Archive for अगस्त, 2006

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लौटकर आगे बढ़ें

अगस्त 31, 2006

ज्ञान की प्राप्ति का सही मार्ग क्या है? वह कौन सी दिशा है जिसका अनुकरण करने पर ज्ञान के साथ साक्षात्कार संभव है? सदियों से मानव इसी भूल-भुलैया में उलझा हुआ है. ऐसे बहुत से संदेहों का निराकरण सदियों पहले हमारे गुरु, हमारे ऋषि कर गये हैं. स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने कहा था वेदों की ओर जाओ. सचमुच हमारे वेद, उपनिषद इत्यादि ज्ञान का अनुपम भण्डार हैं. उपनिषदों में गुरु-शिष्य वार्तालाप के माध्यम से मानव मन में यदा-कदा उठने वाली शंकाओं को सामान्य, परन्तु बहुत गहरे ढंग से सुलझाया गया है. हर प्रश्न का उत्तर देने के बाद गुरु कहता है, “नेति नेति – यही इति नहीं है, और भी दिशायें हैं, संभावनायें हैं. अत: हे शिष्य, स्वविवेक का प्रयोग करो”. ऐसी खुली सोच अन्यत्र विरले ही देखने को मिलती है.

ऋग्वेद का यह श्लोक देखिये:

नासदासीन् नो सदासीत् तदानीं नासीद् रजो नो व्योमापरो यत्
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद् गहनं गभीरम्

अर्थात् जब होने, न होने का कुछ अर्थ ही नहीं था, तब क्या था? यह सोच बड़ी गहरी है, दार्शनिक है, वैज्ञानिक है. समय की गूढ़ संकल्पना का मूल है यह सोच. आज का विज्ञान तथ्य खोजता है. जो भौतिक है उसे खोजता है, पर हमारे प्राचीन विज्ञान में भी दर्शन छिपा था और दर्शन में विज्ञान. एक दृष्टि से कहें तो किसी भी प्रकार के ज्ञान की खोज का मार्ग एक ही है, जिसे संक्षेप में ईश्वर की खोज भी कहा जा सकता है. अत: ईश्वर को विज्ञान से भिन्न समझना ठीक नहीं है.

नानक साहब ईश्वर के बारे में अपने मूल मन्तर में बहुत कुछ कह गये:

इक ॐकार, सतनाम, कर्ता-पुरख, निरभौ-निर्वैर, अकाल मूरत, अजुनि सैभंग, गुरपरसाद जप
आद सच, जुगाद सच, है भी सच, नानक होसी भी सच

यहाँ ‘जुगाद’ शब्द सृष्टि के आरम्भ से पहले समय की अवधारणा की ओर इंगित करता है.

समय के साथ-साथ दर्शन, विज्ञान और धर्म अलग हुए. परिणामस्वरूप विज्ञान और धर्म दोनों की ही परिभाषायें क्षीण हुयीं. यदि आधुनिक विज्ञान का विकास हमारी मूल सोच के साथ हुआ होता तो शायद बम न बनते. यदि आधुनिक धर्मों का विकास हमारी मूल सोच के साथ हुआ होता तो शायद बमों की आवश्यकता न होती.

(मूल मन्तर का शाब्दिक अनुवाद: एक ही सृष्टिकर्ता है. जिसका नाम, जिसका अस्तित्व अनंत काल से सत्य है. वही एकमात्र रचयिता है. वह भयहीन है, वह सबसे समान रुप से प्रेम करता है. वह सनातन है, समय की सीमाओं से परे है. वह जीवन-मॄत्यु के चक्र से अलग है, वह स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित है. उसके दर्शन गुरु के प्रताप से ही संभव हैं. ऐसे अनादि ईश्वर का ध्यान करना चाहिये. ईश्वर आरम्भ में भी सत्य था और समय के आरम्भ के पहले भी सत्य था. वह अभी भी सत्य है और सतगुरु नानक कहते हैं कि वह सदा सत्य रहेगा.)

