
एक दूरदृष्टि : ऊर्जा (भाग २)
September 4, 2006शुरुआत करते हैं एक निजी अनुभव से. मई १९९८, भारत के एक वरिष्ठ नाभिकीय भौतिकशास्त्री के साथ काम करने का अवसर मिला. कुछ दिन पहले ही भारत ने पाँच नाभिकीय परीक्षण किये थे. एक दिन बडे उत्साह से हमने उनसे कहा कि हमें बड़ा अभिमान है कि हमारे वैज्ञानिकों और अभियन्ताओं ने पाँच सफल परीक्षण करके सारी दुनियाँ को अपनी क्षमता से अवगत करा दिया. वे हँस कर बोले, “इसमें कौन सी बड़ी बात है”? मैने पूछा, “क्या ऐसे परिष्कृत अण्वास्त्र बनाना कोई बड़ी उपलब्धि नही? इसमें तो बड़ी आधुनिक तकनीकि का प्रयोग होता होगा? यह काम आसान तो नहीं”! उन्होंने कहा “बिल्कुल, ऐसे अण्वास्त्र बनाने की तकनीकि कुछ गिने-चुने देशों के पास ही है. परन्तु हमारे देश के वैज्ञानिक इससे भी कठिन काम हर रोज़ करते हैं”. मैं हैरान हो गया! उन्होंने समझाया कि आज भारत में २० से ज्यादा अलग-अलग प्रकार की परमाणु भट्टियाँ हैं. कुछ का इस्तेमाल शोध के लिये होता है तो कुछ का उर्जा निर्माण के लिये. एक अणवास्त्र मे समान्यत: २० से २५ किलोग्राम यूरेनियम या प्लूटोनियम का इस्तेमाल होता है और उसके विस्फोट की अभिक्रिया अनियन्त्रित होती है, जबकि किसी औसत परमाणु भट्टी मे इससे हज़ार गुना अधिक सामग्री होती है और उससे भी महत्वपूर्ण बात ये कि उसमें धीरे-धीरे नियन्त्रित रूप से अभिक्रिया करवानी होती है जो कि बहुत ही जोखिम भरा और कठिन काम है और भारतीय वैज्ञानिकों और अभियन्ताओं को इसमें कई दशकों से महारत हासिल है!
अब ज़रा ये सोचिये कि लगभग ३५ करोड़ आबादी वाला एक देश जो मुश्किल से १ साल पहले ही आज़ाद हुआ हो, जहाँ सैकड़ों लोग भूख से मर रहे हों, और ऐसी परिस्थिति मे एक वैज्ञानिक कहे कि हमें अणुशक्ति अनुसन्धान में पैसा खर्च करना चाहिये! कोई भी सामान्य आदमी उसे पागल कहेगा. लेकिन जब डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ने यह प्रस्ताव रखा तो पण्डित जवाहरलाल नेहरु ने उस पर गौर किया और सन १९४८ में परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की गई. डॉ. भाभा की दूरदॄष्टि की दाद देनी होगी कि उन्होंने उस जमाने मे अणुशक्ति के महत्व के बारे में सोचा जब परमाणु विखण्डन का एक ही भयावह और विध्वंसक उपयोग किया गया था, हिरोशिमा और नागासाकी में! लेकिन उन्होंने यह जान लिया कि यही परमाणु शक्ति एक दिन मानव के काम आएगी और इस पर शोध भारत को अभी से शुरु करना चाहिये जिससे कि बाद में हमें दूसरे देशों का मुँह न देखना पडे. वे तो फिर भी एक वैज्ञानिक थे, इस विषय के महत्व को समझना उनके लिये शायद उतना कठिन न था, लेकिन नेहरुजी ने भी इसकी गहनता को समझा ये एक महत्वपूर्ण बात है. और उनके इन प्रयासों का नतीजा यह हुआ कि आज भारत उन गिने-चुने देशों में से है जो परमाणु ऊर्जा निर्माण के पूरे नाभिकीय ईंधन चक्र (न्यूक्लियर फ़्युअल सायकल) के लिये जरूरी सारी तकनीकों की जानकारी रखते हैं. जहाँ आवश्यकता हुई वहाँ दूसरे देशों से सहायता भी ली गयी. जैसे कनाडा, अमरीका, रूस, फ़्रांस इत्यादि. उन तकनीकों के बारे मे विस्तार से चर्चा फिर कभी करेंगे.
