Archive for the ‘प्रश्नमंजूषा’ Category

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बूझे लाल बुझक्कड़ – ८

February 2, 2007

ये पुछक्कड़ लगता है फिर से कठिन सवाल पूछ के भाग गया. सवाल पूछे तो पुछक्कड़ और जनता के अण्डे-टमाटर झेले बुझक्कड़, ये कहाँ का न्याय है? पंकज भाई ने तो सीधे-सीधे हाथ खड़े कर दिये. वैसे समीर जी को भी उत्तर नहीं पता था, पर वो घुमाते-घुमाते डकैतों की बस्ती में ले गये! सागर भाई ने सही जगह पर सही अक्ल लगा दी, इतना तो पता लगा ही लाये कि खज़ाना कहाँ छि‍पा है. तो इसी बात के लिये बधाई ले लीजिये सागर भाई!

दिये गये मानचित्र में रंग भरने का आधार था जिनी सूचकांक! बड़ा अजीब सा नाम है यह तो, पर यह आखिर है क्या? आइये जानने का प्रयास करते हैं. भारत के परिप्रेक्ष्य में भी इस सूचकांक की चर्चा करेंगे.

बचपन में गणित की कक्षा याद आती है जब मास्टरजी सवाल पूछते थे, “रामू, तुम्हारी कक्षा में २५ छात्र हैं. अगर मैं तुम्हें ५० संतरे दूँ और कहूँ कि अपनी कक्षा में बाँटो तो हर एक के हिस्से में कितने संतरे आयेंगे?” रामू झट से जवाब दे देता था, “२ संतरे मास्टरजी”. लेकिन रामू को शायद पता नहीं होता था कि दुनियाँ में बंटवारे का गणित इतना आसान नहीं होता. जी हाँ, आज बड़ी से बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की समस्या है सम्पत्ति का असमान वितरण. आज आम आदमी यह कहने से कतई नहीं चूकता कि भारत में अमीर और अमीर होता जा रहा है, तथा गरीब और भी गरीब. पर इस कथन के में सत्य कितना है, इसे भी समझने का प्रयास करेंगे.

कल्पना कीजिये दो विपरीत परिस्थितियों की – पहली जिसमें सम्पत्ति का वितरण सभी लोगों में बराबर-बराबर है, कुछ कम ज़्यादा नहीं, एकदम रामू वाला गणित! और दूसरी परिस्थिति जिसमें सारी सम्पत्ति एक ही व्यक्ति के पास संचित है और बाकी सबके पास कुछ भी नहीं. जिनी सूचकांक किसी भी प्रकार के वितरण को संख्यात्मक रूप से दर्शाने के लिये ० और १ के बीच का एक अंक होता है. पहली (पूर्णत: समान) वितरण की स्थिति का जिनी सूचकांक होता है ० और दूसरी (पूर्णत: असमान) वितरण की स्थिति का जिनी सूचकांक होता है १. पर व्यवहारिक स्थिति तो कुछ बीच की ही होती है, और जैसा कि आप समझ ही गये होंगे कि जिनी सूचकांक जितना कम होता है अर्थव्यवस्था में संपत्ति का बंटवारा उतना ही समान होता है. मान लीजिये कि सबसे गरीब १०% लोगों के पास कुल सम्पत्ति की मात्र २% पूँजी है, सबसे गरीब २०% लोगों के पास ८%, और इसी प्रकार आगे चलते हुये यदि सांकेतिक रूप में कहें तो सबसे गरीब क% लोगों के पास ख% पूँजी है. यह स्पष्ट है कि क का मान ख के मान से कभी कम नहीं होगा, और सम्पूर्ण समानता की स्थिति में क और ख का मान हमेशा बराबर होगा. अब इन्हीं बिंदुओं (ख,क) को जोड-जोड़कर जो वक्र बना उसको कहिये लॉरेंज़ वक्र. जिनी सूचकांक सम्पूर्ण समानता की रेखा “ख = क” और लॉरेंज़ वक्र के बीच का क्षेत्रफ़ल का दुगना होता है. किसी भी तंत्र की असमानता को इस प्रकार संख्यात्मक रूप से निरूपित करने का विचार सबसे पहले १९१२ में इतालवी सांखिकीयविद और समाजशास्त्री कोराडो जिनी के दिमाग़ में आया और आज यह किसी भी देश के सम्पत्ति वितरण में असमानता मापने का मानक तरीका है.

अब बात करते हैं कुछ चुनिंदा देशों के जिनी सूचकांक की.

