचार के साथ आर्थिक संकट के बावजूद उन्होनें घर पर रसायन बनाने शुरू किये. उन्होंने समस्या की आलोचना से अधिक समाधान पर ध्यान दिया और भारत में औषधि-निर्माण की नींव रखी. वर्ष १८९६ में मर्क्यूरस नाइट्राइट की खोज का श्रेय भी उन्हीं को जाता है.

श्री राय केवल एक वैज्ञानिक ही नहीं थे अपितु एक सच्चे देशभक्त भी थे. अपने छात्र-जीवन में उन्होंने सम्मानित गिलक्रिस्ट पुरु्स्कार प्राप्त किया जिसकी वजह से उन्हें इंग्लैंड में उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला. इंग्लैंड में प्रवास के दौरान श्री राय नें भारत में ब्रिटिश-राज्य की कड़ी आलोचना करी तथा ब्रिटिश सरकार को परतंत्र भारत की पीड़ा का आभास कराने के लिये प्रयत्नरत रहे. भारत लौटने के बाद श्री राय अपने कार्य तथा देश के प्रति समर्पित हो गये. अपनी आय का एक बडा हिस्सा उन्होंने सदैव ग़रीब तथा सुपात्र विद्यार्थियों की मदद, खादी के प्रचार व उत्पादन तथा विधवाओं एवं अनाथ बच्चों के उद्धार में लगाया. समाज में फैली बाल-विवाह, दहेज तथा छुआछूत जैसी कुप्रथाओं के कड़े विरोधी श्री राय ने उनके उन्मूलन के लिये यथासंभव प्रयास किये. देश में बाढ़ एवं भूकंप जैसी आपदाओं के समय पीड़ितों की सहायतार्थ धन, भोजन तथा वस्त्र जुटाने के लिये आचार्य दिन-रात जुटे रहते.

श्री प्रफ़ुल्ल चंद्र को साहित्य से भी अगाध प्रेम था. शेक्स्पियर के नाटकों से लेकर श्री रबीन्द्र नाथ टैगोर एवं मधुसूदन दत्त की अनेकों कवितायें उन्हें कंठस्थ थीं. हिंदी तथा बंगाली के अतिरिक्त संस्कृत, लैटिन, फ़्रेंच एवं इंग्लिश भाषा पर उनका खा़सा आधिपत्य था. इसी प्रकार विज्ञान के अलावा राजनीति, अर्थशास्त्र तथा इतिहास जैसे विषयों पर भी श्री राय की गहरी पकड़ थी. यहाँ तक कि स्वाध्याय से वर्ष १८९३ में श्री राय ने जीव-विज्ञान पर भी पुस्तक लिखी .

उनका व्यक्तित्व बहुआयामी होते हुए भी बेहद सादग़ी पूर्ण था. आचार्य के ७०वें जन्मदिवस पर ठाकुर रबीन्द्र नाथ टैगोर नें कहा था–“उपनिषदों में कहा गया है – ‘एक अनेक में परिवर्तित हो जाता है.’ आचार्य प्रफ़ुल्ल चन्द्र राय ने अपना जीवन अपने विद्यार्थियों के लिये समर्पित कर दिया; अब वह अनेकों के हृदयों में वास करते हैं.” जून १६, १९४२ को कलकत्ता विश्वविद्यालय के ‘यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑव़ साइंस’ के परिसर में बने छोटे से कमरे में अपने विद्यार्थियों, मित्रों तथा प्रशंसकों के बीच उनका निधन हो गया. यही छोटा सा कमरा ऐसे महान वैज्ञानिक, समाज-सुधारक और राष्ट्रभक्त की कुल संपत्ति थी और यही विद्यार्थी उनका परिवार.

आचार्य प्रफ़ुल्ल चंद्र राय का जीवन हमारे लिये प्रेरणा का स्रोत है. ऐसे महान व्यक्ति के बारे में और अधिक जानकारी आप निम्नलिखित साइटों से प्राप्त कर सकते हैं :

http://www.vigyanprasar.gov.in/scientists/pcray/PCRay.htm

http://www.vidyapatha.com/scientists/ray.php

http://www.freeindia.org/biographies/greatscientists/drpcray/index.htm

2 टिप्पणिया

  1. बहुत सही जानकारी रही. जारी रखें यह सिलसिला…


  2. “ऐसे महान लोगों से परिचित करा सकें जो धीरे-धीरे इतिहास में गुम हो रहे हैं.

    क्षमा करे, हो नहीं रहे किया जा रहा हैं.



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