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आकाश छू लो वायु सैनिकों !

October 8, 2006

आज भारतीय वायु सेना का पिचहत्तरवां जन्मदिवस है. हमारी वायु सेना विश्व की चार सबसे बड़ी वायु सेनाओं में से एक है. समय चाहे युद्ध का हो या शान्ति का, हमारी सेनायें सदैव अपना शौर्य और पराक्रम प्रदर्शित करती रही हैं. आज हमारे पास विश्व के सर्वश्रष्ठ लड़ाकू यान हैं – जागुआर, सुखोई और मिग के कई स्वरूप, और कुछ समय बाद हमारा अपना तेजस भी वायु सेना की शोभा बढ़ायेगा.

इस बार वायु सेना दिवस के आयोजन का प्रमुख स्थल था हिन्डन, ग़ाज़ियाबाद स्थित वायु सेना का अड्डा. इस समारोह ऐसा में बहुत कुछ था जो पहली बार हुआ. यह विश्व में पहला मौका था जब किसी देश की वायु सेना के प्रमुख सीधे वायु मार्ग से ही किसी समारोह में उतरे हों. जी हाँ, ६१ वर्षीय एयर चीफ़ मार्शल शशीन्द्र पाल त्यागी कोई कार या जीप नहीं, बल्कि एक पैराशूट लेकर समारोह में उपस्थित हुए!

परेड तो होनी ही थी, उसके बाद अपनी ही तरह की पहली (संगीतमय) ड्रिल परेड भी हुई. इसमें वायु सेना के जवानों का अद्भुत सामंजस्य देखते ही बनता था. सुखोई और मिग विमानों की कलाबाज़ियाँ दिखाकर हमारे विश्वस्तरीय चालकों ने सबका मन मोह लिया. इस समारोह में पहली बार सारंग दल के चार हेलीकाप्टरों ने एक साथ हवा में करतब दिखाये. ध्यान देने योग्य बात यह है कि हेलीकाप्टरों से इस प्रकार के करतब दिखाना बहुत कठिन कार्य होता है और इसके लिये कड़ी मेहनत और योग्यता की आवश्यकता होती है. विश्व में सारंग के अलावा केवल दो ही ऐसे दल हैं जो इस प्रकार का प्रदर्शन करने में सक्षम हैं! कार्यक्रम में इसके अलावा युद्ध में घायल सैनिकों को तत्परता के साथ सुरक्षित स्थान तक ले जाने की कार्यवाही का भी प्रदर्शन किया गया.

अंत में सूर्य-किरण दल ने भी आकाश में गोते लगाते हुए अलग अलग आकारों में तिरंगे को उकेरा.

इन सब से हमें न केवल गर्व की अनुभूति होती है, बल्कि देशवासियों में सुरक्षा की भावना भी आती है. हम कामना करते है कि हमारी वायु सेना सारी सीमायें लांघकर आकाश को छू ले, जैसा कि वायु सेना का आदर्श वाक्य है, और भगवद् गीता के ग्यारहवें अध्याय के चौबीसवें श्लोक की आरम्भिक पंक्तियाँ भी – नभ: स्पर्शं दीप्तम्.

अगर आप दूरदर्शन पर इस कार्यक्रम को न देख पाये हों तो यहाँ अवश्य देखिये, पूरे दो घण्टे तक मंत्रमुग्ध कर देने वाला एक जादू!

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बूझे लाल बुझक्कड़ – ७

October 7, 2006

लगता है पुछक्कड़ चाचा को अब कठिन सवाल पूछने होंगे. विनय भाई ने शुरुआत की तो फिर आशीष भाई हों, बेंगाणी बन्धु हों या शुएब भाई, सबने उनका समर्थन कर दिया. पुछक्कड़ चाचा को लग रहा होगा कि किसी को तो सिर खुजाना पड़ेगा, पर नहीं. सो आप सबको बधाई. मैं अभी जाकर पुछक्कड़ की भी खबर लेता हूँ.

जैसा कि आप लोगों ने बताया – सौराष्ट्र, हैदराबाद, मैसूर, पटियाला, ट्रावनकोर, इन्दौर, बीकानेर और जयपुर, ये सब भारत के वे इलाके हैं जिनके नाम पर भारतीय स्टेट बैंक से संबद्ध बैंकें हैं, जैसे स्टेट बैंक ऑफ़ सौराष्ट्र, स्टेट बैंक ऑफ़ इन्दौर इत्यादि. आजादी से पहले ये सब इलाके रियासत हुआ करते थे, और यहाँ अपनी-अपनी बैंकें थी. इन छोटी-छोटी बैंकों की पहुँच रियासतों की क्षेत्रीय जनता में बहुत थी. प्रथम पंचवर्षीय योजना में ग्रामीण विकास को ध्यान में रखते हुए इन सभी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर इन्हें स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया से संबद्ध किया गया. हालांकि इन सब बैंकों का प्रतीक-चिह्न स्टेट बैंक जैसा ही है, पर इनकी अपनी-अपनी अलग पहचान भी है.

