
विनोबा की गीता-प्रवचन
September 8, 2006बात महाराष्ट्र की धुलिया जेल की है. साल था १९३२. ब्रिटिश सरकार ने स्वाधीनता आन्दोलन में भाग लेने के कारण कई देशभक्तों को यहाँ बंदी बना रखा था. इन्हीं में से एक थे आचार्य विनोबा भावे. अब बैठे-बैठे जेल में क्या किया जाय? सह-कैदियों को एक विचार आया और उन्होंने आचार्य से एक निवेदन किया. फलस्वरूप हर रविवार को मण्डली जमती और आचार्य विनोबा भावे गीता के एक अध्याय पर अपना गहन चिंतन बहुत ही सरल भाषा में सबके सामने रखते. इस तरह एक-एक करके सभी अठारह अध्याय बाकी बंदियों के जीवन में भी सहज रूप से घुल गये. साने गुरुजी भी उस समय धुलिया जेल में बंद थे और उन्होंने आचार्य विनोबा भावे के प्रवचनों को लिपिबद्ध कर लिया. मूल रूप से मराठी में उपलब्ध इन प्रवचनों का अनुवाद और भी कई देशी-विदेशी भाषाओं में हुआ. हिन्दी अनुवाद ‘गीता-प्रवचन’ के नाम से विख्यात है.
अब गीता के गूढ़ रहस्य को कितने सरल शब्दों में ढाला जा सकता है, यह देखिये चौदहवें अध्याय से लिया गया गीता-प्रवचन का एक अंश:
“यह स्वधर्म कैसे सुनिश्चित किया जाय? - ऐसा कोई प्रश्न करे तो उसका उत्तर है - ‘वह स्वाभाविक होता है’. स्वधर्म सहज होता है. उसे खोजने की कल्पना ही विचित्र मालूम होती है. मनुष्य के जन्म के साथ ही उसका स्वधर्म जन्मा है. बच्चे के लिये जैसे उसकी माँ नहीं खोजनी पड़ती, वैसे ही स्वधर्म भी किसी को खोजना नहीं पड़ता. वह तो पहले से ही प्राप्त है. हमारे जन्म के पहले भी दुनियाँ थी और हमारे बाद भी वह रहेगी. हमारे पीछे भी एक बड़ा प्रवाह था और आगे भी वह है ही - ऐसे प्रवाह में हमारा जन्म हुआ है. जिन माँ-बाप के यहां मैंने जन्म लिया है, उनकी सेवा; जिन पास-पड़ोसियों के बीच मैं जन्मा हूँ , उनकी सेवा; - ये कर्म मुझे निसर्गत: ही मिले हैं. फिर मेरी वृत्तियाँ तो मेरे नित्य अनुभव की ही हैं न? मुझे भूख लगती है, प्यास लगती है; अत: भूखे को भोजन देना, प्यासे को पानी पिलाना, यह धर्म मुझे स्वत: ही प्राप्त हो गया. इस प्रकार यह सेवारूप, भूतदयारूप स्वधर्म हमें खोजना नहीं पड़ता. जहाँ कहीं स्वधर्म की खोज हो रही है, वहाँ निश्चित समझ लेना चाहिये कि कुछ न कुछ अधर्म हो रहा है.”
सच, अगर सोच इतनी सरल हो तो जीवन में कितनी समस्यायें स्वत: हल हो जायें!
स्वधर्म सहज होता है.
बढ़िया!
बहुत सही विवेचना है.
कितना सरल हैं स्वधर्म को समझना, यह पता नहीं था.
काफी अच्छी बात कही है। जानकारी का शुक्रिया।
सोच उलझ गई है तभी तो जीवन भी उलझ गया है।