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बूझे लाल बुझक्कड़ – ३

अगस्त 29, 2006

लीजिये आ गये लाल बुझक्कड़ चाचा। दोपहर होते होते लाल पुछक्क्ड़ चाचा मायूस हो चले थे कि इस बार कोई बूझ ही नहीं पा रहा पहेली. हम दोनों को लगा कि प्रश्न अधिक कठिन हो गया शायद. किंतु विजय जी एक बार पुनश्च: साधुवाद के अधिकारी हैं कि उन्होंने हल खोज लिया। संजय जी तथा अनूप जी ने भी उनका समर्थन किया है. इस तरह के प्रश्नों के पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ़ इतना होता है कि हम अपने पाठकों के मन में अनुकरणीय व्यक्तियों के जीवन के प्रति उत्सुकता जगा सकें. उनको देश के ऐसे महान लोगों से परिचित करा सकें जो धीरे-धीरे इतिहास में गुम हो रहे हैं.

अब यह कहने की अवश्यकता तो रह नहीं गयी कि आपका जवाब सही है. जी हाँ, चित्र आचार्य प्रफ़ुल्ल चंद्र राय का ही है. इनका जन्म २ अगस्त, १८६१ को जैसोर जिले (वर्तमान में ‘खुलना’) के ररूली नामक गाँव में हुआ था. यह जगह अब बांग्लादेश में है। आचार्य प्रफ़ुल्ल चन्द्र रसायन शास्त्र के प्रोफ़ेसर थे. आज से ८० वर्ष पूर्व भारत में एलोपैथी की औषधियों का निर्माण नहीं होता था. यह दवाइयाँ विदेश से आयात की जाती थी. भारत के रोग-ग्रस्त लोगों को उचित दामों पर दवाई उपलब्ध भी नहीं हो पाती थी. प्रफ़ुल्ल चंद्र को यह बात स्वीकार्य नहीं थी कि विदेशी कंपनियाँ भारतीय जनता की मजबूरी पर फलें-फूलें. इसी विचार के साथ आर्थिक संकट के बावजूद उन्होनें घर पर रसायन बनाने शुरू किये. उन्होंने समस्या की आलोचना से अधिक समाधान पर ध्यान दिया और भारत में औषधि-निर्माण की नींव रखी. वर्ष १८९६ में मर्क्यूरस नाइट्राइट की खोज का श्रेय भी उन्हीं को जाता है.

श्री राय केवल एक वैज्ञानिक ही नहीं थे अपितु एक सच्चे देशभक्त भी थे. अपने छात्र-जीवन में उन्होंने सम्मानित गिलक्रिस्ट पुरु्स्कार प्राप्त किया जिसकी वजह से उन्हें इंग्लैंड में उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला. इंग्लैंड में प्रवास के दौरान श्री राय नें भारत में ब्रिटिश-राज्य की कड़ी आलोचना करी तथा ब्रिटिश सरकार को परतंत्र भारत की पीड़ा का आभास कराने के लिये प्रयत्नरत रहे. भारत लौटने के बाद श्री राय अपने कार्य तथा देश के प्रति समर्पित हो गये. अपनी आय का एक बडा हिस्सा उन्होंने सदैव ग़रीब तथा सुपात्र विद्यार्थियों की मदद, खादी के प्रचार व उत्पादन तथा विधवाओं एवं अनाथ बच्चों के उद्धार में लगाया. समाज में फैली बाल-विवाह, दहेज तथा छुआछूत जैसी कुप्रथाओं के कड़े विरोधी श्री राय ने उनके उन्मूलन के लिये यथासंभव प्रयास किये. देश में बाढ़ एवं भूकंप जैसी आपदाओं के समय पीड़ितों की सहायतार्थ धन, भोजन तथा वस्त्र जुटाने के लिये आचार्य दिन-रात जुटे रहते.

श्री प्रफ़ुल्ल चंद्र को साहित्य से भी अगाध प्रेम था. शेक्स्पियर के नाटकों से लेकर श्री रबीन्द्र नाथ टैगोर एवं मधुसूदन दत्त की अनेकों कवितायें उन्हें कंठस्थ थीं. हिंदी तथा बंगाली के अतिरिक्त संस्कृत, लैटिन, फ़्रेंच एवं इंग्लिश भाषा पर उनका खा़सा आधिपत्य था. इसी प्रकार विज्ञान के अलावा राजनीति, अर्थशास्त्र तथा इतिहास जैसे विषयों पर भी श्री राय की गहरी पकड़ थी. यहाँ तक कि स्वाध्याय से वर्ष १८९३ में श्री राय ने जीव-विज्ञान पर भी पुस्तक लिखी .