स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया के इतिहास में झाँके तो इसकी शुरुआत हुई थी ठीक २०० साल पहले यानि सन् १८०६ में बैंक ऑफ़ कलकत्ता के रूप में. बाद में बैंक ऑफ़ मद्रास और बैंक ऑफ़ बौम्बे भी बनीं और बहुत बाद में जाकर इन तीनों को मिलाकर एक बड़ी बैंक बनायी गयी जिसको नाम दिया गया – इम्पीरियल बैंक ऑफ़ इण्डिया. इम्पीरियल बैंक को आज़ादी से पहले मुद्रा छापने का अधिकार होता था. आज़ादी के बाद भी सन् १९५५ तक यह अधिकार इम्पीरियल बैंक के पास सुरक्षित रहा. उसके बाद भारतीय रिज़र्व बैंक को यह अधिकार दिया गया और इम्पीरियल बैंक बन गयी स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया या भारतीय स्टेट बैंक.

शाखाओं की संख्या की दृष्टि से देखें या कर्मचारियों संख्या की दृष्टि से, आज भारतीय स्टेट बैंक दुनियाँ की सबसे बड़ी बैंक है, जिसका पिछले वर्ष कुल राजस्व था ६०० अरब रुपये से भी अधिक! अब पैसे इतने खनक ही रहे हैं तो याद दिला दिया जाय कि सिक्कों के प्रचलन में भी भारत सदियों से अग्रणी रहा है. हमारे यहाँ ६५० ई.पू. में ही सोने और चाँदी के सिक्के बनना शुरु हो गये थे! खैर, यह चर्चा फिर कभी.

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पूछे लाल पुछक्कड़ – ७

October 6, 2006

लीजिये, पुछक्कड़ चाचा फिर आ गये अपना एक सवाल लेकर. आपको कुछ भारतीय शहरों के नाम दिये जा रहे हैं:

कलकत्ता, सौराष्ट्र, हैदराबाद, मैसूर, पटियाला, ट्रावनकोर, इन्दौर, बीकानेर और जयपुर.

तो इसमें उत्तर भारत के शहर भी आ गये, मध्य भारत, दक्षिणी और पश्चिमी भारत के भी. पर ये क्या, पूर्वी भारत के तो रह ही गये! वैसे शुरुआत कलकत्ता से ही कर देते तो भी बुरा नहीं था क्योंकि हमारे इस प्रश्न के उत्तर की शुरुआत तो कलकत्ता में ही हुई थी. अरे, प्रश्न तो पूछ लें पहले! तो सवाल है कि भारत में वह कौन सी चीज़ है जो इन सब शहरों को जोड़ती है? देखिये, शराफ़त से बता दे रहे हैं कि यह कोई सड़क-वड़क नहीं है, बल्कि एक संस्था है, बड़ी, बहुत बड़ी. सोचिये सोचिये.

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संभावनाओं के द्वार

October 3, 2006

मुझे अभी भी वे दिन अच्छी तरह से याद हैं. मैं छोटा था और मेरे रिश्ते के कुछ भाई-बहन अमरीका और यूरोप में अपनी पढ़ाई करने गये थे. जब भी वे वापस भारत आते तो अपने संग न जाने कितने किस्से कहानियाँ लाते. बाहर की दुनियाँ के किस्से मैं बड़े चाव से सुनता था. वे कहते थे कि मैं भी बड़ा होकर इन बड़े-बड़े देशों में घूमूँगा. उन्होंने मुझे यह भी बताया कि भारत अमरीका-यूरोप से ५० साल पीछे है और यहां अवसरों की बहुत कमी है.

