
नवीन भारत, नवीन विचार
September 9, 2006अपने बेटे की प्रतीक्षा में पलक-पाँवड़े बिछाये एक माँ, एक पिता के कदमों में वह उमंग, वह उत्सुकता; और दूर देस से उड़कर आने वाले बेटे के मन में ढेर सारी कल्पनायें. ऐसा ही कुछ होता है जब एक अप्रवासी भारतीय अपने घर जाता है, बिल्कुल अपनों के बीच! बसेरे से दूर बैठे-बैठे न जाने वह कौन सी डोर है जो खींचती रहती है बार-बार अपनी ओर? मुझे अपनी हाल की भारत यात्रा में ऐसा ही कुछ अनुभव हुआ.
वतन की मिट्टी की सोंधी खुशबू और घरवालों का उमड़ते हुए सागर सा आगाध प्रेम धरती के और किस कोने में मिलेगा? जब मैं ६ महीने बाद अपनी माँ से दिल्ली हवाई अड्डे पर मिला तब एक विदेशी का वीडियो कैमरा हमारी ओर खुद-ब-खुद मुड़ गया. पिछले डेढ़ साल में मैं तीसरी बार घर गया था.
इंदिरा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के आगमन कक्ष में कदम रखते ही मुझे मुझ जैसे और भी कई प्रसन्न चेहरे दिखे. गुड़गांव जाने के लिये राष्ट्रीय राजमार्ग-८ लिया और गाड़ी से बाहर झाँका तो पाया कि इन ६ महीनों में ही बहुत कुछ बदल गया है. विकास की एक साफ़ झलक दिखायी दे रही थी. मुझे भरोसा हुआ कि ऐसे ही छोटे-छोटे परिवर्तन जल्द ही भारत को विकसित देशों की क़तार में ला खड़ा करेंगे.
अगले कुछ दिनों में मैं कई बड़े-बड़े बाज़ारों, व्यावसायिक केन्द्रों पर गया और मुझे पहली बार आभास हुआ कि किसी भी मामले में ये यूरोप के किसी भी बाज़ार को टक्कर देते हैं. एक आम आदमी को यह विश्वास हो रहा है कि हम सभी प्रकार के उत्पाद बनाने में सक्षम हैं और किसी भी दृष्टिकोण से हमारे उत्पाद सर्वश्रेष्ठ हैं. यह आत्म-सम्मान और आत्म-निर्भरता एक बड़ी चीज़ है. मैंने मैकडोनाल्ड्स और पीज़ा हट में भीड़ देखी, तो उससे भी बड़ा जनसमूह चोर बाज़ार, सागर रत्न और मोती महल में था. मैंने पाया कि भारतीयों में विदेशी वस्तुओं को लेकर जो पागलपन था, वह काफ़ी हद तक दूर हुआ है. सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों की सेवाओं की गुणवत्ता में वृद्धि हुई है और लोगों का “चलता है” वाला रवैया कम हो रहा है. वे आज-कल सेवाओं की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दे रहे हैं.
हमारी अगली पीढ़ी देश के तकनीकि विकास और उससे जुड़े पहलुओं पर कहीं अधिक जागरूक हुई है. मैंने देखा कि कुछ किशोर एक समाचार चैनल को यातायात की ताज़ा जानकारी देने के लिये अपने मोबाइल से मल्टीमीडिया संदेश भेज रहे थे. यह जागरूकता ही देश का भविष्य है.
ऐसे बहुत सारे दृश्य अपनी आंखों में समेटकर, अपनों का ढेर सारा प्यार संजोकर और अपने देश के लिये गर्व की अनुभूति लेकर मैं वापस कोपनहेगन आ गया हूँ - इस आशा के साथ कि जल्द ही देश के विकास की जगमगाती हुई राह में एक छोटा सा दीप मेरा भी होगा.
“विकास की जगमगाती हुई राह ” जल्द ही पूरा होने को यह स्वप्न.
शुभकामनाऎं.