उनका व्यक्तित्व बहुआयामी होते हुए भी बेहद सादग़ी पूर्ण था. आचार्य के ७०वें जन्मदिवस पर ठाकुर रबीन्द्र नाथ टैगोर नें कहा था–“उपनिषदों में कहा गया है – ‘एक अनेक में परिवर्तित हो जाता है.’ आचार्य प्रफ़ुल्ल चन्द्र राय ने अपना जीवन अपने विद्यार्थियों के लिये समर्पित कर दिया; अब वह अनेकों के हृदयों में वास करते हैं.” जून १६, १९४२ को कलकत्ता विश्वविद्यालय के ‘यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑव़ साइंस’ के परिसर में बने छोटे से कमरे में अपने विद्यार्थियों, मित्रों तथा प्रशंसकों के बीच उनका निधन हो गया. यही छोटा सा कमरा ऐसे महान वैज्ञानिक, समाज-सुधारक और राष्ट्रभक्त की कुल संपत्ति थी और यही विद्यार्थी उनका परिवार.

आचार्य प्रफ़ुल्ल चंद्र राय का जीवन हमारे लिये प्रेरणा का स्रोत है. ऐसे महान व्यक्ति के बारे में और अधिक जानकारी आप निम्नलिखित साइटों से प्राप्त कर सकते हैं :

http://www.vigyanprasar.gov.in/scientists/pcray/PCRay.htm

http://www.vidyapatha.com/scientists/ray.php

http://www.freeindia.org/biographies/greatscientists/drpcray/index.htm

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पूछे लाल पुछक्कड़ – ३

अगस्त 27, 2006

एक बार फिर हाज़िर हैं लाल पुछक्कड़ चाचा और उनका सवाल. मगर उस से पहले आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद. आप जिस उत्साह के साथ हमारी प्रश्नोत्तरी में भाग लेते हैं, जिस प्रकार हमारा उत्साह बढ़ाते हैं वह हमें नित और बेहतर कार्य करने के लिये प्रेरित करता है.

अब जानते हैं आज का सवाल; नीचे दिया गया चित्र एक ऐसे भारतीय का है जिन्होंने अपना जीवन भारत में शिक्षा की उन्नति, औद्योगिक विकास, गरीबी के उन्मूलन,आर्थिक स्वतंत्रता, देश के राजनैतिक विकास तथा देशवासियों को रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराने के लिये समर्पित कर दिया. बताइये कौन हैं ये?

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आपकी सहायता के लिये एक छोटा सा संकेत हम दिये देते हैं — इनका संबंध विज्ञान के क्षेत्र से है तथा इनका जन्म-दिवस अगस्त माह में ही पड़ता है.

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बूझे लाल बुझक्कड़ – २

अगस्त 26, 2006

वाह! …. इस बार आपने लाल पुछक्कड़ चाचा से ही प्रश्न पूछ डाला कि ‘भइये ऐसा आसान प्रश्न क्यूँ पूछा’. अच्छा प्रश्न है वैसे. अब पुछक्कड़ भाई तो अभी नहीं हैं सो मैं ही दिये देता हूँ आपके प्रश्न का जवाब ; असल में आपके पुछक्कड़ चाचा जी ऐसे ही एक गोष्ठी में भाग ले रहे थे. अचानक किसी बात पर बाबा आमटे का नाम चाचा जी के मुँह से निकल गया और उन्हें ये जान के अत्यंत खेद हुआ कि ऐसे महान व्यकित के नाम से नयी पीढ़ी के कई होनहार युवा परिचित ही नहीं हैं. इसीलिये चाचा जी ने सोचा कि यही प्रश्न यहाँ भी किया जाये. और हम दोनों यानि लाल बुझक्कड़ और लाल पुछक्कड़ चाचा के लिये यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि हमारे पाठकों ने उन्हें निराश नहीं किया. साथ ही देखिये विजय वडनेरे जी ने प्रश्न पूछे जाने को सार्थक भी कर दिया. उन्हें नहीं पता था कि तस्वीर किसकी है किंतु प्रश्न को नज़रंदाज़ कर आगे बढ़ने की बजाय उन्होनें प्रयास कर के इसका पता लगाया. इसी क्रम में उन्हें ‘बाबा’ के बारे में जानने का भी मौका मिला होगा. हम उनके प्रयास की सराहना करते हैं. यदि हमारे लेख या प्रश्न से एक भी भारतीय का ज्ञानवर्धन हो, विचारों को एक नयी दिशा मिले, तो हमें लगता है कि हमारा प्रयास सफल हुआ.