  • भारत: ०.३२५
  • चीन: ०.४४
  • संयुक्त राज्य अमेरिका: ०.४५
  • रूस: ०.३९९
  • दक्षिण कोरिया: ०.३५८
  • ब्राज़ील: ०.५९७

स्पष्ट है कि भारत में पूँजी का वितरण अन्य कई विकासशील देशों और विकसित देशों की तुलना में आधिक समान है, और हममें से अधिकांश अभी भी रटा-रटाया वाक्य कह देते हैं कि हमारे देश में सारा पैसा अमीरों के पास ही संचित है, जो कि अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में सही नहीं है. हमारी स्थिति निश्चित ही बेहतर है. न सिर्फ़ बेहतर है, बल्कि दिन-प्रतिदिन और भी सुधर रही है.

“भारत में अमीर और अमीर होता जा रहा है, तथा गरीब और भी गरीब”, इस छपे-छपाये, रटे-रटाये कथन का विश्लेषण करेंगे अगले अंक में. भारत की सम्पत्ति है उसके जी.डी.पी. से कहीं अधिक! कैसे? यह भी जानेंगे अगले अंक में.

साभार: वोलफ़्राम पर जिनी सूचकांक का पृष्ठ, विकिपीडिया पर जिनी सूचकांक का पृष्ठ, विभिन्न देशों का जिनी सूचकांक

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पूछे लाल पुछक्कड़ – ८

February 1, 2007

लाल पुछक्कड़ चाचा हाज़िर हैं एक लम्बे अरसे के बाद. छुट्टी पर थे पुछक्कड़ चाचा, ज़रा निकल गये थे दुनियाँ की सैर पर. बहुत सारे देश देखे, बहुत सारे लोगों से मिले. अमीरों से मिले, ग़रीबों से मिले, फ़कीरों से मिले, लकीरों के फ़कीरों से मिले. बड़े से बड़े भिखारी देखे, पैसों के पीछे पागल शिकारी देखे, रोटी को तरसते लोग देखे, पंचतारा होटलों के भोग देखे. टॉमी को मखमल के गद्दे में सोते देखा, हरिया को कड़ाके की सर्दी में रोते देखा. ये देखा… वो देखा… जाने दीजिये, मुद्दे की बात पर आया जाये.

तो आज का सवाल रहा ये. नीचे दिया जा रहा है विश्व का एक मानचित्र जिसमें अलग-अलग देशों को एक विशेष मानदण्ड के आधार पर अलग-अलग रंगों से दर्शाया गया है. जैसे भारत, रूस, फ़्रांस तथा पाकिस्तान का है एक जैसा धानी रंग और चीन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका रंगे हुये हैं कुछ भूरे-गेंहुँए रंग से. तो सवाल तो आप समझ ही गये होंगे! जी हाँ, आपको बताना है कि वह मानदण्ड क्या है जिसके आधार पर इस मानचित्र को रंगा गया है?

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सवाल कठिन है तो अता-पता फिर से बतायें क्या! नहीं बताते. अरे नाराज़ होने की क्या बात है. चलिये आपको खुश करने के लिये निदा फ़ाज़ली की एक ग़ज़ल की दो पंक्तियाँ सुना देते हैं अपनी आवाज़ में – दो में दो का भाग हमेशा एक कहाँ होता है, सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला!

मानचित्र साभार: विकिपीडिया

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बूझे लाल बुझक्कड़ – ७

October 7, 2006

लगता है पुछक्कड़ चाचा को अब कठिन सवाल पूछने होंगे. विनय भाई ने शुरुआत की तो फिर आशीष भाई हों, बेंगाणी बन्धु हों या शुएब भाई, सबने उनका समर्थन कर दिया. पुछक्कड़ चाचा को लग रहा होगा कि किसी को तो सिर खुजाना पड़ेगा, पर नहीं. सो आप सबको बधाई. मैं अभी जाकर पुछक्कड़ की भी खबर लेता हूँ.

जैसा कि आप लोगों ने बताया – सौराष्ट्र, हैदराबाद, मैसूर, पटियाला, ट्रावनकोर, इन्दौर, बीकानेर और जयपुर, ये सब भारत के वे इलाके हैं जिनके नाम पर भारतीय स्टेट बैंक से संबद्ध बैंकें हैं, जैसे स्टेट बैंक ऑफ़ सौराष्ट्र, स्टेट बैंक ऑफ़ इन्दौर इत्यादि. आजादी से पहले ये सब इलाके रियासत हुआ करते थे, और यहाँ अपनी-अपनी बैंकें थी. इन छोटी-छोटी बैंकों की पहुँच रियासतों की क्षेत्रीय जनता में बहुत थी. प्रथम पंचवर्षीय योजना में ग्रामीण विकास को ध्यान में रखते हुए इन सभी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर इन्हें स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया से संबद्ध किया गया. हालांकि इन सब बैंकों का प्रतीक-चिह्न स्टेट बैंक जैसा ही है, पर इनकी अपनी-अपनी अलग पहचान भी है.