संयोगवश मैं भी यूरोप आया और मुझे यहाँ ऐसा कुछ विशेष नहीं लगा जो कि मेरे बचपन की कल्पना से मेल खाता. मुझे समझ नहीं आया कि यहाँ भारत के किसी भी आधुनिक शहर के मुकाबले ऐसा क्या खास है? मैंने अपनी बहन से फोन पर पूछा तो उन्होंने कहा, “किड्डू, हम तो वहाँ १५ साल पहले थे, और अब ज़माना बदल रहा है. भारत में भी कई बदलाव हो रहे हैं, और अच्छे के लिये हो रहे हैं.” बाद में एक कम्प्यूटर पत्रिका के लिये साक्षात्कार देते समय मैंने अपनी बहन के ये शब्द पत्रकार के सामने भी रखे. आज भारत बदल चुका है और यहाँ अवसरों की कोई कमी नहीं है. यह बात आई.बी.ई.एफ़. के द्वारा स्थापित संगठन ‘इण्डिया ऐवरीव्हेयर´ ने लगभग छ: महीने पहले डावोस, स्विट्ज़रलैण्ड में विश्व आर्थिक मंच में स्पष्ट रूप से कही है. भारत में वह सब कुछ है जो इसको २०२० तक विकसित देशों की सूची में ला खड़ा करेगा. आज स्थिति यह है कि यदि कोई व्यक्ति अथवा संस्था अपनी पूजी लगाकर पूरी संतुष्टि चाहता है तो भारत में निवेश करता है अथवा किसी भारतीय कंपनी की सेवायें लेता है. मौके का लाभ उठाकर मैंने भी अभी हाल में ही अपने एक मित्र के साथ मिलकर एक IT/ITES कंपनी शुरु कर दी है. मैं ऐसा साहस इसीलिये कर सका कि मुझको भारत की अर्थव्यवस्था पर पूरा भरोसा है.

कोई भी क्षेत्र हो, IT/ITES, बायोटेक, दवा, अंतरिक्ष, विज्ञान, फ़ैशन, बैंकिंग अथवा वित्त, सभी में भारतीय लोगों ने कठिन परिश्रम कर अपनी एक पहचान बनाई है. न सिर्फ़ बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, बल्कि छोटी कंपनियाँ और हम जैसे व्यक्ति भी इस तथ्य को समझ पा रहे हैं और इसका लाभ उठाकर स्वयं को और अपने देश को कुछ दे पा रहे हैं. मैककिंजी के माइकल फ़र्नांडीज़ के अनुसार भारत में फुटकर बाज़ार की कीमत अगले ५-६ बर्षों में करीब ५०० अरब अमरीकी डालर हो जायेगी. अब कौन ऐसा मौका गंवाना चाहेगा! द्वार सबके लिये खुले हैं.

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हम करें राष्ट्र आराधन

October 1, 2006

एक गीत की धुन से पूरा सभागार गूँज रहा है. इस जोशीले देशभक्ति गीत ने सबके पैरों को थिरकने पर मजबूर कर दिया है. शब्दों के साथ-साथ संगीत भी मंत्रमुग्ध कर देने वाला है. गीत के बोल हैं – हम करें राष्ट्र आराधन.

यह गीत ९० के दशक के दूरदर्शन धारावाहिक ‘चाणक्य’ का प्रमुख गीत था. चाणक्य भारत के अग्रणी राजनैतिक विचारकों में से एक थे. फिर भी उनके बारे में अधिक लिखित सामग्री उपलब्ध नहीं है. इस धारावाहिक ने उनके जैसे महान व्यक्ति का जीवन-चित्र प्रस्तुत कर एक सराहनीय कार्य किया. भारत के बाहर लोग चाणक्य के बारे में बहुत कम ही जानते हैं जबकि मैकियावेली जैसे दूसरे देशों के राजनैतिक विचारक सुविख्यात हैं.
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चाणक्य या कहें कि विष्णुगुप्त अथवा कौटिल्य, ने तक्षशिला विश्वविद्यालय में वेदों का गहन अध्ययन किया. क्या यह गौरव का विषय नहीं कि दुनियाँ के सबसे पुराने विश्वविद्यालय, तक्षशिला और नालन्दा भारतीय उपमहाद्वीप में थे. और हाँ, ध्यान देने योग्य बात यह है कि हम ५०० से ४०० वर्ष ईसा पूर्व की बात कर रहे हैं. तक्षशिला एक सुस्थापित शिक्षण संस्थान था और माना जाता है कि पाणिनी ने संस्कृत व्याकरण की रचना यहीं की थी. चाणक्य भी बाद में यहाँ नीतिशास्त्र के व्याख्याता हुए (कुशाग्र छात्र, है न!). ऐसा कहा जाता है कि वे व्यवहारिक उदाहरणों से पढ़ाते थे. यूनानी लोगों के तक्षशिला पर चढ़ाई करने कारण से वहाँ एक राजनैतिक उथल-पुथल मच गयी और चाणक्य को मगध में आकर बसना पड़ा. उन्हें नि:संदेह एक राजा के निर्माता के रूप में अधिक जाना जाता है. चंद्रगुप्त मौर्य विशेष रूप से उनकी सलाह मानते थे. शत्रुओं की कमज़ोरी को पहचाकर उसे अपने काम में लाने की विशिष्ट प्रतिभा के चलते चाणक्य हमेशा अपने शत्रुओं पर हावी रहे. उन्होंने तीन पुस्तकों की रचना की- ‘अर्थशास्त्र‘, ‘नीतिशास्त्र’ तथा ‘चाणक्य नीति’. ‘नीतिशास्त्र’ में भारतीय जीवन के तौर-तरीकों का विवरण है तो ‘चाणक्य नीति’ में उन विचारों का लेखा-जोखा है जिनमें चाणक्य विश्वास करते थे और जिनका वे पालन करते थे.