२४ दिसंबर,१९१४ को महाराष्ट्र के वर्धा जिले में जन्मे श्री मुरलीधर देवीदास आमटे को अधिकांश लोग बाबा आमटे के नाम से ही जानते हैं. उनका जन्म एक जागीरदार परिवार में हुआ. वक़ालत की शिक्षा प्राप्त करने के बाद बाबा आमटे ने वर्धा में ही वक़ालत आरंभ करी. उनका काम काफ़ी अच्छा चल रहा था किंतु अपने आसपास फैली दरिद्रता ने एक दिन बाबा को इतना विचलित कर दिया कि उन्होंने वकालत छोड़ स्वयं को समाजसेवा के प्रति समर्पित करने का निश्चय कर लिया.

भारत के सम्मानित समाजसेवी बाबा आमटे ने अपना संपूर्ण जीवन कोढ़ पीड़ितों की सेवा व उनके पुनर्वास में लगा दिया. यहाँ तक कि उन्होंने अपने शरीर को भी कोढ़ का निदान पाने की दिशा में किये जाने वाले प्रयोगों के लिये प्रस्तुत कर दिया. महाराष्ट्र में, नागपुर के निकट आनंदवन में उनके द्वारा शुरू की गयी सामुदायिक विकास परियोजना ने कोढ़-पीड़ितों के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार और पक्षपात को मिटाने के लिये सराहनीय सफल प्रयास किये हैं. यह विश्व भर में मान्यता-प्राप्त तथा सम्मानित परियोजनाओं में एक है. बाबा आमटे ने वर्ष १९८५ में कश्मीर से कन्याकुमारी तक तथा वर्ष १९८८ में अरुणाचल प्रदेश से गुजरात तक ‘भारत जोड़ो’ आंदोलन भी चलाया जिसका उद्देश्य था देश को एकता के सूत्र में पिरोना, शांति की स्थापना तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता का प्रसार.

बाबा को जनता की सेवा के लिये वर्ष १९८५ में ‘रैमन मैग्सेसे’ पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें भारत में कोढ़-पीड़ितों तथा अन्य बहिष्कृत अपंग लोगों के पुनर्वास हेतु किये गये कार्यों के लिये दिया गया. दिसंबर २५,१९९९ को उन्हें सम्मानित ‘गाँधी शांति पुरुस्कार’ के लिये चयनित किया गया. यह पुरुस्कार उन्हें उनके अनुकरणीय कार्यों तथा ‘श्रमिक विद्यापीठ’ की संकल्पना हेतु प्रदान किया गया. इस विद्यापीठ में रोगी तथा स्वयंसेवक साथ मिलकर काम करते हैं. बाबा विभिन्न पुरुस्कारों तथा सम्मान में मिली धनराशि को ‘आनंदवन’ से जुड़े कार्यों में लगाते हैं.

बाबा की जीवन-गाथा को वर्ष २००६ में ‘रोली बुक्स’ द्वारा प्रकाशित जीवन-वृत्तांत ‘विज़्डम सॉंग: द लाइफ़ ऑव़ बाबा आमटे’ में प्रस्तुत किया गया है. इसकी लेखिका हैं निशा मीरचंदानी. आज न सिर्फ़ बाबा बल्कि उनका पूरा परिवार इस मिशन से जुड़ा हुआ है तथा समाजसेवा में लगा हुआ है। वर्तमान में जहाँ इन्सान भौतिक सुखों के वशीभूत हो केवल अपने बारे में सोचता है वहाँ बाबा और उनका परिवार हमारे सामने देशसेवा का एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करते हैं.

बाबा के जीवन,परिवार तथा कार्यों और परियोजनाओं से संबधित एक संक्षिप्त विवरण यहाँ पढ़ा जा सकता है.

