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बूझे लाल बुझक्कड़ – २

August 26, 2006

वाह! …. इस बार आपने लाल पुछक्कड़ चाचा से ही प्रश्न पूछ डाला कि ‘भइये ऐसा आसान प्रश्न क्यूँ पूछा’. अच्छा प्रश्न है वैसे. अब पुछक्कड़ भाई तो अभी नहीं हैं सो मैं ही दिये देता हूँ आपके प्रश्न का जवाब ; असल में आपके पुछक्कड़ चाचा जी ऐसे ही एक गोष्ठी में भाग ले रहे थे. अचानक किसी बात पर बाबा आमटे का नाम चाचा जी के मुँह से निकल गया और उन्हें ये जान के अत्यंत खेद हुआ कि ऐसे महान व्यकित के नाम से नयी पीढ़ी के कई होनहार युवा परिचित ही नहीं हैं. इसीलिये चाचा जी ने सोचा कि यही प्रश्न यहाँ भी किया जाये. और हम दोनों यानि लाल बुझक्कड़ और लाल पुछक्कड़ चाचा के लिये यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि हमारे पाठकों ने उन्हें निराश नहीं किया. साथ ही देखिये विजय वडनेरे जी ने प्रश्न पूछे जाने को सार्थक भी कर दिया. उन्हें नहीं पता था कि तस्वीर किसकी है किंतु प्रश्न को नज़रंदाज़ कर आगे बढ़ने की बजाय उन्होनें प्रयास कर के इसका पता लगाया. इसी क्रम में उन्हें ‘बाबा’ के बारे में जानने का भी मौका मिला होगा. हम उनके प्रयास की सराहना करते हैं. यदि हमारे लेख या प्रश्न से एक भी भारतीय का ज्ञानवर्धन हो, विचारों को एक नयी दिशा मिले, तो हमें लगता है कि हमारा प्रयास सफल हुआ.

२४ दिसंबर,१९१४ को महाराष्ट्र के वर्धा जिले में जन्मे श्री मुरलीधर देवीदास आमटे को अधिकांश लोग बाबा आमटे के नाम से ही जानते हैं. उनका जन्म एक जागीरदार परिवार में हुआ. वक़ालत की शिक्षा प्राप्त करने के बाद बाबा आमटे ने वर्धा में ही वक़ालत आरंभ करी. उनका काम काफ़ी अच्छा चल रहा था किंतु अपने आसपास फैली दरिद्रता ने एक दिन बाबा को इतना विचलित कर दिया कि उन्होंने वकालत छोड़ स्वयं को समाजसेवा के प्रति समर्पित करने का निश्चय कर लिया.

भारत के सम्मानित समाजसेवी बाबा आमटे ने अपना संपूर्ण जीवन कोढ़ पीड़ितों की सेवा व उनके पुनर्वास में लगा दिया. यहाँ तक कि उन्होंने अपने शरीर को भी कोढ़ का निदान पाने की दिशा में किये जाने वाले प्रयोगों के लिये प्रस्तुत कर दिया. महाराष्ट्र में, नागपुर के निकट आनंदवन में उनके द्वारा शुरू की गयी सामुदायिक विकास परियोजना ने कोढ़-पीड़ितों के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार और पक्षपात को मिटाने के लिये सराहनीय सफल प्रयास किये हैं. यह विश्व भर में मान्यता-प्राप्त तथा सम्मानित परियोजनाओं में एक है. बाबा आमटे ने वर्ष १९८५ में कश्मीर से कन्याकुमारी तक तथा वर्ष १९८८ में अरुणाचल प्रदेश से गुजरात तक ‘भारत जोड़ो’ आंदोलन भी चलाया जिसका उद्देश्य था देश को एकता के सूत्र में पिरोना, शांति की स्थापना तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता का प्रसार.

बाबा को जनता की सेवा के लिये वर्ष १९८५ में ‘रैमन मैग्सेसे’ पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें भारत में कोढ़-पीड़ितों तथा अन्य बहिष्कृत अपंग लोगों के पुनर्वास हेतु किये गये कार्यों के लिये दिया गया. दिसंबर २५,१९९९ को उन्हें सम्मानित ‘गाँधी शांति पुरुस्कार’ के लिये चयनित किया गया. यह पुरुस्कार उन्हें उनके अनुकरणीय कार्यों तथा ‘श्रमिक विद्यापीठ’ की संकल्पना हेतु प्रदान किया गया. इस विद्यापीठ में रोगी तथा स्वयंसेवक साथ मिलकर काम करते हैं. बाबा विभिन्न पुरुस्कारों तथा सम्मान में मिली धनराशि को ‘आनंदवन’ से जुड़े कार्यों में लगाते हैं.

बाबा की जीवन-गाथा को वर्ष २००६ में ‘रोली बुक्स’ द्वारा प्रकाशित जीवन-वृत्तांत ‘विज़्डम सॉंग: द लाइफ़ ऑव़ बाबा आमटे’ में प्रस्तुत किया गया है. इसकी लेखिका हैं निशा मीरचंदानी. आज न सिर्फ़ बाबा बल्कि उनका पूरा परिवार इस मिशन से जुड़ा हुआ है तथा समाजसेवा में लगा हुआ है। वर्तमान में जहाँ इन्सान भौतिक सुखों के वशीभूत हो केवल अपने बारे में सोचता है वहाँ बाबा और उनका परिवार हमारे सामने देशसेवा का एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करते हैं.

बाबा के जीवन,परिवार तथा कार्यों और परियोजनाओं से संबधित एक संक्षिप्त विवरण यहाँ पढ़ा जा सकता है.

3 comments

  1. बाबा आम्टे का परिचय पढ़कर अच्छा लगा। वंदेमातरम से जुड़े लोग बधाई के पात्र हैं कि देश के उन लोगों से परिचित कराने काम कर रहे हैं जो हमारे आदर्श होने चाहिये।


  2. जहाँ चारो ओर दुष्टता के समाचार पढ़ते/देखते रहते हैं, इस प्रकार की जानकारी राहत देती हैं.


  3. बाबा आम्टे पर लेख पोस्ट करने और हमारी जानकारी मे इज़ाफा करने के लिए धन्यवाद



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