राष्ट्रीय नीतियों, रणनीतियों तथा विदेशी संबंधो पर लिखी गई ‘अर्थशास्त्र’ उनकी सर्वाधिक विख्यात पुस्तक है. प्रबंधन की दृष्टि से एक राजा तथा प्रशासन की भूमिका तथा कर्तव्यों को यह पुस्तक स्पष्ट करती है. यह पुस्तक एक राज्य के सफल संचालन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती है. उदाहरण के लिये यह न सिर्फ़ आपदाओं तथा अनाचारों से निपटने की राह बताती है बल्कि अनुशासन तथा नीति-निर्धारण के तरीकों का भी उल्लेख करती है. इसी विषय पर लिखी एक और पुस्तक है ‘द प्रिंस‘ जो कि मैकियावेली द्वारा रचित है, हालांकि विषय समान होते हुए भी यह पुस्तक चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ से सर्वथा भिन्न है. मैकियावेली पन्द्रहवीं शताब्दी के इतालवी राजनैतिक दार्शनिक थे. अपनी सत्ता को का़यम रखने के लिये एक महत्वाकांक्षी उत्तराधिकारी को क्या नीतियाँ अपनानी चाहिये, उनकी किताब इसी विषय पर केंद्रित है. उनके विचार अतिवादी माने जाते हैं क्योंकि उनके मतानुसार तानाशाही राज्य में स्थिरता बनाये रखने का सर्वोत्कृष्ट मार्ग है. शक्ति तथा सत्ता प्राप्ति को उन्होंने नैतिकता से भी महत्वपूर्ण माना है. लगभग २००० वर्षों के अंतराल वाली इन दो कृतियों की तुलना करना बेहद रोचक है.

दुनियाँ मुख्यत: मैकियावेली को ही जानती है. भारतीय होने के नाते हम कम से कम इतना तो ही कर ही सकते है कि सर झुका कर उस महान शख्सियत को नमन करें जिसका नाम था-चाणक्य.

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रोशनी के घेरे

September 21, 2006

कभी बचपन में स्कूल में श्रीमती सरोजिनी नायडू की एक कविता पढ़ी थी- ‘द बैंगिल सैलर्ज़‘. यह गीतात्मक कविता पढ़ हृदय में कितने ही भाव हिलोरें लेने लगते हैं. चूड़ियाँ मानों भारतीय नारी की चिरसखी हैं, यह बात ये कविता सहज ढंग से कह जाती है. चूड़ियों के इन्द्रधनुषी रंगो से सजा कल्पनालोक, उनकी मधुर खनक, चूड़ी वाले की टेर पर चूड़ी खरीदने घर से बाहर की ओर दौड़ती स्त्रियां, छोटी बच्चियों जैसे उत्साह के साथ रंग पसंद करती और तरह-तरह की चूड़ियों की तुलना करती स्त्रियां – ये सारे चित्र इस कविता के साथ मानो सजीव हो जाते हैं और कानों में गूँज उठते हैं मोलभाव में लगे उत्साहित मधुर स्वर. भारत के शहरों, गाँवों और आस-पड़ोस में यह दृश्य आम है. एक दृश्य, जिसकी कल्पना मात्र से ही मन भाव-विभोर हो उठता है. कितना अद्भुत है न, चूड़ी जैसी साधारण वस्तु कैसी प्रसन्नता का कारण बनती है!

मेरी माँ की चूडि़यों की खनक मात्र एक ध्वनि नहीं थी अपितु मेरी माँ का संपूर्ण अस्तित्व था. मुझे याद आते हैं वे दिन जब मैं उन चूड़ियों की खनक से उठा करती थी. चूड़ियाँ, जो माँ के काम करते, हमारे लिये नाश्ता बनाते, हमें स्कूल के लिये तैयार करते बस यूँ ही बोल उठती थीं. जब कभी माँ कहीं बाहर जातीं तो उनके घर मे आने से पूर्व ही उन चूड़ियों की ध्वनि मुझे उनकी आहट दे जाती. जब कभी माँ मेरी नज़रों से ओझल हो किसी पड़ोसी से बात कर रही होतीं तब मैं इस आवाज़ से उनकी उपस्थिति को महसूस कर लेती. ये माँ की चूडि़याँ ही थीं जिनकी खामोशी ने मुझसे अक्सर वह सब कहा जो माँ कभी किसी से न कह सकीं. काँच के ये घेरे हर उस दौर के प्रतीक हैं जिनसे मेरी माँ कभी गुज़रीं.