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पूछे लाल पुछक्कड़ – २

अगस्त 25, 2006

ये लीजिये, आ गये लाल पुछक्कड़ चाचा अपने आसान से सवाल के साथ। नीचे दिये गये चित्र को देखिये। न..न..यह किसी साधारण वृद्ध पुरुष का चित्र नहीं है अपितु एक ऐसे व्यक्ति का चित्र है जिसका संपूर्ण जीवन हमें मानवता और परसेवा का संदेश देता है। अब ज़रा बूझिये तो कौन हैं ये?

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वैदिक विद्या : आयुर्वेद

अगस्त 23, 2006

आयुर्वेद भारतीय पारम्परिक चिकित्सा विज्ञान का एक रूप है जिसका उद्भव भारतवर्ष में क़रीब ५००० वर्ष पूर्व हुआ. यह शब्द ‘आयु:’ अर्थात् ‘जीवन’ और ‘वेद’ अर्थात् ‘ज्ञान’, के संगम से बना है अत: इसे ‘जीवन का विज्ञान’ कहा जाता है. स्वस्थ जीवन के उपायों के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा आत्मिक अनुरूपता से जुड़े चिकित्सकीय साधनों का भी विशेष उल्लेख आयुर्वेद में किया गया है. आयुर्वेद के जन्म से सम्बन्धित कोई लिखित प्रमाण नहीं मिलते किन्तु इसका आंशिक भाग अथर्ववेद  में पाया गया है अत: यह माना जाता है कि यह विद्या वेदों के समकालीन है.

कहते हैं कि यह विज्ञान स्वयं सृष्टि के जनक भगवान ब्रह्मा द्वारा रचा गया था. बाद में यह विद्या उन्होंने दक्ष प्रजापति को सिखायी और दक्ष प्रजापति से यह देवों के वैद्य अश्विनीकुमारों बंधुओं के पास गयी. तदोपरांत अश्विनीकुमारों ने इस विद्या को देवराज इंद्र के समक्ष प्रस्तुत किया. तीन महान चिकित्सक – आचार्य भारद्वाज, आचार्य कश्यप तथा आचार्य दिवोदास धन्वंतरि (चिकित्सा पद्धिति के देव), स्वयं देवराज इंद्र के शिष्य थे. इनमें से आचार्य भारद्वाज के एक कुशाग्र शिष्य हुए आचार्य अग्निवेश. सर्वप्रथम इन्होनें ही आयुर्वेद के मुख्य लिखित रूप की रचना की, जिसे आगे चल कर इनके शिष्य आचार्य चरक ने संशोधित कर पुन: प्रस्तुत किया. इस संशोधित संस्करण को आज ‘चरक संहिता’ के नाम से जाना जाता है. इसके अतिरिक्त आचार्य कश्यप ने बाल चिकित्सा के ऊपर एक ग्रन्थ लिखा जो आज आंशिक रूप में ‘कश्यप संहिता’ के नाम से उपलब्ध है.

आचार्य धन्वंतरि के शिष्य हुये आचार्य सुश्रुत, जिन्होनें गुरू से पृथक होने के पश्चात ‘सुश्रुत संहिता’ की रचना की जिसे शल्य चिकित्सा, नेत्र-नासिका-कंठ चिकित्सा तथा नेत्र-विज्ञान का महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है. ‘चरक संहिता’, ‘सुश्रुत संहिता’ तथा ‘वाग्भट्ट’ द्वारा लिखित ‘अष्टांग हृदय’, इन तीनों प्राचीन पुस्तकों को सम्मिलित रूप से ‘बृहत्-त्रयी’ के नाम से जाना जाता है और यह वर्तमान में आयुर्वेदिक विद्या का सर्वाधिक महत्वपूर्ण संकलन है.

इसी प्रकार विभिन्न रोगों की पहचान, विभिन्न जड़ी-बूटियों, खनिजों, क्वाथ, चूर्ण, आसव, अरिष्ट इत्यादि के संविन्यास से जुड़ी सभी जानकारियाँ क्रमश: ‘माधव निदान’, ‘भव प्रकाश निघन्तु’ और ‘श्रृंगधर संहिता’ में मिलती हैं जिन्हें संयुक्त रूप से ‘लघु्त्-त्रयी’ के नाम से जाना जाता है.

