गतांक से आगे…
अब आप पूछेंगे, कि अगर इतना सब हो रहा है तो फिर आप ”वंदे मातरम्” पर ये पुराना ढोल काहे बजाते रहते हो, कि हमारे पूर्वजों ने ये किया, वो किया? नये ज़माने की बात करो. इस सवाल का जवाब भी एक और सवाल में है. एक बात बताईये, कोई इन्सान भारतीय कब कहलाया जा सकता है? बताईये, जवाब इतना मुश्किल भी नहीं है. एक आदमी, नाम ”फ़कीरचंद” कोलकता में साइकिल रिक्शा चलाता है आप कैसे बतायेंगे कि वो भारतीय है कि नहीं? उसका जन्म भारत में हुआ के नहीं यह देख कर, या उसका पासपोर्ट (जो उसके पास है ही नहीं!) देख कर. नहीं, भारतीयता, खून में, दिल-ओ-दिमाग़ में होती है. आज हमारा हीरो फ़कीरचंद, रोटी खाता, बंगाली भाषा में बात करता है, जरूरत पडे तो हिन्दी बोल लेता है. बहुत मेहनत कर के अपना और अपने बच्चों का पेट पालता है. हर दुर्गा पूजा के लिये अपना पेट काट कर सालभर पैसा जमा करता है, माँ की मूर्ति खुद अपने हाथ से बनाता है. ”मछेर झोल और भात” उसे अच्छा लगता है. अब सोचिये यही फ़कीरचंद अब एक बहुत बड़ी सोफ्टवेअर कंपनी में काम करता है. कोलकता में ही रहता है. साल में छह महीने देश के बाहर गुज़ारता है. बीवी और बच्चों को हर शनिवार घुमाने ले जाता है, खाना पिज़्ज़ा हट या मैकडोनाल्ड में खाता है. ”क्या करें, आज काल बच्चे इन सब चीजों के बिना रह ही नहीं सकते” दुर्गापूजा, कालीपूजा इन सब बातों के लिये उसके पास वक्त नहीं है. घर में सब अंग्रेज़ी में बात करते है. बच्चों को बंगाली आती है, बस ”किच्छु किच्छु” (उतनी ही आती है!), पेप्सी या कोक के बिना उन्हें खाना हज़म नहीं होता. और कहानी ऐसे ही आगे बढ़ती रही. अब बताईये कौन सा फ़कीरचंद आपको ज़्यादा भारतीय लगता है?
अब इसमे किसी भी फ़कीरचंद या उसके बच्चों का कोई दोष नहीं. पानी वहीं बहता है जहां ढलान हो. भारत की प्रगति के साथ साथ भारतीयता भी बढ़नी जरुरी है. विदेशों से आनेवाली हर चीज़ बुरी नहीं. परंतु, हमें क्या लेना है क्या नहीं, यह निर्णय हमारा होना चाहिये. मुझे भी पिज़्ज़ा पसंद है पर मेरी माँ की बनायी हुई मूँग की दाल की खिचड़ी और मेथी का साग (देसी घी के साथ!), कोई तुलना नहीं.
आज कल कुछ लोग ”ब्राण्ड इण्डिया” की बात करते है. मुझे बहुत दुख होता है यह सुनकर. यह देश हमारी माँ है, हमें इसे बेचने के लिये नहीं सजाना है. हमे उसे उसी भक्तिभाव से सजाना है जैसे माँ दुर्गा को सजाते है. इसलिये नहीं कि दूसरे देश उसे देख कर उसका सम्मान करें. इसलिये हम उसके बच्चे है. भारत महान था, है, और रहेगा. उसके लिये इश्तेहार लगाने कि ज़रूरत नहीं. कल आज और कल के इस खेल में अगर हमें जीतना है तो हमें जानना होगा की हम कल क्या थे और आज क्या हैं. सबसे ज़्यादा ज़रूरी यह है की आज हम जो भी हैं, वो हम कैसे बने? अगर हमारा कल समृद्ध था तो आज हम समृद्ध क्यों नहीं? ऐसी हमने कौन सी ग़लतियां कीं जिसका यह परिणाम है. हमें हमारी पहचान नहीं भूलनी है, नहीं तो हम जीत कर भी हार जायेंगे. हो सकता है कि एक दिन मैकडोनाल्ड को भी एक भारतीय कंपनी द्वारा खरीद लिया जाय, लेकिन वो तब तक भारतीय नहीं होगा जब तक उसमे, बर्गर के साथ साथ ”सरसों दा साग ते मक्के दी रोटी” ना मिले. जिस दिन ऐसा होगा, मित्रों, उस दिन मै गंगा में डुबकी लगाऊंगा. और अगर ऐसा न हुआ तो कमबख्त ”चाय” पीना छोड़ दूँगा!
क्रमश:… हमारे हिन्दी और अंग्रेजी चिट्ठों पर आयी टिप्पणियों से प्रेरित विचारों के साथ