स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया के इतिहास में झाँके तो इसकी शुरुआत हुई थी ठीक २०० साल पहले यानि सन् १८०६ में बैंक ऑफ़ कलकत्ता के रूप में. बाद में बैंक ऑफ़ मद्रास और बैंक ऑफ़ बौम्बे भी बनीं और बहुत बाद में जाकर इन तीनों को मिलाकर एक बड़ी बैंक बनायी गयी जिसको नाम दिया गया – इम्पीरियल बैंक ऑफ़ इण्डिया. इम्पीरियल बैंक को आज़ादी से पहले मुद्रा छापने का अधिकार होता था. आज़ादी के बाद भी सन् १९५५ तक यह अधिकार इम्पीरियल बैंक के पास सुरक्षित रहा. उसके बाद भारतीय रिज़र्व बैंक को यह अधिकार दिया गया और इम्पीरियल बैंक बन गयी स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया या भारतीय स्टेट बैंक.

शाखाओं की संख्या की दृष्टि से देखें या कर्मचारियों संख्या की दृष्टि से, आज भारतीय स्टेट बैंक दुनियाँ की सबसे बड़ी बैंक है, जिसका पिछले वर्ष कुल राजस्व था ६०० अरब रुपये से भी अधिक! अब पैसे इतने खनक ही रहे हैं तो याद दिला दिया जाय कि सिक्कों के प्रचलन में भी भारत सदियों से अग्रणी रहा है. हमारे यहाँ ६५० ई.पू. में ही सोने और चाँदी के सिक्के बनना शुरु हो गये थे! खैर, यह चर्चा फिर कभी.

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पूछे लाल पुछक्कड़ – ७

October 6, 2006

लीजिये, पुछक्कड़ चाचा फिर आ गये अपना एक सवाल लेकर. आपको कुछ भारतीय शहरों के नाम दिये जा रहे हैं:

कलकत्ता, सौराष्ट्र, हैदराबाद, मैसूर, पटियाला, ट्रावनकोर, इन्दौर, बीकानेर और जयपुर.

तो इसमें उत्तर भारत के शहर भी आ गये, मध्य भारत, दक्षिणी और पश्चिमी भारत के भी. पर ये क्या, पूर्वी भारत के तो रह ही गये! वैसे शुरुआत कलकत्ता से ही कर देते तो भी बुरा नहीं था क्योंकि हमारे इस प्रश्न के उत्तर की शुरुआत तो कलकत्ता में ही हुई थी. अरे, प्रश्न तो पूछ लें पहले! तो सवाल है कि भारत में वह कौन सी चीज़ है जो इन सब शहरों को जोड़ती है? देखिये, शराफ़त से बता दे रहे हैं कि यह कोई सड़क-वड़क नहीं है, बल्कि एक संस्था है, बड़ी, बहुत बड़ी. सोचिये सोचिये.

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बूझे लाल बुझक्कड़ – ६

September 19, 2006

भई वाह! इस बार तो आप लोगों ने १००% सही जवाब दिया. बुझक्कड़ चाचा खुश हुए. इनाम में आप सबको मिलती है- उनकी शाबाशी! जी हाँ, यह भारतीय युद्ध कला कलरिप्पयट् ही है जो अपनी तरह की विश्व की सबसे पुरानी विद्या है.

इस विद्या का अभ्यास केरल तथा उससे लगे तमिलनाडु और कर्नाटक में प्रचलित है. इसके अंतर्गत पटकना, पद-प्रहार, कुश्ती तथा हथियार बनाने के प्रशिक्षण के साथ उपचार की विधियाँ भी सिखाई जाती हैं. कलरिप्पयट् शब्द कलरि अर्थात विद्यालय तथा पयट्ट (जो पयट्टुका से बना है) अर्थात ‘युद्ध करना’ से मिल कर बना है. तमिल में इन दोनों शब्दों को मिलाने से जो अर्थ निकलता है वह है-’सामरिक कलाओं का अभ्यास’.

