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बूझे लाल बुझक्कड़ – ४

September 6, 2006

हमने तो पहले ही पुछक्कड़ को बोल दिया था कि सवाल का आगा-पीछा ठीक से बता दो. पर नहीं, उसे तो आड़े-तिरछे डण्डों और मुकद्दर की रेखाओं के अलावा कुछ सूझा ही नहीं! अब देखो, करे पुछक्कड़ और भरे बुझक्कड़! मेरा काम कठिन हो गया ना. वैसे आप लोगों ने, और खास तौर पर संजय जी ने जो तुक्का मारा उसके लिये पुछक्कड़ चाचा और बुझक्कड़ चाचा आप सबको सांत्वना पुरस्कार दे रहे हैं. अगली बार जोर लगा के!

श्लोक था:

दीर्धचतुरस्रस्याक्ष्णयारज्जु: पार्श्वमानी तिर्यंगमानी च
यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति ||

यह श्लोक करीब ८०० ई.पू. में रचित बौधायन सुल्वसूत्र के प्रथम अध्याय का अड़तालीसवां श्लोक है और भारतीय गणितज्ञ बौधायन की उस प्रमेय का कथन है जो पाइथागोरस प्रमेय के नाम से अधिक प्रचलित है! वास्तव में यूनानी गणितज्ञ पाइथागोरस ने इस प्रमेय की खोज बौधायन के २५० बर्ष बाद की थी. भारत के बाहर तो बाहर, अंदर भी स्कूलों में इसे पाइथागोरस प्रमेय के नाम से पढ़ाया जाता है! लाल बुझक्कड़ चाचा की समझ के हिसाब से केवल उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की पुस्तकें ही बौधायन को इस प्रमेय का श्रेय देती हैं. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एन.सी.ई.आर.टी.) की पुस्तकें भी पाइथागोरस को ही इस प्रमेय का जनक मानती हैं!

ऐसे बहुत से वैज्ञानिक तथ्य हैं जिनको सर्वप्रथम भारत में खोजा गया, पर उनका श्रेय मिला बाहर वालों को. अब इसमें बाहर वालों की भी क्या गलती, हमारी लापरवाही कहिये ये फिर उदासीनता. आवश्यकता है कि कम से कम हम भारतीय तो ऐसी चीज़ों का महत्व समझें और जानें कि Fibonacci Series वास्तव में हेमचन्द्र श्रेणी है, परमाणु के सिद्धान्त का प्रतिपादन सर्वप्रथम कणाद (६०० ई.पू.) ने किया था और Pascal’s Triangle पिंगला का मेरु-प्रस्तार है, इत्यादि!

अभी पिछले महीने ही एक दिलचस्प घटना हुई. विश्व के हज़ारों गणितज्ञ चार वर्ष में एक बार जमा होते हैं और नयी-नयी खोजों के बारे में चर्चा करते हैं. आम तौर पर यह गोष्ठी विकसित देशों में होती है और इस बार अगस्त के अंतिम सप्ताह में यह स्पेन के मेड्रिड शहर में थी. भारत के शीर्ष गणितशास्त्रियों ने सोचा कि अगली बार, अर्थात् सन् २०१० में इस गोष्ठी का आयोजन भारत में किया जाय, सो इसके लिये भारत ने भी अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी दावेदारी रखी. भारत को कहा गया कि वे अपनी दावेदारी के पक्ष में तर्क दें. भारत ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार किया और शुरुआत की गयी गणित में भारत के योगदान से. जब भारतीय बक्ताओं ने बोलना शुरु किया तो कई विद्वान भौंचक्के रह गये. उनको तो पता ही नहीं था कि जिस प्रमेय को वे पाइथागोरस प्रमेय के नाम से पढ़ते-पढ़ाते आ रहे थे, वह तो भारत की देन है! उनको और भी ऐसे कई आश्चर्य हुए इस गोष्ठी में.

चलते-चलते: अच्छी खबर यह है कि भारत की दावेदारी सफ़ल रही है, और सन् २०१० में यह विशाल गोष्ठी हैदराबाद में आयोजित हो रही है. यह ११० से भी अधिक वर्षों के इतिहास में केवल तीसरा मौका होगा जब विश्व के गणितज्ञ एशिया के किसी देश में मिलेंगे. इससे पहले जापान और चीन को ही यह गौरव प्राप्त हुआ है.