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ताक़त वतन की : ऊर्जा (भाग १)

August 19, 2006

एक ज़माना था जब राजा हुआ करते थे, किले हुआ करते थे. राजा जब भी कोई खतरा महसूस करता था, अपनी सेना के साथ किले में जाकर बैठ जाता और शत्रु किले को चारों ओर से घेरकर डेरा जमा लेता. फिर शुरु होती थी होड़ कि कौन कितने दिन अपनी जगह डटा रहता है. अगर किला बड़ा है और उसमें पर्याप्त मात्रा में दाना-पानी मौजूद है तो शत्रु कई महीनों तक राजा का कुछ नहीं बिगाड़ पाता और अंतत: धूप, बारिश, बीमारियों से परेशान होकर हार मानकर चला जाता.

अब यह तो रही पुरानी बात. अब युद्ध अलग तरीके से लड़े जाते हैं, मैदान बदल गये हैं, राजा और किले पुराने हो गये हैं. बंदूकें और तोप भी कल की बात हुईं. आजकल देश एक-दूसरे से कई अलग-अलग मैदानों में लड़ते हैं. उनमें से एक महत्वपूर्ण मैदान है ऊर्जा संसाधन. बिजली, तेल, कोयला, आणविक ऊर्जा से सम्बन्धित तकनीकि और उससे जुड़े हुए साज़ो-सामान. ज़ाहिर सी बात है कि अब ऊर्जा के संसाधन रोटी, कपड़ा और मकान जितने ही जरूरी हो चले हैं. कोई भी देश पर्याप्त ऊर्जा संसाधनों के बिना प्रगति नहीं कर सकता. और शायद यही संसाधन आज के सबसे महत्वपूर्ण हथियार हैं. एटम बमों से अधिक खामोश पर बेहद खतरनाक. यह ‘बम’ हर रोज़ किसी देश की जनता को आगे बढ़ाते हैं या पीछे खींचते हैं. आजकल किसी भी देश की ताक़त का अंदाज़ा सिर्फ़ उसकी सामरिक शक्ति से ही नहीं लगाया जाता बल्कि उसके साथ-साथ युद्ध की स्थिति में ऊर्जा की आवश्यकताओं की पूर्ति करने की क्षमताओं का भी आंकलन किया जाता है. पेट्रोलियम तेल से जुड़ी हुई राजनीति को लेकर दुनियां में जो तबाही मची हुई है, उससे हर कोई परिचित है.

आज हमारा देश प्रगति के पथ पर है. विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और करीब १ अरब १० करोड़ लोगों का घर. इतनी बड़ी जनसंख्या की जरूरतें भी उतनी ही बड़ी हैं. आज हमारे देश को हर तरह के ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता है – आगे बढ़ने के लिये और आगे रहने के लिये. पिछले कई वर्षों से भारत सरकार रचनात्मक रूप से ऊर्जा के स्रोतों को एकत्रित करने का प्रयास कर रही है. चाहे वह पेट्रोलियम तेल हो, कोयला हो, वायु हो, नाभिकीय ऊर्जा, या कुछ और. हर क्षेत्र में एक होड़ सी लगी है और सिर्फ़ भारत में ही नहीं विदेशों में भी.

स्वाभाविक सी बात जो आप पूछेंगे – “भैया, मुझे इन सबसे क्या लेना-देना? मैं तो अपना बिजली का बिल हर महीने भरता हूँ, मेरे घर में हर महीने १ या २ गैस सिलेण्डर लगते हैं जो मुझे आराम से मिल जाते हैं, आजकल ज़रा मंहगे हो गये हैं पर फिर भी. और वैसे भी मेरे इस विषय पर सर फोड़ने से क्या हो जायेगा? न ही ईरान से भारत तक तेल की नहर खुदने वाली और न ही गंगा मैया बाकी सारी नदियों के साथ मिलके ज्यादा बिजली पैदा करने के लिये आंदोलन करने वालीं. तो मेरे जैसे शरीफ़ आदमी का इन सबसे क्या लेना-देना? वैसे भी सरकार में इतने नेता हैं, उनको इन सब चीज़ों के बारे में सोचना चाहिये”. लेकिन जब मई या जून के महीने में दोपहर १ बजे बिजली गुल हो जाती है, तब आपको भगवान याद आ जाते हैं. पर क्या आप जानते हैं कि भारत में घरेलू इस्तेमाल की बिजली की प्रति यूनिट कीमत दुनियाँ में सबसे कम है!

इस श्रृंखला को शुरु करने का उद्देश्य है हमारे देश के ऊर्जा सम्बन्धित तथ्यों को एकत्रित करना और उन्हें समझने की कोशिश करना. इस श्रृंखला में पारम्परिक और गैर-पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों के अलग-अलग पक्षों पर चर्चा होगी. साथ ही साथ विषय के अन्य पहलुओं जैसे सामाजिक, राजनैतिक, औद्योगिक और वैज्ञानिक पक्षों पर भी विचार होगा. उद्देश्य है कि सामान्य भारतीय नागरिक देश की ऊर्जा सम्बन्धित समस्याओं और उनके समाधान के बारे में कुछ और जागरूक हों, हमारे इन मौलिक संसाधनों का उपयोग भली प्रकार से कम से कम अपव्यय के साथ करने के तरीकों के बारे में जानें, समझें व सोचें और उन पर अमल करें. आइये बात करें एक उभरते हुए देश की, उसकी जरूरतों की, उसकी समस्याओं की और उसकी सरकार द्वारा इस सम्बन्ध में लाई जा रही नीतियों की.

क्रमश:….

One comment

  1. वाह ! क्या विषय चुना है आपने !

    उर्जा के बिना सब कुछ बेकार है; सभ्यता को ग्रहण लग जायेगा यदि उर्जा नहीं रहेगी।



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