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बूझे लाल बुझक्कड़ – ७

October 7, 2006

लगता है पुछक्कड़ चाचा को अब कठिन सवाल पूछने होंगे. विनय भाई ने शुरुआत की तो फिर आशीष भाई हों, बेंगाणी बन्धु हों या शुएब भाई, सबने उनका समर्थन कर दिया. पुछक्कड़ चाचा को लग रहा होगा कि किसी को तो सिर खुजाना पड़ेगा, पर नहीं. सो आप सबको बधाई. मैं अभी जाकर पुछक्कड़ की भी खबर लेता हूँ.

जैसा कि आप लोगों ने बताया – सौराष्ट्र, हैदराबाद, मैसूर, पटियाला, ट्रावनकोर, इन्दौर, बीकानेर और जयपुर, ये सब भारत के वे इलाके हैं जिनके नाम पर भारतीय स्टेट बैंक से संबद्ध बैंकें हैं, जैसे स्टेट बैंक ऑफ़ सौराष्ट्र, स्टेट बैंक ऑफ़ इन्दौर इत्यादि. आजादी से पहले ये सब इलाके रियासत हुआ करते थे, और यहाँ अपनी-अपनी बैंकें थी. इन छोटी-छोटी बैंकों की पहुँच रियासतों की क्षेत्रीय जनता में बहुत थी. प्रथम पंचवर्षीय योजना में ग्रामीण विकास को ध्यान में रखते हुए इन सभी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर इन्हें स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया से संबद्ध किया गया. हालांकि इन सब बैंकों का प्रतीक-चिह्न स्टेट बैंक जैसा ही है, पर इनकी अपनी-अपनी अलग पहचान भी है.

स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया के इतिहास में झाँके तो इसकी शुरुआत हुई थी ठीक २०० साल पहले यानि सन् १८०६ में बैंक ऑफ़ कलकत्ता के रूप में. बाद में बैंक ऑफ़ मद्रास और बैंक ऑफ़ बौम्बे भी बनीं और बहुत बाद में जाकर इन तीनों को मिलाकर एक बड़ी बैंक बनायी गयी जिसको नाम दिया गया – इम्पीरियल बैंक ऑफ़ इण्डिया. इम्पीरियल बैंक को आज़ादी से पहले मुद्रा छापने का अधिकार होता था. आज़ादी के बाद भी सन् १९५५ तक यह अधिकार इम्पीरियल बैंक के पास सुरक्षित रहा. उसके बाद भारतीय रिज़र्व बैंक को यह अधिकार दिया गया और इम्पीरियल बैंक बन गयी स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया या भारतीय स्टेट बैंक.

शाखाओं की संख्या की दृष्टि से देखें या कर्मचारियों संख्या की दृष्टि से, आज भारतीय स्टेट बैंक दुनियाँ की सबसे बड़ी बैंक है, जिसका पिछले वर्ष कुल राजस्व था ६०० अरब रुपये से भी अधिक! अब पैसे इतने खनक ही रहे हैं तो याद दिला दिया जाय कि सिक्कों के प्रचलन में भी भारत सदियों से अग्रणी रहा है. हमारे यहाँ ६५० ई.पू. में ही सोने और चाँदी के सिक्के बनना शुरु हो गये थे! खैर, यह चर्चा फिर कभी.