वाह, बहुत खूब! बहुत सही दिमाग लगाया आप सब लोगों ने. और पंकज भाई के उत्तर से इतना भी पता चल गया कि लाल पुछक्कड़ चाचा जवाब की ओर संकेत देने में उतने बुरे भी नहीं है. आप सबको बधाई.
इस बर्ष ११ सितम्बर को गाँधीजी के सत्याग्रह आन्दोलन की नींव डले पूरे १०० साल हो गये. बात है दक्षिण अफ़्रीका की. ट्रांसवाल प्रान्त की सरकार ने कानून बनाया गया कि वहाँ रहने वाले ८ वर्ष की उम्र से बड़े सभी भारतीय लोगों को अपनी अंगुलियों के निशान पुलिस में जमा कराने होंगे. कानून न माने जाने पर जेल में सज़ा का प्रावधान रखा गया. ऐसा कतई नहीं था कि भारतीय लोग चोर उचक्के थे, और ऐसा कानून सुरक्षा की दृष्टि से लाया गया हो. कानून में स्पष्ट रूप से भेदभाव की नीति अपनाई गयी थी. गाँधीजी ने उस समय स्थिति को समझा और उनके नेतृत्व में ११ सितम्बर १९०६ को भारतीय लोगों ने सत्याग्रह के द्वारा सरकार का विरोध करने की शपथ ली. यह विश्व में अपनी तरह का पहला प्रयोग था.
इस घटना से ठीक १३ वर्ष पूर्व, अर्थात् ११ सितम्बर १८९३ को शिकागो में गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए एक संन्यासी ने विश्व धर्म सम्मेलन में जो व्याख्यान दिया, उसने सारी दुनियाँ को हिलाकर रख दिया. एक अजनबी के मुँह से बहन या भाई सुनने की आदत नहीं थी अमेरिकावासियों को. स्वामी विवेकानन्द जी के इस व्याख्यान और बाकी के व्याख्यानों में भी बहुत भीड़ जुटी रही. उनका एक-एक शब्द अपने कानों में बटोरने के लिये लोगों में मानो होड़ सी लग गयी. उनके विचारो में सत्य भी है और तर्क भी, पर आश्चर्य की बात यह है कि उनके तर्क की वजह से सत्य धुंधला नहीं हुआ है!
धन्य है वह भारतभूमि जिसने ऐसे महापुरुषों को जन्म दिया.
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