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	<title>Comments on: हमारी पहचान &#8211; भाग ३</title>
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	<description>जननी जन्मभूमिश्च: स्वर्गादपि गरीयसि:</description>
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		<title>By: दिनेश मदने</title>
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		<dc:creator>दिनेश मदने</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 14 Aug 2007 22:20:48 +0000</pubDate>
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		<description>दुनिया मे दो तरह के लोग होते हैं. एक वो जो &quot;मुश्कील&quot; को देखते हैं और सोचते हैं. दुसरे वो जो हल को सोचते हैं. अभी हिन्दुस्तान जरूरत हैं दुसरे वाले लोगों की. तकलिफ़े किसे नही होती, सभी को होती हैं. लेकीन इन्सान वही आगे बढता हैं जो इन तकलिफ़ोंका सामना करते, मुश्कीले पिछे करते आगे बढे!

हिंदुस्तान दुनिया मे रोशन था .. और फ़िर से रोशन होगा. ३०० साल वाली शोषण के बावजूद हम अपना सर फ़क्र से उठा पायेंगे. लेकीन जब तक खुदका घर जलाने की हमारी आदत खतम नही होती तब तक हमे सिर्फ़ हम ही बचा सकते हैं!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>दुनिया मे दो तरह के लोग होते हैं. एक वो जो &#8220;मुश्कील&#8221; को देखते हैं और सोचते हैं. दुसरे वो जो हल को सोचते हैं. अभी हिन्दुस्तान जरूरत हैं दुसरे वाले लोगों की. तकलिफ़े किसे नही होती, सभी को होती हैं. लेकीन इन्सान वही आगे बढता हैं जो इन तकलिफ़ोंका सामना करते, मुश्कीले पिछे करते आगे बढे!</p>
<p>हिंदुस्तान दुनिया मे रोशन था .. और फ़िर से रोशन होगा. ३०० साल वाली शोषण के बावजूद हम अपना सर फ़क्र से उठा पायेंगे. लेकीन जब तक खुदका घर जलाने की हमारी आदत खतम नही होती तब तक हमे सिर्फ़ हम ही बचा सकते हैं!</p>
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		<title>By: शशि सिंह</title>
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		<dc:creator>शशि सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Nov 2006 12:37:44 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत सही बात कही आपने... लेकिन हालात धीरे-धीरे बदल रहे हैं. आज कुछ लोग हैं जो इन बातों को लेकर गंभीर है. यह बात और है कि उनकी तादाद कम है और कभी-कभी उन्हें हंसी का पात्र भी बनना पड़ता है... पर ठीक है अंधेरे में दीये की रोशनी ही राह दीखाती है. 

मुझे याद है एक बार मुझे मेरे भाई सा&#039;ब ने अंग्रेजी के कुछ उपन्यास खरीदने के लिए दूकान भेजा. खुद व्यस्त थे इसलिए खुद नहीं आ सके. दुकान पहुंचकर  भाई सा&#039;ब के निर्देशानुसार उपन्यासों के पिछले पृष्ठों पर छपा सार फोन पर पढ़कर सुनाने लगा. सार तो मैं अंग्रेजी में पढ़ रहा था लेकिन बाकी की बातचीत भोजपुरी में हो रही थी. उस वक्त दुकान में मैं कौतुहल का विषय था. मुम्बई के पॉश इलाके की इस बड़ी सी दुकान में मेरी भोजपुरी की वजह से वहां मौजुद भूरे अंग्रेज मुझे घुसपैठिया मानना तो चाह रहे थे मगर मेरी अंग्रेजी की वजह ऐसी हिम्मत नहीं कर पा रहे थे. 

उन पर मुझे तरस आ रहा था और खुद पर गर्व महसूस हुआ. बात साफ है पड़ोस की आंटी खूबसूरत हो इसका मतलब कतई नहीं कि उन्हें मां कहने लगूं. मेरी मां मेरी मां हैं, और पड़ोस की आंटी का भी सम्मान करने से कभी पीछे नहीं हटूंगा.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत सही बात कही आपने&#8230; लेकिन हालात धीरे-धीरे बदल रहे हैं. आज कुछ लोग हैं जो इन बातों को लेकर गंभीर है. यह बात और है कि उनकी तादाद कम है और कभी-कभी उन्हें हंसी का पात्र भी बनना पड़ता है&#8230; पर ठीक है अंधेरे में दीये की रोशनी ही राह दीखाती है. </p>
<p>मुझे याद है एक बार मुझे मेरे भाई सा&#8217;ब ने अंग्रेजी के कुछ उपन्यास खरीदने के लिए दूकान भेजा. खुद व्यस्त थे इसलिए खुद नहीं आ सके. दुकान पहुंचकर  भाई सा&#8217;ब के निर्देशानुसार उपन्यासों के पिछले पृष्ठों पर छपा सार फोन पर पढ़कर सुनाने लगा. सार तो मैं अंग्रेजी में पढ़ रहा था लेकिन बाकी की बातचीत भोजपुरी में हो रही थी. उस वक्त दुकान में मैं कौतुहल का विषय था. मुम्बई के पॉश इलाके की इस बड़ी सी दुकान में मेरी भोजपुरी की वजह से वहां मौजुद भूरे अंग्रेज मुझे घुसपैठिया मानना तो चाह रहे थे मगर मेरी अंग्रेजी की वजह ऐसी हिम्मत नहीं कर पा रहे थे. </p>
<p>उन पर मुझे तरस आ रहा था और खुद पर गर्व महसूस हुआ. बात साफ है पड़ोस की आंटी खूबसूरत हो इसका मतलब कतई नहीं कि उन्हें मां कहने लगूं. मेरी मां मेरी मां हैं, और पड़ोस की आंटी का भी सम्मान करने से कभी पीछे नहीं हटूंगा.</p>
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