यह आलेख मूलत: एक टिप्पणी का जवाब है जो हमारे पिछले आलेख पर आयी थी (हमारे अंग्रेज़ी चिट्ठे में)
टिप्पणी: “विदेशियों के भारतीय लोगों से घृणा करने का कारण है कि अभी तक हमारी परम्परागत छवि बनी हुई है. बहुत से विदेशी भीड़-भाड़ वाले और प्रदूषित शहरों को लेकर शिकायतें करते हैं. बड़े शहरों जैसे मुम्बई, दिल्ली और बंगलौर में भी सबसे पहले आपकी नज़र भिखारियों पर पड़ती है. हम प्रगति तो कर रहे हैं, पर इन सभी कारणों से हमारी छवि जस-की-तस बनी हुई है.”
हमारे आलेख का मुख्य बिन्दु यह नहीं था, पर बात निकली है तो उस पर विचार भी होना चाहिये. इस टिप्पणी में जो कुछ कहा गया, काफ़ी सीमा तक सच भी है और चिंता का विषय भी. सबसे पहले हमारी परम्परागत छवि आखिर है क्या? गन्दे शहर, गन्दे लोग? उससे भी पहले – हमारी परम्परा क्या है? यदि आप सोच रहे हैं कि प्रदूषित और भीड़-भाड़ वाले इलाके हमारी परम्परा हैं तो यह गलत है. तो आईये बात करें हमारे दो अलग-अलग पहलुओं की – हमारी परम्परा और हमारी परम्परागत छवि.
यदि बाहर के लोग सोचतें हैं कि गन्दगी ही हमारी परम्परा है, तो उनका भी क्या दोष! हां स्वयं अपने बारे में न जानना हमारे दोष अवश्य होगा. मैं एक उदाहरण देता हूं, जो ज़रा कुछ हटकर है. अमरीकी लोगों को देखिये, अंग्रेज़ी का उन्होंने जितना बेड़ा-गर्क किया है उतना किसी और ने नहीं! पर हमारे देश में इस टूटी-फूटी, या कहिये तोड़ी-फोड़ी गयी अमरीकन अंग्रेज़ी को बोलना आधुनिकता की निशानी माना जाता है. यदि नयी दिल्ली स्टेशन पर मैथिली या भोजपुरी में घोषणायें की जायें तो हम कहेंगे “भैया, किस गंवार को अनाउन्सर बना के बिठा दिया है”. ध्यान रहे, मैथिली और भोजपुरी हिन्दी की बोलियां हैं, हिन्दी का विकृत स्वरूप नहीं. क्या लास-एंजिल्स हवाई अड्डे पर विकृत अंग्रेज़ी में होने वाली घोषणाओं पर भी हमारी यही प्रतिक्रिया होगी? कतई नहीं!
परम्परायें आसमान से उतरकर नहीं आतीं, उन्हें हम बनाते हैं. हम जो आज करते है, कल वह परम्परा बन जाता है. कल्पना कीजिये, मुम्बई से फ़्रेंकफ़र्ट जाने वाले जहाज में कोई भारतीय नवयुवक धोती पहनकर आता है. यह निश्चित है कि उसको विदेशी लोग तो नहीं, पर हम जरूर जोकर कहेंगे. और कोई विदेशी जो बरमूड़ा पहनकर घुसा वह, उसका क्या? जब हम भारत में ही बड़ी-बड़ी दुकानों – वेस्ट साईड, रीबाक, प्लानेट एम इत्यादि में खरीदारी करने जाते हैं तब हिन्दी या क्षेत्रीय भाषा नहीं बोलते, आखिर क्यों? ऐसा नहीं है कि हमें हिन्दी या क्षेत्रीय भाषा नहीं आती, घर पर तो दूध वाले और धोबी से हम अंग्रेज़ी में बात नहीं करते ना! हम सोचते हैं कि बड़ी जगहों पर अपनी भाषा बोलने से बाकी लोग हमें पिछड़ा समझेंगें. हमें अपनी छवि की कितनी चिन्ता है, और वह भी अपने ही लोगों के सामने! कैसी विडम्बना है, हम अपने लोग आपस में बात करने के लिये विदेशी भाषा की सहायता लें, और वह भी तब जब सामने वाले को भी अपनी देसी भाषा अच्छी तरह से आती है! हमारा आचरण देखकर ही हमारे बच्चे सीखते हैं, और परम्परायें बस ऐसे ही बनती हैं.
अब बात करते हैं हमारी बाहरी छवि, जैसे शहरों में गन्दगी के ढेर इत्यादि. आप ज़रा पहले भीड़-भाड़ वाले यूरोपीय शहर देखिये – पेरिस, फ़्रेंकफ़र्ट, बर्लिन, ब्रसेल्स आदि. इस दुनियां में ऐसा कौन सा शहर है जिसकी उपनगरीय रेल सेवा एक दिन में ६० लाख यात्रियों को ढोती हो? और वह भी जमीन के नीचे नहीं ऊपर! मुम्बई का कोई मुकाबला नहीं. पेरिस की मेट्रो सेवा ४० लाख यात्रियों को प्रतिदिन ढोती है (जमीन के नीचे!), और उसके स्टेशन कितने साफ़ हैं? आप वहां के स्टेशनों पर लगे टाइल्स न देखिये, असली गन्दगी की बात कीजिये. हमारी परिस्थितियों के हिसाब से हम बहुत अच्छा कर रहे हैं, यह मानना होगा. मैं प्रदूषण की पैरवी नहीं कर रहा, बल्कि यह कह रहा हूं कि प्रदूषण एक कीमत है जिसे आज दुनियां का हर बड़ा शहर चुका रहा है. मुख्य प्रश्न यह है कि हम इस बारे में क्या कर रहे हैं. हमारी प्रवृत्ति यह हो चली है कि हम किसी भी समस्या के ऊपर बैठ जाते हैं और चिल्लाने लगते हैं, समाधान का प्रयास भी नहीं करते. यदि आज सरकार निजी वाहनों पर प्रदूषण कर लगा दे तो कितने ही सरकार विरोधी नारे तैयार हो जायेंगे, सरकार को चूना लगाने के नये तरीके भी इज़ाद हो जायेंगे. कभी सोचिये कि इन विकसित देशों के लोग अपने-अपने देश की सरकारों को कितना सारा कर ईमानदारी से देते हैं. विकास मुफ़्त में नहीं आता, हमें कुछ तो कीमत अदा करनी होती है, प्रदूषण के रूप में हो, या कर के रूप में – पसंद अपनी अपनी!
पूरे १५० साल के शोषण के बाद हमें स्वतंत्रता मिली. पिछले ६० सालों में विभाजन की विभीषिका के बाद घुली धार्मिक कड़वाहट, गरीबी, जनसंख्या और नौकरशाही जैसी समस्याओं से जूझने के बाद भी तेज़ी से विकास की राह पर अग्रसर है, क्या यह मायने नहीं रखता? अभी इस वर्ष के शान्ति के नोबेल पुरस्कार विजेता श्री मुहम्मद यूनुस का नाम याद आ रहा है जिन्होंने अपने घर सोफ़े पर बैठे हुए टी.वी. पर गरीबी देखने और सरकार की बुराई करने की अपेक्षा समस्या से लड़ने का रास्ता चुना. उम्मीद है कि भारत के लोगों को भी इससे सीख मिलेगी. और जैसा कि हमारे राष्ट्रपति जी कहते हैं, हमारे में समस्याओं से लड़ने की क्षमता है, और हम जीतकर भी दिखायेंगे.