आज हमारे देश मे कुल मिलाकर १,२४,२८७ मेगावाट (मार्च २००६) बिजली का उत्पादन होता है, उसमें से ३३६० मेगावाट बिजली (१८ अगस्त २००६ को तारापुर परमाणु बिजलीघर मे ५४० मेगावाट की दूसरी इकाई को राष्ट्रीय बिजली संजाल से जोडे जाने से यह क्षमता बढकर ३९०० मेगावाट हो गयी है) परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से आती है. और इस लेख के लिखते समय ३३८० मेगावाट क्षमता की इकाईयां निर्माणाधीन हैं, जिनमें एक ५०० मेगावाट की द्रुत प्रजनक परमाणु भट्टी (फ़ास्ट ब्रीडर रियेक्टेर) भी शामिल है. द्रुत प्रजनक परमाणु भट्टी की ये विशेषता होती है कि वह जितना ईंधन जलाती है, कुछ विशिष्ट नाभिकीय प्रक्रिया से, उससे ज्यादा ईंधन निर्माण करती है जो रासायानिक प्रक्रिया करने के बाद परमाणु भट्टियों में इस्तेमाल किया जाता है. कुछ और परियोजनायें भी विचाराधीन है. व्यावसायिक तौर पर बिजली उत्पादन के लिये परमाणु भट्टियाँ बनाना और उनके संचालन का दायित्व न्यूक्लियर पावर कारपोरेशन आफ़ इण्डिया लिमिटेड और भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड, इन दो सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर है. राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम जी ने लक्ष्य रखा है कि सन् २०२० तक कम से कम २०,००० मेगावाट बिजली नाभिकीय संयंत्रों से आनी चाहिये. परमाणु ऊर्जा निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण काम होता है उसके ईंधन की निर्माण और उससे भी महत्वपूर्ण उसके इस्तेमाल के बाद उसका रख रखाव. उसके रेडियोधर्मी होने की वजह से यह सब काम अत्यन्त खतरनाक और कठिन होते है. साथ ही साथ इनसे जुड़ी हुई हज़ारों तकनीकें अत्यन्त जटिल होती हैं, और उससे भी मुश्किल ये कि इनमें से कई तकनीकें, उनके दोहरे इस्तेमाल के कारण, हर देश को खुद ही विकसित करनी पडती हैं जिसमें कई दशकों का शोधकार्य जरूरी होता है, ये ज्ञान कुछ सालों के शोध से प्राप्त नही हो सकता.
भविष्य के लिये नयी-नयी तकनीकें विकसित की जा रही हैं. इस दिशा मे शोध की जिम्मेदरी भाभा परमाणु अनुसन्धान केन्द्र, मुम्बई और इंदिरा गाँधी परमाणु अनुसन्धान केन्द्र, कलपक्कम पर है. इन दोनों केन्द्रों में नयी और परिष्कॄत परमाणु भट्टियों, नये और ज्यादा व्यावसायिक ईंधन निर्माण तथा उसके इस्तेमाल के बाद विविध रासयानिक प्रक्रियाओं से उसमें तैयार होने वाले नये ईंधन को अलग करना, इत्यादि पर काम जारी है. साथ ही साथ कुछ नयी और ज्यादा सुरक्षित परमाणु भट्टियों के निर्माण पर भी शोधकार्य चल रहा है.
क्रमश:….
साभार: इस लेख में प्रस्तुत सारे आंकडे इन जगहों से लिये गये है - न्यूक्लियर पावर कारपोरेशन आफ़ इण्डिया लिमिटेड, परमाणु ऊर्जा विभाग
ये तो है परमाणू बम बनाने से ज्यादा कठीन है परमाणू रियेक्टर बनाना।
निर्माण विध्वंस से बेहतर और कठीन होता ही है!
This is a great piece of information.