चूड़ियाँ हर लड़की को आह्लादित करती हैं. मुझे याद है बचपन में एक बार जब मैनें चमकीली गुलाबी चूड़ियाँ पहनी थी. मैं उन्हें स्कूल भी पहन के गयी थी, दोस्तों को दिखाने के लिये. काँच की चूडियाँ भारत के कई भागों में विवाहित स्त्रियों द्वारा विवाह के पवित्र बंधन के प्रतीक के रूप में पहनी जाती हैं. हाँ, क्षेत्रों के अनुसार रंगों में विविधता पायी जाती है. प्रत्येक क्षेत्र की अलग परम्परा है और चूड़ियों का रंग व प्रकार उसी पर निर्भर करता है. उदाहरण के लिये महाराष्ट्र में विवाहित स्त्रियाँ हरे रंग की चूड़ियाँ पहनती हैं तो बंगाल व उड़ीसा में सीप की बनी सफ़ेद चूड़ियों को चटख़ लाल चूड़ियों के साथ मिलाकर पहना जाता है.

भारत में काँच का सर्वाधिक सामान आगरा के निकट फ़िरोज़ाबाद नामक छोटे से शहर में बनाया जाता है. इस शहर के अधिकांश लोग काँच के किसी न किसी सामान के निर्माण से जुड़े उद्यम में लगे हैं. सबसे अधिक काँच की चूड़ियों का निर्माण इसी शहर में होता है. रंगीन काँच को गलाने के बाद उसे खींच कर तार के समान बनाया जाता है और एक बेलनाकार ढाँचे पर कुंडली के आकार में लपेटा जाता है. स्प्रिंग के समान दिखने वाली इस संरचना को काट कर खुले सिरों वाली चूड़ियाँ तैयार कर ली जातीं हैं. अब इन खुले सिरों वाली चूड़ियों के विधिपूर्वक न सिर्फ़ ये सिरे जोड़े जाते हैं बल्कि चूड़ियाँ एकरूप भी की जाती हैं ताकि जुड़े सिरों पर काँच का कोई टुकड़ा निकला न रह जाये. यह एक धीमी प्रक्रिया है जिसमें काँच को गर्म व ठण्डा करना पड़ता है. कितनी विस्मयकारी बात है न कि किसी नारी की कलाइयों की शोभा बनने से पहले ये चूड़ियाँ कितने हाथों से गुज़रती हैं!

आन्ध्रप्रदेश का हैदराबाद शहर भी अपनी चूड़ियों के लिये विख्यात है. चारमीनार के चारों ओर कतारों में लगी अनेक दुकानें चूड़ियों की चकाचौंध से जगमगाती रहती हैं. यहाँ काँच की चूड़ियों के विविध प्रकार मिलते तो मिलते ही हैं, साथ ही मिलती हैं रत्न-जड़ित चूड़ियाँ, धातु से बनी चूड़ियाँ, सर्पाकार चूड़ियाँ, शीशा-जड़ित चूड़ियाँ, सादी चूड़ियाँ, विभूषित चूड़ियाँ, पतली नाज़ुक चूड़ियाँ और चौकोर तथा तिकोने जैसे अनोखे आकार की चूड़ियाँ. दूर-दराज़ और आस-पास दोनों ही जगहों से इन चूड़ियों की ख़रीदारी के लिये लोगों की भारी भीड़ जुटती है.

भारतीय नारियों के द्वारा चूड़ियों का पहना जाना एक लम्बे अरसे से चला आ रहा है. मोहनजोदड़ो से मिले अवशेष इस प्राचीन परम्परा की पुष्टि करते हैं. विशेष ध्यान देने योग्य है कि हालांकि अन्य सभ्यताओं में भी चूड़ियाँ पहनी जाती रही हैं किन्तु भारत में मुख्यत: विवाह के अवसर से जुड़ी यह एक महत्वपूर्ण परम्‍परा बन गई है. आज भी चूड़ियों को उसी उल्लास और ललक के साथ पहना जाता है जैसा कि पहले. यह अलग बात है कि शहरों, विशेषत: महानगरों में इस परम्परा के ह्रास के चिह्न देखे जा सकते हैं. नारियों की कलाइयों की शोभा बढ़ाते ये चमकीले घेरे एक आभूषण मात्र नहीं हैं. इनकी छोटी सी परिधि में भारतीय स्त्री के सुख-दु:ख तथा धैर्य सिमटे हैं, उसकी आशायें बंधी हैं.