कलरिप्पयट् का उद्भव बारहवीं शताब्दी ई.पू. का माना जाता है परंतु यह कला उससे पूर्व या बाद की भी हो सकती है. इसका जन्म केरल या आसपास के क्षेत्रों में हुआ था. इतिहासकार श्री एलमकुलम कुंजन पिल्लई के अनुसार इस कला का विकास ग्यारहवीं शताब्दी ई.पू. में चेर और चोल राजाओं के शासनकाल में युद्ध के अधिक महत्व के कारण हुआ होगा. कुछ शताब्दियों से इसके दक्षिण भारतीय स्वरूप (जो खुले हाथों से युद्ध पर अधिक बल देता है) का अभ्यास मुख्यतः तमिलभाषी क्षेत्रों में होता है.

कहते हैं कि चीनी और जापानी सामरिक कलाओं का जन्म भारतीय सामरिक कलाओं से ही हुआ जो बोधिसत्वों के द्वारा प्रचलित की गयीं. यह भी माना जाता है कि ये भारतीय कलायें कलरिप्पयट् ही थीं, किंतु यह एक विवादित विषय है. कुछ लोग इसके पक्ष में है तो कुछ विरोध में. १९वीं सदी में ब्रितानी साम्राज्य की स्थापना के बाद यह कला धीरे धीरे गुम होने लगी. किंतु सन १९२० में पूरे दक्षिण भारत में पारंपरिक कलाओं को जीवंत करने की एक लहर उठी जिसके चलते तेल्लीचेरी में कलरिप्पयट् को पुनर्जीवन मिला. उसके बाद सन् १९७० तक विश्व स्तर पर सामरिक कलाओं के प्रति रुझान देखा गया और यही रुझान इस कला के विकास का कारण रहा. आधुनिक समय में कुछ अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्मों के ज़रिये इसका प्रसार करने का प्रयास किया जाता रहा है. साथ ही कुछ नृत्य प्रशिक्षण केन्द्र व्यायाम के तौर पर इसका अभ्यास करते हैं

कलरिप्पयट् के तीन स्वरूप हैं- दक्षिण भारतीय, उत्तर भारतीय और मध्य भारतीय. लगभग सात वर्ष की छोटी उम्र से ही इच्छुक विद्यार्थी को गुरुकुल में प्रशिक्षित करना शुरू कर देते हैं. यथावत विधि-विधान के साथ शिष्य गुरु से दीक्षा लेता है. इस प्रशिक्षण के चार मुख्य अंग हैं- मीतरी, कोलतरी, अनकतरी, और वेरमकई. इनके साथ मर्म तथा मालिश का ज्ञान भी दिया जाता है. मर्म के ज्ञाता अपने शत्रुओं के मर्म के स्पर्श मात्र से उनके प्राण ले सकते हैं अत: यह कला धैर्यवान तथा समझदार लोगों को ही सिखाई जाती है.

कलरिप्पयट् का प्रभाव केरल की सांस्कृतिक कलाओं पर भी साफ़ दिखता है जिनमें कथकली मुख्य है. कई कलाओं तथा नृत्यों जैसे कथकली, कोलकली एवं वेलकली आदि ने अपने विकास के दौरान कलरिप्पयट्ट से ही प्रेरणा ली है. कितना अद्भुत है ना… कहाँ युद्ध विद्या और कहाँ नृत्य कला. किंतु ऐसी विविधता में एकता ही तो है हमारे भारत की पहचान!

सम्बन्धित कड़ियाँ: विकिपीडिया पर कलरिप्पयट् का पॄष्, कलरिप्पयट् सीखनी है? – अवश्य, यह लीजिये!

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पूछे लाल पुछक्कड़ – ६

September 17, 2006

तो हाज़िर हैं पुछक्कड़ चाचा अपने एक नये सवाल के साथ. आज आपको बूझना है कि नीचे दी गयी तस्वीर में क्या चल रहा है.

दो लोग तलवार लेकर युद्ध कर रहे है, यह तो सबको दिख ही रहा है. कुछ और हो तो जरूर बताइये. आखिर ऐसा क्या है इस तस्वीर में जो पुछक्कड़ चाचा आपको दिखा रहे हैं? तलवार लेकर कोई इतनी ऊँची छलांग लगा जाये तो उसको तो हम कलाकारी ही कहेंगे, पर आपका क्या कहना है?