माना जाता है कि वैदिक काल से अब तक आयुर्वेद के क्षेत्र में निरंतर विकास हुआ है. बौद्ध काल में नागार्जुन, सुरानंद, नागबोधि, यशोधन, नित्यनाथ, गोविंद, अनंतदेव एवं वाग्भट्ट आदि महान वैद्य हुए जिन्होनें आयुर्वेद के क्षेत्र में विभिन्न नये एवं सफल प्रयोग किये. इस काल में आयुर्वेद ने प्रगति का चरम देखा. इसी कारण बौद्ध काल को आयुर्वेद का स्वर्णयुग भी माना जाता रहा है.

समय के आधुनिकीकरण के साथ आयुर्वेद का प्रयोग भले ही कम हुआ किंतु भारत ने अपनी इस विद्या को मिटने नहीं दिया. और आज एक बार पुन: आयुर्वेद पश्चिमी चिकित्सा शैली को चुनौती दे रहा है. वस्तुत: उद्देश्य किसी एक विद्या का आधिपत्य स्थापित करना नहीं है, उद्देश्य है विश्व में आरोग्य की स्थापना, साधारण जन मानस के लिये असाध्य रोगों की भी सुलभ और अल्पव्ययी चिकित्सा पद्धिति उपलब्ध कराना.

उम्मीद है कि उपरोक्त तथ्यों से आपको भारत में जन्मी एक महाविद्या के बारे में कुछ आधारभूत जानकारी मिली होगी. हमारा प्रयास रहेगा की इसी क्रम में अधिक से अधिक रोचक व महत्वपूर्ण जानकारी आप तक पहुँचा सकें.

साभार: विकिपीडिया पर आयुर्वेद का पृष्ठ, यूरोपियन अकेडमी ऑफ़ वैदिक साइंसेज़

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बूझे लाल बुझक्कड़ – १

अगस्त 22, 2006

हमारी इस श्रृंखला का जिस उत्साह से आपने स्वागत किया, उसके लिये आपका हार्दिक धन्यवाद. लाल बुझक्कड़ चाचा को यह देख कर भी बेहद खु़शी हुई कि संजय जी ने बिलकुल सही जवाब दिया कि यह मानचित्र नागरिक अधिकारों की स्थिति को दर्शाता है. वैसे अधिकांश लोगों के जवाब करीब करीब सही हैं क्योंकि लोकतांत्रिक देशों में नागरिकों की स्वतंत्रता का स्तर और राजनैतिक अधिकारों कि स्थिति कुछ बेहतर है.

हमारे विचार से लोकतंत्र का अर्थ भी अलग-अलग देशों में अलग-अलग होता है, जैसे भारत का लोकतंत्र रूस या संयुक्त राज्य अमेरिका के लोकतंत्र से भिन्न है क्योंकि व्यवहारिक रूप से भारत में राष्ट्रपति से अधिक अधिकार देश की संसद को प्राप्त हैं. वैसे कुछ देशों की शासन प्रणाली लगभग भारत की ही तरह लोकतांत्रिक है पर वहां नागरिक अधिकारों की स्थिति बेहद खराब है, जैसे इराक.

यह मानचित्र ‘फ़्रीडम हाउस’ द्वारा वर्ष २००६ में, वर्ष २००५ की विश्व की नागरिक स्वतंत्रता स्थिति पर किये गये सर्वेक्षण के परिणामों को प्रदर्शित करता है. इसमें नीले रंग से प्रदर्शित देशों में नागरिक अधिकारों कि स्थिति सबसे अच्छी है और लाल रंग से प्रदर्शित देशों में सबसे खराब. ‘फ़्रीडम हाउस’ संस्था का प्रमुख उद्देश्य है विश्व में उदारपंथी लोकतंत्र को बढ़ावा देना. विश्व के प्रत्येक देश में नागरिक स्वतंत्रता की दशा के ऊपर निकलने वाली वार्षिक रिपोर्ट के लिये इस संस्था को विशेष रूप से जाना जाता है. इस रिपोर्ट के द्वारा यह संस्था विश्व के प्रत्येक राष्ट्र में नागरिक व राजनैतिक अधिकारों की दशा का आंकलन करने का प्रयास करती है.

साभार: विकिपीडिया पर फ़्रीडम हाउस का पृष्ठ