सम्बन्धित कड़ी: सर्फ़-इण्डिया पर विभिन्न प्रकार की चूड़ियों की जानकारी

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बूझे लाल बुझक्कड़ – ६

September 19, 2006

भई वाह! इस बार तो आप लोगों ने १००% सही जवाब दिया. बुझक्कड़ चाचा खुश हुए. इनाम में आप सबको मिलती है- उनकी शाबाशी! जी हाँ, यह भारतीय युद्ध कला कलरिप्पयट् ही है जो अपनी तरह की विश्व की सबसे पुरानी विद्या है.

इस विद्या का अभ्यास केरल तथा उससे लगे तमिलनाडु और कर्नाटक में प्रचलित है. इसके अंतर्गत पटकना, पद-प्रहार, कुश्ती तथा हथियार बनाने के प्रशिक्षण के साथ उपचार की विधियाँ भी सिखाई जाती हैं. कलरिप्पयट् शब्द कलरि अर्थात विद्यालय तथा पयट्ट (जो पयट्टुका से बना है) अर्थात ‘युद्ध करना’ से मिल कर बना है. तमिल में इन दोनों शब्दों को मिलाने से जो अर्थ निकलता है वह है-’सामरिक कलाओं का अभ्यास’.

कलरिप्पयट् का उद्भव बारहवीं शताब्दी ई.पू. का माना जाता है परंतु यह कला उससे पूर्व या बाद की भी हो सकती है. इसका जन्म केरल या आसपास के क्षेत्रों में हुआ था. इतिहासकार श्री एलमकुलम कुंजन पिल्लई के अनुसार इस कला का विकास ग्यारहवीं शताब्दी ई.पू. में चेर और चोल राजाओं के शासनकाल में युद्ध के अधिक महत्व के कारण हुआ होगा. कुछ शताब्दियों से इसके दक्षिण भारतीय स्वरूप (जो खुले हाथों से युद्ध पर अधिक बल देता है) का अभ्यास मुख्यतः तमिलभाषी क्षेत्रों में होता है.

कहते हैं कि चीनी और जापानी सामरिक कलाओं का जन्म भारतीय सामरिक कलाओं से ही हुआ जो बोधिसत्वों के द्वारा प्रचलित की गयीं. यह भी माना जाता है कि ये भारतीय कलायें कलरिप्पयट् ही थीं, किंतु यह एक विवादित विषय है. कुछ लोग इसके पक्ष में है तो कुछ विरोध में. १९वीं सदी में ब्रितानी साम्राज्य की स्थापना के बाद यह कला धीरे धीरे गुम होने लगी. किंतु सन १९२० में पूरे दक्षिण भारत में पारंपरिक कलाओं को जीवंत करने की एक लहर उठी जिसके चलते तेल्लीचेरी में कलरिप्पयट् को पुनर्जीवन मिला. उसके बाद सन् १९७० तक विश्व स्तर पर सामरिक कलाओं के प्रति रुझान देखा गया और यही रुझान इस कला के विकास का कारण रहा. आधुनिक समय में कुछ अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्मों के ज़रिये इसका प्रसार करने का प्रयास किया जाता रहा है. साथ ही कुछ नृत्य प्रशिक्षण केन्द्र व्यायाम के तौर पर इसका अभ्यास करते हैं

कलरिप्पयट् के तीन स्वरूप हैं- दक्षिण भारतीय, उत्तर भारतीय और मध्य भारतीय. लगभग सात वर्ष की छोटी उम्र से ही इच्छुक विद्यार्थी को गुरुकुल में प्रशिक्षित करना शुरू कर देते हैं. यथावत विधि-विधान के साथ शिष्य गुरु से दीक्षा लेता है. इस प्रशिक्षण के चार मुख्य अंग हैं- मीतरी, कोलतरी, अनकतरी, और वेरमकई. इनके साथ मर्म तथा मालिश का ज्ञान भी दिया जाता है. मर्म के ज्ञाता अपने शत्रुओं के मर्म के स्पर्श मात्र से उनके प्राण ले सकते हैं अत: यह कला धैर्यवान तथा समझदार लोगों को ही सिखाई जाती है.

कलरिप्पयट् का प्रभाव केरल की सांस्कृतिक कलाओं पर भी साफ़ दिखता है जिनमें कथकली मुख्य है. कई कलाओं तथा नृत्यों जैसे कथकली, कोलकली एवं वेलकली आदि ने अपने विकास के दौरान कलरिप्पयट्ट से ही प्रेरणा ली है. कितना अद्भुत है ना… कहाँ युद्ध विद्या और कहाँ नृत्य कला. किंतु ऐसी विविधता में एकता ही तो है हमारे भारत की पहचान!

सम्बन्धित कड़ियाँ: विकिपीडिया पर कलरिप्पयट् का पॄष्, कलरिप्पयट् सीखनी है? – अवश्य, यह लीजिये!