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बूझे लाल बुझक्कड़ – ५

September 13, 2006

वाह, बहुत खूब! बहुत सही दिमाग लगाया आप सब लोगों ने. और पंकज भाई के उत्तर से इतना भी पता चल गया कि लाल पुछक्कड़ चाचा जवाब की ओर संकेत देने में उतने बुरे भी नहीं है. आप सबको बधाई.

इस बर्ष ११ सितम्बर को गाँधीजी के सत्याग्रह आन्दोलन की नींव डले पूरे १०० साल हो गये. बात है दक्षिण अफ़्रीका की. ट्रांसवाल प्रान्त की सरकार ने कानून बनाया गया कि वहाँ रहने वाले ८ वर्ष की उम्र से बड़े सभी भारतीय लोगों को अपनी अंगुलियों के निशान पुलिस में जमा कराने होंगे. कानून न माने जाने पर जेल में सज़ा का प्रावधान रखा गया. ऐसा कतई नहीं था कि भारतीय लोग चोर उचक्के थे, और ऐसा कानून सुरक्षा की दृष्टि से लाया गया हो. कानून में स्पष्ट रूप से भेदभाव की नीति अपनाई गयी थी. गाँधीजी ने उस समय स्थिति को समझा और उनके नेतृत्व में ११ सितम्बर १९०६ को भारतीय लोगों ने सत्याग्रह के द्वारा सरकार का विरोध करने की शपथ ली. यह विश्व में अपनी तरह का पहला प्रयोग था.

इस घटना से ठीक १३ वर्ष पूर्व, अर्थात् ११ सितम्बर १८९३ को शिकागो में गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए एक संन्यासी ने विश्व धर्म सम्मेलन में जो व्याख्यान दिया, उसने सारी दुनियाँ को हिलाकर रख दिया. एक अजनबी के मुँह से बहन या भाई सुनने की आदत नहीं थी अमेरिकावासियों को. स्वामी विवेकानन्द जी के इस व्याख्यान और बाकी के व्याख्यानों में भी बहुत भीड़ जुटी रही. उनका एक-एक शब्द अपने कानों में बटोरने के लिये लोगों में मानो होड़ सी लग गयी. उनके विचारो में सत्य भी है और तर्क भी, पर आश्चर्य की बात यह है कि उनके तर्क की वजह से सत्य धुंधला नहीं हुआ है!

धन्य है वह भारतभूमि जिसने ऐसे महापुरुषों को जन्म दिया.

सम्बंधित कडियाँ: सत्याग्रह, स्वामी विवेकानन्द जी का शिकागो व्याख्यान (स्वयं स्वामीजी के श्रीमुख से!?)

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पूछे लाल पुछक्कड़ – ५

September 11, 2006

सारी दुनियाँ में ११ सितम्बर का दिन मानवता के इतिहास में काली स्याही से लिखा जाता है, क्यों? ना, ना सवाल यह नहीं है. लाल पुछक्कड़ चाचा को पता चला है कि जिस दिन को सारी दुनियाँ आतंकवादी कार्यवाही के लिये जानती है, उसी दिन अर्थात् ११ सितम्बर को बरसों पहले भारतमाता के दो महान सपूतों ने अलग-अलग समय विश्व को प्रेम का संदेश दिया था, अहिंसा का संदेश दिया था, आध्यात्म का संदेश दिया था. आपको बताना है कि यहाँ किन दो सपूतों की बात की जा रही है, और किस परिप्रेक्ष्य में?

आपको कोई संकेत चाहिये प्यारे भाईयों और बहनों? सोचिये और बताइये.

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बूझे लाल बुझक्कड़ – ४

September 6, 2006

हमने तो पहले ही पुछक्कड़ को बोल दिया था कि सवाल का आगा-पीछा ठीक से बता दो. पर नहीं, उसे तो आड़े-तिरछे डण्डों और मुकद्दर की रेखाओं के अलावा कुछ सूझा ही नहीं! अब देखो, करे पुछक्कड़ और भरे बुझक्कड़! मेरा काम कठिन हो गया ना. वैसे आप लोगों ने, और खास तौर पर संजय जी ने जो तुक्का मारा उसके लिये पुछक्कड़ चाचा और बुझक्कड़ चाचा आप सबको सांत्वना पुरस्कार दे रहे हैं. अगली बार जोर लगा के!