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पूछे लाल पुछक्कड़ – ६

September 17, 2006

तो हाज़िर हैं पुछक्कड़ चाचा अपने एक नये सवाल के साथ. आज आपको बूझना है कि नीचे दी गयी तस्वीर में क्या चल रहा है.

दो लोग तलवार लेकर युद्ध कर रहे है, यह तो सबको दिख ही रहा है. कुछ और हो तो जरूर बताइये. आखिर ऐसा क्या है इस तस्वीर में जो पुछक्कड़ चाचा आपको दिखा रहे हैं? तलवार लेकर कोई इतनी ऊँची छलांग लगा जाये तो उसको तो हम कलाकारी ही कहेंगे, पर आपका क्या कहना है?

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चमत्कार कचरे का : ऊर्जा (भाग ३)

September 14, 2006

बात है कुछ साल-डेढ़ साल पहले की. हम और हमारी पत्नीजी कोलकाता से मुम्बई आ रहे थे. गीतांजलि एक्सप्रेस का वातानुकूलित डिब्बा, और हमारी सामने वाली सीट पर एक सज्जन और उनकी पत्नीजी आकर विराजमान हुए. महोदय लगभग ४५ से ५० साल की उम्र के होंगे, महोदया विदेशी थीं. थोडी ही देर मे ज्ञात हुआ के महोदय मध्य-पूर्व के किसी देश में अभियन्ता के रूप में कार्यरत हैं, खुशी की बात है! थोड़ी देर मे चायवाला आया. महोदय ने चाय की एक प्याली खरीदी और अपनी पत्नी को देने लगे ज्ञान, “देखो कितनी सहूलियत है, चाय पियो और खाली प्याली फेंक दो. प्लास्टिक जैसी सस्ती चीज़ छोड़कर हमारे रेलवे मंत्री कहते हैं कि मिट्टी के कुल्हड़ इस्तेमाल करो.” अब कुल्हड़ कितने काम की चीज़ है यह विवाद फिर कभी. लेकिन सोचिये यह कि “यूज़ एण्ड थ्रो” वाली आदत हमें किस कदर संकट में डाल सकती है!

सन २००३-०४ में भारत में लगभग ४२ लाख टन प्लास्टिक का इस्तेमाल हुआ. सन २०१० तक यही आंकडा १२५ लाख टन हो जायेगा और भारत दुनियाँ का तीसरा सबसे ज्यादा प्लास्टिक इस्तेमाल करने वाला देश बन जायेगा. और हम लोग इस प्लास्टिक को इस्तेमाल करके, जैसा कि उन सज्जन ने भी कहा, फेंक देंगे. फिर चाहें वह जाकर नदी नालों में अवरोध पैदा करे, गाय भैंसों के पेट में जाकर उन्हें मारता रहे. अब कई राज्य सरकारों ने प्लास्टिक की थैलियों पर पाबंदी लगादी है लेकिन फिर भी प्लास्टिक अलग-अलग रूप में इस्तेमाल तो होगा ही और हमारे भविष्य के लिये खतरा बनेगा. किसी भी प्लास्टिक को प्राकृतिक रूप से विघटित होने के लिये लगभग १० लाख साल तक लग सकते है. यह समस्या सिर्फ़ हमारे देश की ही नहीं है, सारी दुनियाँ इससे परेशान है.

अच्छी खबर ये है कि इस समस्या का समाधान हमारे देश की एक महिला वैज्ञानिक ने ढूंढ निकाला है. नागपुर, महाराष्ट्र के एक इंजीनियरिंग महाविद्यालय की प्राध्यापिका श्रीमती अलका झाडगांवकर ने एक ऐसी प्रणाली की खोज की है जिससे प्लास्टिक को ईंधन मे परिवर्तित किया जा सकता है. वैसे तो प्लास्टिक का निर्माण पेट्रोलियम मतलब खनिज तेल से ही होता है लेकिन उसे फिर से खनिज तेल में परिवर्तित करना बडा़ ही मुश्किल और महंगा काम होता है. लेकिन यह नयी प्रक्रिया दुनियाँ की सबसे पहली प्रक्रिया है जिसमें किसी भी प्रकार की प्लास्टिक बिना किसी साफ़ सफ़ाई के सुरक्षित ढंग से इस्तेमाल की जा सकती है और वह भी व्यावसायिक रुप से! प्रो. झाडगांवकर के अनुसार, औसतन ९.५० रु. की लागत से १ किलोग्राम प्लास्टिक से ०.६ लिटर पेट्रोल, ०.३ लिटर डीज़ल व ०.१ लिटर दूसरे प्रकार के तेल का निर्माण किया जा सकता है जिसकी कीमत लगभग ३१.६५ रु. है.

इन सब चीज़ों से भी महत्वपूर्ण बात ये कि प्रो. झाडगांवकर की यह खोज सिर्फ़ एक तज़ुर्बा बन कर ही नहीं रही, उसके व्यावसयिक रुप से इस्तेमाल का बीड़ा भी उन्हीं ने उठाया है. और इस काम मे उनका साथ दे रहे हैं उनके पति, श्री उमेश झाडगांवकर. भारतीय स्टेट बैंक से ५ करोड़ रुपये कर्ज लेकर २००५ में उन्होंने पहला संयंत्र शुरु किया जो एक दिन मे लगभग ५००० किलोग्राम प्लास्टिक को ईंधन में बदल देता है. इस ईंधन को पास ही के कारखाने खरीदते है. अब इससे भी बडा, २५००० किलोग्राम (२५ टन) प्रति दिन क्षमता वाला संयंत्र बनाया जा रहा है, जिससे बनने वाले ईंधन की पूरी बुकिंग अभी से हो चुकी है! नागपुर शहर प्रतिदिन ३५ टन प्लास्टिक कचरा इकट्ठा करता है. इसका मतलब जल्दी ही झाडगांवकर परिवार को किसी और शहर मे अपने संयंत्र लगाने होंगे.

आशा है कि उनके इन प्रयासों को सफ़लता मिलेगी और सारी दुनियाँ को इस भयावह समस्या से छुटकारा मिलेगा. हमें भी इस प्रक्रिया में उनका हाथ बंटाना है. कैसे? अगर हम सब ध्यान रखें कि प्लास्टिक के सामान को सही तरीके से जमा करके अलग से रखा जाय जिससे कि वह अन्य कचरे में ना मिले और उसका निस्तारण व इस्तेमाल ठीक ढंग से हो.

क्रमशः…..

सम्बंधित कड़ियाँ: प्रो. झाडगांवकर का इस प्रक्रिया के सम्बन्ध में शोधपत्र, गुडन्यूज़ इण्डिया पर एक आलेख, केन्द्रीय प्लास्टिक अभियांत्रिकी तथा तकनीकि संस्थान

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बूझे लाल बुझक्कड़ – ५

September 13, 2006

वाह, बहुत खूब! बहुत सही दिमाग लगाया आप सब लोगों ने. और पंकज भाई के उत्तर से इतना भी पता चल गया कि लाल पुछक्कड़ चाचा जवाब की ओर संकेत देने में उतने बुरे भी नहीं है. आप सबको बधाई.

इस बर्ष ११ सितम्बर को गाँधीजी के सत्याग्रह आन्दोलन की नींव डले पूरे १०० साल हो गये. बात है दक्षिण अफ़्रीका की. ट्रांसवाल प्रान्त की सरकार ने कानून बनाया गया कि वहाँ रहने वाले ८ वर्ष की उम्र से बड़े सभी भारतीय लोगों को अपनी अंगुलियों के निशान पुलिस में जमा कराने होंगे. कानून न माने जाने पर जेल में सज़ा का प्रावधान रखा गया. ऐसा कतई नहीं था कि भारतीय लोग चोर उचक्के थे, और ऐसा कानून सुरक्षा की दृष्टि से लाया गया हो. कानून में स्पष्ट रूप से भेदभाव की नीति अपनाई गयी थी. गाँधीजी ने उस समय स्थिति को समझा और उनके नेतृत्व में ११ सितम्बर १९०६ को भारतीय लोगों ने सत्याग्रह के द्वारा सरकार का विरोध करने की शपथ ली. यह विश्व में अपनी तरह का पहला प्रयोग था.

इस घटना से ठीक १३ वर्ष पूर्व, अर्थात् ११ सितम्बर १८९३ को शिकागो में गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए एक संन्यासी ने विश्व धर्म सम्मेलन में जो व्याख्यान दिया, उसने सारी दुनियाँ को हिलाकर रख दिया. एक अजनबी के मुँह से बहन या भाई सुनने की आदत नहीं थी अमेरिकावासियों को. स्वामी विवेकानन्द जी के इस व्याख्यान और बाकी के व्याख्यानों में भी बहुत भीड़ जुटी रही. उनका एक-एक शब्द अपने कानों में बटोरने के लिये लोगों में मानो होड़ सी लग गयी. उनके विचारो में सत्य भी है और तर्क भी, पर आश्चर्य की बात यह है कि उनके तर्क की वजह से सत्य धुंधला नहीं हुआ है!

धन्य है वह भारतभूमि जिसने ऐसे महापुरुषों को जन्म दिया.

सम्बंधित कडियाँ: सत्याग्रह, स्वामी विवेकानन्द जी का शिकागो व्याख्यान (स्वयं स्वामीजी के श्रीमुख से!?)