श्लोक था:

दीर्धचतुरस्रस्याक्ष्णयारज्जु: पार्श्वमानी तिर्यंगमानी च
यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति ||

यह श्लोक करीब ८०० ई.पू. में रचित बौधायन सुल्वसूत्र के प्रथम अध्याय का अड़तालीसवां श्लोक है और भारतीय गणितज्ञ बौधायन की उस प्रमेय का कथन है जो पाइथागोरस प्रमेय के नाम से अधिक प्रचलित है! वास्तव में यूनानी गणितज्ञ पाइथागोरस ने इस प्रमेय की खोज बौधायन के २५० बर्ष बाद की थी. भारत के बाहर तो बाहर, अंदर भी स्कूलों में इसे पाइथागोरस प्रमेय के नाम से पढ़ाया जाता है! लाल बुझक्कड़ चाचा की समझ के हिसाब से केवल उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की पुस्तकें ही बौधायन को इस प्रमेय का श्रेय देती हैं. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एन.सी.ई.आर.टी.) की पुस्तकें भी पाइथागोरस को ही इस प्रमेय का जनक मानती हैं!

ऐसे बहुत से वैज्ञानिक तथ्य हैं जिनको सर्वप्रथम भारत में खोजा गया, पर उनका श्रेय मिला बाहर वालों को. अब इसमें बाहर वालों की भी क्या गलती, हमारी लापरवाही कहिये ये फिर उदासीनता. आवश्यकता है कि कम से कम हम भारतीय तो ऐसी चीज़ों का महत्व समझें और जानें कि Fibonacci Series वास्तव में हेमचन्द्र श्रेणी है, परमाणु के सिद्धान्त का प्रतिपादन सर्वप्रथम कणाद (६०० ई.पू.) ने किया था और Pascal’s Triangle पिंगला का मेरु-प्रस्तार है, इत्यादि!

अभी पिछले महीने ही एक दिलचस्प घटना हुई. विश्व के हज़ारों गणितज्ञ चार वर्ष में एक बार जमा होते हैं और नयी-नयी खोजों के बारे में चर्चा करते हैं. आम तौर पर यह गोष्ठी विकसित देशों में होती है और इस बार अगस्त के अंतिम सप्ताह में यह स्पेन के मेड्रिड शहर में थी. भारत के शीर्ष गणितशास्त्रियों ने सोचा कि अगली बार, अर्थात् सन् २०१० में इस गोष्ठी का आयोजन भारत में किया जाय, सो इसके लिये भारत ने भी अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी दावेदारी रखी. भारत को कहा गया कि वे अपनी दावेदारी के पक्ष में तर्क दें. भारत ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार किया और शुरुआत की गयी गणित में भारत के योगदान से. जब भारतीय बक्ताओं ने बोलना शुरु किया तो कई विद्वान भौंचक्के रह गये. उनको तो पता ही नहीं था कि जिस प्रमेय को वे पाइथागोरस प्रमेय के नाम से पढ़ते-पढ़ाते आ रहे थे, वह तो भारत की देन है! उनको और भी ऐसे कई आश्चर्य हुए इस गोष्ठी में.

चलते-चलते: अच्छी खबर यह है कि भारत की दावेदारी सफ़ल रही है, और सन् २०१० में यह विशाल गोष्ठी हैदराबाद में आयोजित हो रही है. यह ११० से भी अधिक वर्षों के इतिहास में केवल तीसरा मौका होगा जब विश्व के गणितज्ञ एशिया के किसी देश में मिलेंगे. इससे पहले जापान और चीन को ही यह गौरव प्राप्त हुआ है.

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पूछे लाल पुछक्कड़ – ४

September 5, 2006

आज का सवाल रहा ये – आपको दिया जा रहा है एक श्लोक

दीर्धचतुरस्रस्याक्ष्णयारज्जु: पार्श्वमानी तिर्यंगमानी च
यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति ||

तो बताईये कि यह श्लोक आखिर है क्या?

अरे, अरे! घबराने की कोई बात नहीं है, पूरा-पूरा शाब्दिक अर्थ नहीं पूछ रहे हैं. आपको संस्कृत का विद्वान होने की भी कोई जरूरत नहीं है. लाल पुछक्कड़ चाचा को पक्का भरोसा है कि आपमें से लगभग सभी लोगों ने अपने स्कूल में इस श्लोक को किसी न किसी रूप में देखा हुआ है! हाँ, यह बात अलग है कि मास्टर जी के डण्डे भी बहुत खाये होंगे, आड़े-तिरछे डण्डे! कभी हाथ पर, कभी पीठ पर. देखते हैं इस बार कौन सही जवाब देता है, किसका मुकद्दर अच्छा है? वैसे तो मुकद्दर रेखाओं का खेल है, फिर भी!